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कैंसर मौत नहीं जीने का हौसला भी देता है

मुंबई की दुनिया ऐसी निराली है कि यहाँ कब क् या हो जाए आपको पता ही नहीं चलता। समय की आपा-धापी और एक से दूसरी जगह जाने में दो से तीन घंटे लगने के बावजूद मुंबई वासियों में ही वो जज्बा है कि साहित्य, कला, रंगमंच, गोष्ठी सबके लिए समय निकाल ही लेते हैं। विभा रानी ने कैंसर से जूझते हुए एवितोको रुम थिएटर की एक ऐसी कल्पना को मुंबई से लेकर दिल्ली और कोलकोता तक पहुँचा दिया है कि ये रुम थिएटर एक आंदोलन बन चुका है। टीवी चैनलों और अखबारों पर परोसी जाने वाली उबाउ, घृणित और प्रायोजित बहसों के बीच अवितोको रुम थिएटर के माध्यम से रोचक, सार्थक और देश-गाँव से लेकर परंपराओं औप मूल्यों को जोड़ने वाले अनौपचारिक संवाद हवा के ताजे झोंके की तरह तृप्त कर जाते हैं।

इस बार ये संवाद हुआ उत्तराखंड से आई गीता गेरौला जी से। उनसे संवाद तो इस बात पर होना था कि उन्होंने कैसे कैंसर से जूझते हुए अपनी सृजनात्मकता और अपने आपको जिंदा रखा, लेकिन उन्होंने यह कहकर कैंसर वाली बात हवा में उड़ा दी कि कैंसर से जूझते हुए मुझे नया जीवन मिला, नए लोग मिले, और जीवन का वो सार्थक अनुभव मिला जो मैं स्वस्थ रहते हुए शायद ही महसूस कर पाती। अब ऐसे जीवट व्यक्तित्व वाली गीता जी का कैंसर बिगाड़ता भी तो क्या बिगाड़ लेता।

फिर उन्होंने उत्तराखंड के पौढ़ी गढ़वाल के भट्टी गाँव में अपने उस बचपन की यादों को साझा किया जो मुंबई में आया हर शख्स अपने गाँवों में छोड़ आया है। उन्होंने बताया कि उनके पिताजी और दादाजी पुलिस मेॆ थे और पूरे गाँव में वही पढ़े-लिखे थे। उनको स्कूल जाने के लिए कई किलोमीटर पैदल चलना पड़ता था। गाँव में दिन भर में एक बस आती थी, लेकिन वह गाँव में नहीं आती थी बल्कि उसके लिए भी कई किलोमीटर दूर चलकर जााना पड़ता था। फिर उनके दादाजी ने ही गाँव में स्कूल भी खोल दिया।

उनकी माँ कोलकोता की थी और जब वो गाँव में बहू नबकर आई तो एकमात्र पढ़ी-लिखी महिला थी। वह इतनी मेहनती थी कि दिन भर घास काटती थी और शाम को सबसे बड़ा घास का गठ्ठर लेकर घर आती थी। उनके दादाजी अपनी पेंशन लेने पौढी़ जाते थे तो वहाँ से किताबें लाते थे और वही किताबें पढ़ते हुए गीताजी का बचपन भी बीता। इस दौर में उन्होंने कई जाने माने साहित्यकारों की किताबें पढ़ी, तब तो वो समझ में नहीं आती थी लेकिन बाद में उन किताबों ने उन्हें जीने का ऐसा हौसला दिया कि आज तक कायम है। वो तब नवनीत नियमित रूप से पढ़ती थी।

उनकी माँ पूरे गाँव की औरतों की चिठ्ठियाँ लिखती थी और जिनकी चिठ्ठियाँ आती थी वो पढ़कर भी सुनाती थी। शादी के बाद उन्होंने पहाड़ की औरतें नाम से कविता लिखी जो आजतक उनकी श्रेष्ठ कविताओं में शुमार की जाती है। ये कविता तब साप्ताहिक हिंदुस्तान में प्रकाशित भी हुई।

गीताजी के जीवन के संघर्ष को उनके ही शब्दों में उनके पास बैठकर जानना और उन शब्दों की संवेदना को महसूस करना अपने आप में एक ऐसा अऩुभव था जो गाँव, पहाड़, भोले भाले ग्रामीणों और पहाड़ियों के रोजमर्रा के संघर्ष पर कोई फिल्म देख रहे हों। तो मुंबई में फिल्मी परदे पर अध नंगे नाचने वालों, देर रात पार्टियों में झूमने वाली नव धनाढ्य पीढ़ी के शोहदों की आवारागर्दी से हटकर भी बहुत कुछ होता है, और इसी से इस शहर ने रचनाकारों, साहित्य, कला, थिएटर और संघर्ष को जिंदा रखा है।

फेसबुक पर रश्मि रवीजा ने इस मुलाकात को कुछ ऐसे बयान किया…

जब भी कोई देस से आता है, मुम्बई वासी उसके सान्निध्य के लिए ललच जाते हैं। किसी गोष्ठी में जाने से कई मित्रों से एक ही जगह मुलाकात भी हो जाती है। मैं Geeta Gairola di से दो दिन पहले ही मिल चुकी थी फिर संवेदना रावत का नेह भरा आमंत्रण मिला और रीना पंत एवं विभा रानी का संदेश सो हम चल पड़े।

पिछली मुलाकात में गीता दी ने उत्तराखण्ड के विषय में बताया था इस बार उन्होंने जीवन के अपने अनुभव के विषय मे विस्तार से बात की। वे बचपन से ही हर गलत चीज़ का पुरजोर विरोध करती थीं। इस वजह से उनके जीवन में बहुत उथल पुथल भी रही । इस तथ्य से हम बहुत अच्छी तरह अवगत हैं कि अगर कोई लड़की छेड़छाड़ का विरोध करती है तो लोग उसी के विषय में बातें करने लगते हैं। इसी वजह से बाकी लड़कियाँ ऐसे चुप हो जाती हैं,जैसे उनके साथ कुछ हुआ ही ना हो। और विरोध करने वाली लड़की अकेली पड़ जाती है। पर गीता दी विचलित नहीं हुईं । उन्होंने अपना ये स्वभाव कायम रखा और यही वजह है कि उत्तराखण्ड की उन शिक्षिका के साथ मुख्मंत्री के व्यवहार के विरोध में मोर्चे की रूपरेखा वे मुम्बई में ही बैठी तैयार कर रही थीं और उन्हें वहाँ से अनगिनत फोन आ रहे थे।

गीता दी ने अपनी कुछ कविताएं भी पढ़ीं । अनूप सेठी जी, संवेदना रावत,चित्रा देसाई,असीमा भट्ट, पारूल ने सुंदर कविताएं सुनाईं। मनोरंजन दास जी ने बड़े गहरे स्वर में भूपेन हजारिका का एक गीत गाकर सुनाया ।बहुत देर हो गई थी वरना कुछ कवितायें और गीत और सुने जाते।

बेहद अनौपचारिक माहौल में आत्मीय बातचीत के दौर एवं संवेदना और अमिताभ जी के प्यार भरे आतिथ्य में एक सुंदर शाम गुजरी।

अवितोको रूम थियेटर का यह कार्यक्रम आयोजित करने के लिये संवेदना रावत का बहुत बहुत आभार।

रश्मि रवीजा का फेसबुक वाल https://www.facebook.com/rashmi.ravija



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