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साइकिल चलाई तो अस्पताल पहुँच गई…!

मैं यह आलेख अपने बिस्तर से लिख रही हूं। मैं एक ऐसी दुर्घटना के बाद आराम कर रही हूं जिसमें मेरी हड्डिïयां तक टूट गईं। दुर्घटना उस वक्त हुई थी जब मेरी साइकिल को तेज गति से आ रही एक कार ने टक्कर मार दी। मेरे शरीर से खून बह रहा था और वह कार सवार वहां से फरार हो चुका था। ऐसी घटनाएं हमारे देश के हर शहर की तमाम सड़कों पर आए दिन होती रहती हैं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि हमारी सड़क योजनाओं में पैदल और साइकिल पर चलने वालों का कतई ध्यान नहीं रखा जाता है। मानो उनका कोई अस्तित्व ही न हो। यहां तक कि उन्हें सड़क पार करने जैसे साधारण काम के दौरान भी जान गंवानी पड़ जाती है। मैं उनसे ज्यादा भाग्यशाली थी। दो कारें मेरे पास रुकीं। अजनबियों ने मेरी मदद की और मुझे अस्पताल ले गए। मेरा इलाज हुआ और मैं बहुत जल्दी पूरी तरह फिट होकर बाहर आ जाऊंगी।

यह एक ऐसी लड़ाई है जिस पर हम सबको मिलकर ध्यान देना होगा। हम पैदल चलने और साइकिल चलाने की जगहों को यूं नहीं छोड़ सकते। मेरी दुर्घटना के बाद से मेरे रिश्तेदारों और मित्रों ने लगातार मुझसे कहा है कि मैं इतनी लापरवाह कैसे हो सकती हूं कि दिल्ली की सड़कों पर साइकिल चलाने की सोचूं? उनका कहना सही है। हमने अपनी शहर की सड़कों को केवल कारों के चलने के लिहाज से ही तैयार किया है। सड़कों पर उन्हीं का राज है। साइकिल चलाने वालों के लिए अलग लेन की व्यवस्था नहीं हैं, पैदल चलने वालों के लिए अलग से पटरी नहीं है। अगर थोड़ी बहुत जगह कहीं है भी तो उस पर कारों की पार्किंग कर दी गई है। हमारी सड़कें केवल कार के लिए हैं। बाकी बातों का कोई महत्त्व ही नहीं है।

लेकिन साइकिल चलाना अथवा पैदल चलना केवल इसलिए कठिन नहीं है क्योंकि उसकी योजना सही ढंग से तैयार नहीं की गई है बल्कि ऐसा इसलिए भी है क्योंकि हमारी मानसिकता ऐसी है कि हम केवल उन्हीं लोगों को रसूख और अधिकार वाला मानते हैं जो कारों पर चलते हैं। हम मानते हैं कि जो भी पैदल चल रहा है अथवा साइकिल से चल रहा है वह गरीब है। ऐसे में जाने अनजाने उसके साथ ऐसा व्यवहार किया जाता है कि वह हाशिये पर चला जाए।

इस सोच में बदलाव लाना होगा। हमारे पास अपने चलने के तौर तरीकों में बदलाव के अलावा दूसरा कोई चारा नहीं है और मैं यह बात बार-बार दोहराती रही हूं। इस सप्ताह दिल्ली में फैलने वाले जहरीले धूल और धुएं का मिश्रण नई ऊंचाइयों पर पहुंच गया। गत माह विश्व स्वास्थ्य संगठन ने वायु प्रदूषकों को मानव के लिए कैंसरकारी करार दिया था। हमें इस हकीकत को समझना होगा कि यह प्रदूषण स्वीकार्य नहीं है। यह हमें मार रहा है।

अगर हम वाकई वायु प्रदूषण से निपटने को लेकर गंभीर हैं तो हमारे पास कारों की लगातार बढ़ती संख्या पर रोक लगाने के सिवा दूसरा कोई चारा नहीं है। हमें कारों नहीं बल्कि लोगों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुंचाने का तरीका सीखना होगा।

सेंटर फॉर साइंस ऐंड एनवायरनमेंट ने जब 1990 के दशक के मध्य में वायु प्रदूषण के विरुद्घ अभियान की शुरुआत की थी तो उसने हर पारंपरिक तौर तरीका अपनाने का प्रयास किया। उसने ईंधन की गुणवत्ता सुधारने की कोशिश की, वाहनों के उत्सर्जन मानक में सुधार करने की बात कही, उनकी निगरानी और मरम्मत व्यवस्था सही करने की ठानी। इसके अलावा उसने एक बड़े बदलाव के रूप में कंप्रेस्ड नैचुरल गैस (सीएनजी) का इस्तेमाल बढ़ाने की वकालत की ताकि डीजल वाली बसों और टू स्ट्रोक इंजन वाले ऑटो रिक्शा को प्रदूषक ईंधन से मुक्त किया जा सके। अगर इन तरीकों को अपनाया नहीं गया होता तो इसमें कोई शक नहीं कि हमारे यहां हवा का स्तर, उसकी गुणवत्ता और अधिक खराब होती।

