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शिक्षक की भाषा और प्रभावी अभिव्यक्ति क्षमता से निखरती है विद्यार्थी की प्रतिभा

राजनांदगांव । शासकीय दिग्विजय महाविद्यालय के हिंदी के विभाग के राष्ट्रपति सम्मानित प्राध्यापक और ख्याति प्राप्त प्रेरक वक्ता डॉ.चंद्रकुमार जैन ने उच्च शिक्षा के भाषायी परिवेश पर यादगार व्याख्यान दिया। भिलाई महिला महाविद्यालय में देश भर के आमंत्रित विद्वानों और शोधार्थियों की सहभागिता वाले गरिमामय आयोजन में डॉ. जैन ने शिक्षा, शिक्षण और सम्प्रेषण के महत्त्व पर इतना प्रभवशाली वक्तव्य दिया कि श्रोता चिंतन और आत्ममंथन के लिए विवश हो गए। प्राचार्य डॉ. ज़ेहरा हसन, हिन्दी विभागाध्यक्ष डॉ. निशा शुक्ला और अंग्रेजी विभागाध्यक्ष अनिता नरूला ने अभ्यागत विद्वानों के साथ डॉ. जैन का भावभीना सम्मान किया। डॉ. जैन ने भाषा से व्यक्तित्व निर्माण, भाषा और राष्ट्रीय एकता , भाषा और रचनात्मकता जैसे मुद्दों पर सारगर्भित और विचारोत्तेजक चर्चा की।

छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के अध्यक्ष डॉ. विनयकुमार पाठक के मुख्य आतिथ्य में अंग्रेजी और हिन्दी विभाग की आयोजित दो दिवसीय साझा राष्ट्रीय शोध संगोष्ठी में डॉ. जैन ने रिसोर्स पर्सन के रूप में प्रभावी भागीदारी की। डॉ.चंद्रकुमार जैन ने कहा कि संचार-विचार की नई अवधारणाओं के बीच अब पुराने मिथक टूटते जा रहे हैं। अब नीति और नियति के मध्य शिक्षा के मूल्यों पर कम उसके दाम पर ज्यादा जोर है। इसलिए सही नीयत के साथ शिक्षा व्यवस्था की सटीक मूरत गढ़ना एक जरूरत ही नहीं, चुनौती भी है। डॉ. जैन ने कहा जब पढ़ाई सिर्फ रोजगार का तलबगार बन गयी हो तब विद्यार्थी वही और उतनी ही भाषा सीखता है जिससे दुनिया के बाज़ार में वह अपनी जगह बना ले। उस भाषा के लिए वह फिक्रमंद नहीं दिखाई देता जिससे वह दुनिया वालों के दिलों में अपनी जगह बना ले।

डॉ. जैन ने कहा कि हमारी शिक्षा व्यवस्था भाषा को प्रायः एक विषय मानती रही है जबकि हम भूल जाते हैं कि वह विषय से बहुत आगे और सभी विषयों की माता है। एक कुशल शिक्षक को जिज्ञासु विद्यार्थी भी होना चाहिए। उसमें किसी की भाषा पर नहीं, अनेक भाषाओँ और विषयों में प्रवीण होने की चाह हो तो कोई आश्चर्य नहीं कि वह अपने विद्यार्थियों के साथ अधिक न्याय करेगा। रोज़ कुछ नए शब्द जानने की सीख देने से पहले एक शिक्षक अगर स्वयं हर दिन कुछ नया पढ़ने और पढ़े हुए को नए ढंग से साझा करने की आदत डाल ले तो शिक्षा और भाषा का परिदृश्य निखर सकता है। उन्होंने जोर देकर कहा कि शिक्षा में क्रांति का शिक्षक की सम्प्रेषण क्षमता से गहरा सम्बन्ध है और सम्प्रेषण के लिए भाषा पर जानदार पकड़ बहुत जरूरी है।



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