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भुले बिसरे लोग
 

  • इतिहास के सुनहरे अक्षरों में लिखा है वीरांगना अवंतीबाई लोधी का नाम

    इतिहास के सुनहरे अक्षरों में लिखा है वीरांगना अवंतीबाई लोधी का नाम

    भारत में पुरुषों के साथ आर्य ललनाओं ने भी देश, राज्य और धर्म, संस्कृति की रक्षा के लिए आवश्यकता पडने पर अपने प्राणों की बाजी लगाईं है। गोंडंवाने की रानी दुर्गावती और झाँसी की रानी वीरांगना लक्ष्मीबाई के चरण चिन्हों का अनुकरण करते हुए रामगढ (जनपद मंडला- मध्य प्रदेश) की रानी वीरांगना महारानी अवंतीबाई लोधी ने सन 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में अग्रेंजो से खुलकर लोहा लिया था और अंत में भारत की स्वतंत्रता के लिए अपने जीवन की आहुति दे दी थी। वीरांगना महारानी अवंतीबाई लोधी का जन्म 16 अगस्त 1831 को मनकेहणी के जमींदार राव जुझार सिंह के यहां हुआ था। 20 मार्च 1858 को इस वीरांगना ने रानी दुर्गावती का अनुकरण करते हुए युध्द लडते हुए अपने आप को चारो तरफ से घिरता देख स्वंय तलवार भोंक कर देश के लिए बलिदान दे दिया।

  • सुनने की फुर्सत हो तो आवाज़ है पत्थरों में

    सुनने की फुर्सत हो तो आवाज़ है पत्थरों में

    ये कहानी है दिल्ली के ’शहज़ादे’ और हिसार की ’शहज़ादी’ की. उनकी मुहब्बत की. गूजरी महल की तामीर का तसव्वुर सुलतान फ़िरोज़शाह तुगलक़ ने अपनी महबूबा के रहने के लिए किया था.

  • वाकई मिर्ज़ा गालिब का अंदाज़े बयाँ और था…

    वाकई मिर्ज़ा गालिब का अंदाज़े बयाँ और था…

    ये मशहूर पंक्तियां हैं उर्दू एवं फ़ारसी भाषा के महान शायर मिर्ज़ा असद-उल्लाह बेग ख़ां उर्फ 'ग़ालिब' की जिन्हें उर्दू का सर्वकालिक महान शायर माना जाता है और फ़ारसी कविता के प्रवाह को हिन्दुस्तानी जबान में लोकप्रिय करवाने का भी श्रेय दिया जाता है।

  • तुलसीमय था मानस के राजहंस डॉ. बलदेव प्रसाद मिश्र जी का जीवन – डॉ.चंद्रकुमार जैन

    राजनांदगांव। ऐतिहासिक शोध के आधार पर तुलसी दर्शन के यशस्वी सृजेता डॉ. बलदेवप्रसाद मिश्र हिन्दी साहित्य की नहीं भारतीय मनीषा के प्रतिष्ठापक और उन्नायक हैं। शहर की साहित्य त्रयी की कीर्ति का पूरे देश में निरंतर प्रसार कर रहे दिग्विजय कालेज के प्रोफ़ेसर डॉ.चंद्रकुमार जैन ने उनकी जयन्ती पर कहा कि जिस प्रकार तुलसी का जीवन राममय था, उसी तरह डॉ.मिश्र अपने जीवन और कर्म में तुलसीमय थे।

  • परसाई : उत्पीड़ित शोषित अवाम की आवाज

    परसाई : उत्पीड़ित शोषित अवाम की आवाज

    हिंदी साहित्य में गंभीर और प्रतिबद्ध व्यंग्य लेखन कबीर, भारतेन्दु, बालमुकुन्द गुप्त की एक लम्बी परम्परा रही है. परसाई के समय में गंभीर साहित्यिक व्यंग्य रचना नहीं हो रही थी, साहित्य की इस धारा को साहित्यिक समाज में शूद्र यानि पिछड़ी व हल्की रचना समझा जाने लगा था

  • कौन याद करे, बाबा नागार्जुन को

    कौन याद करे, बाबा नागार्जुन को

    आज 30 जून को आन्दोलनधर्मी जन कवि बाबा नागार्जुन का 105वां जन्मदिन है।उनकी पुण्य स्मृति को कोटिशः नमन!! कबीर,धूमिल और नागार्जुन मूलतः विपक्ष के कवि हैं जो वर्चस्व वादी सत्ता के विरुद्ध प्रतिरोध की संस्कृति को समृद्ध करते हैं।

  • एक यादगार लम्हा अभिनेता देव आनंद के साथ

    एक यादगार लम्हा अभिनेता देव आनंद के साथ

    ये उस समय की बात है जब देव साहब का फ़िल्मी दौर हिंदुस्तान में अपनी ऊँचाइयों पर था. उनकी अदाओं और खूबसूरती पर महिलाओं और लड़कियों की धडकने उनका नाम लेने से ही बढ़ जाती थी.

  • सोवियत तानाशाह स्टालिन की बेटी ने एक भारतीय से शादी कर सबको चौंका दिया था

    सोवियत तानाशाह स्टालिन की बेटी ने एक भारतीय से शादी कर सबको चौंका दिया था

    तानाशाह स्टालिन की बेटी एक भारतीय की दीवानी थी और उससे शादी भी की थी।

  • पं. वंशीधर मिश्रः भारतीय राजनीति का एक गुमनाम सितारा

    पं. वंशीधर मिश्रः भारतीय राजनीति का एक गुमनाम सितारा

    आज भारत के चुनावी महापर्व पर मुझे कुछ पुराने समय के बेह्तरीन महापुरषों का स्मरण बरबस होता है जो मैने अपने पिता से दादा से, नाना से और मां से सुना आप सभी को बताता हूं!

  • राजनांदगाँव में मुक्तिबोध ; कुछ काव्य बिम्ब

    राजनांदगाँव में मुक्तिबोध ; कुछ काव्य बिम्ब

    हिंदी कविता के महानतम हस्ताक्षरों में से एक गजानन माधव मुक्तिबोध का छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव शहर से नाता कितना गहरा था,यह बताने की ज़रुरत शायद नहीं है। इतना याद रहे कि सन 1958 से मृत्यु पर्यन्त वे राजनांदगांव दिग्विजय कालेज में व्याख्याता रहे। यहीं उनके तत्कालीन आवास स्थल को मुक्तिबोध स्मारक के रूप में यादगार बनाकर वहां हिंदी के दो अन्य साहित्यकार पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी और डॉ.बलदेव प्रसाद मिश्र की स्मृतियों को संजोते हुए सन 2005 में एक सुन्दर संग्रहालय की स्थापना भी की गई है।

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