लेकिन इतना ही पर्याप्त नहीं है। प्रदूषण के स्तर में लगातार इजाफा हो रहा है और यह वृद्घि अनिवार्य है। तमाम शोध इसके एक बड़े कारण और एक ही हल की ओर इशारा करते हैं। वह है अलग तरह की परिवहन व्यवस्था स्थापित करना। हमारे पास ऐसा करने का एक विकल्प भी मौजूद है। अभी भी हम पूरी तरह मोटरों पर आश्रित नहीं हैं। हमारे यहां अभी भी चार लेन वाली सड़क अथवा फ्लाईओवर बनाने की गुंजाइश बाकी है। सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि हमारी अधिकांश आबादी अभी भी बस पर, पैदल अथवा साइकिल से सफर करती है। सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि अनेक शहरों में 20 फीसदी तक की आबादी बाइक पर सफर करती है।

ऐसा इसलिए क्योंकि हम गरीब हैं। अब चुनौती यह है कि कैसे शहरों का नियोजन इस तरह किया जाए ताकि हम अमीर लोगों के लिए इसका इंतजाम कर सकें। पिछले कुछ सालों से हम इसी दिशा में काम कर रहे हैं कि शहरों को कैसे सुरक्षित और एकीकृत परिवहन व्यवस्था उपलब्ध कराई जाए। कुछ इस तरह की कार होने के बावजूद हमें उसका इस्तेमाल नहीं करना पड़े।

लेकिन एकीकरण इनमें सबसे महत्त्वपूर्ण पहलू है। हम मेट्रो बना सकते हैं या नई बसें चला सकते हैं लेकिन अगर हम दूरदराज इलाकों तक संपर्क नहीं स्थापित करते हैं तो फिर यह किसी काम का नहीं होगा। यही वजह है कि हमें पारंपरिक तरीके से अलग हटकर सोचना होगा।

हमें इस मोर्चे पर विफलता हासिल हो रही है। आज परिवहन की बात हो रही है, पैदल चलने वालों और साइकिल चलाने वालों का भी। लेकिन ये बातें खोखली हैं। हर बार कोशिश यही होती है कि मौजूदा सड़कों का कुछ हिस्सा लेकर साइकिल का ट्रैक बना दिया जाए और जाहिर तौर पर इसका घनघोर विरोध किया जाता है।

दलील यह है कि ऐसा इसलिए नहीं किया जा सकता है क्योंकि इससे सड़क पर कारों की जगह कम हो जाएगी और सड़कों पर जाम की समस्या बढ़ेगी। जबकि हमें बिल्कुल यही करने की आवश्यकता है। कारों की लेन कम की जाएं और बसों, पैदल चलने वालों और साइकिलों की जगह बढ़ाई जाए। सड़कों पर लगातार बढ़ती कारों से निपटने का यही एक तरीका रह गया है।

हमारी भीड़भरी सड़कों पर साइकिल ट्रैक बनाना और पैदल चलने वालों के लिए साफ सुथरा रास्ता बनाने के लिए कठिन प्रयासों की आवश्यकता होगी। मुझे ऐसा कोई भ्रम नहीं है कि इन बातों पर आसानी से अमल हो जाएगा। दुनिया के अन्य हिस्सों में बहुत आसानी से सड़कों का ऐसा पुनर्निर्माण किया जा चुका है जिससे साइकिल सवारों और पैदल चलने वालों के लिए पर्याप्त जगह निकल आई है।

जरा सोचिए इसके कितने लाभ हैं। हमें स्वच्छ हवा मिलेगी और यात्रा के दौरान हमारा व्यायाम भी होगा। हमें इनकी लड़ाई लडऩी होगी और हम लड़ेंगे। मुझे उम्मीद है कि आप सब सुरक्षित साइकिल सवारी या पैदल चलने का अधिकार हासिल करने की इस यात्रा में आप हमारे साथ रहेंगे।

पुनश्च : मुझे अस्पताल पहुंचाने वाले अजनबियों और एम्स ट्रॉमा सेंटर के उन बेहतरीन चिकित्सकों को धन्यवाद जिन्होंने मेरी जान बचाई।

साभार- बिज़नेस स्टैंडर्ड से

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