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भुले बिसरे लोग
 

  • क्रांतिकारी शहीद यतीन्द्रनाथ दास  (जतीन दास)

    क्रांतिकारी शहीद यतीन्द्रनाथ दास (जतीन दास)

    कलकत्ता में यतीन्द्र के घर १ अमिता घोष रोड पर आज विकट सन्नाटा है। कोई देशवासी उन दरो-दीवारों को अब नहीं देखता जहां कभी उस क्रांति-कथा का सपना बुना गया था जो इतिहास में 'लाहौर षड्यंत्र केस' के नाम से दर्ज है।

  • गोपाल राम गहमरी : एक जासूसी लेखक जिसको पढ़ने के लिए लोगों ने हिंदी सीखी

    गोपाल राम गहमरी : एक जासूसी लेखक जिसको पढ़ने के लिए लोगों ने हिंदी सीखी

    गोपालराम गहमरी के मौलिक जासूसी उपन्यासों की संख्या ही 64 है. अनूदित उपन्यासों को भी मिला दें तो यह 200 के करीब पहुंच जाती है.

  • रामकथा के अनोखे चितेरे : फादर कामिल बुल्के

    रामकथा के अनोखे चितेरे : फादर कामिल बुल्के

    श्रीराम को माध्यम बनाकर रचा गया भारतीय साहित्य तो विशाल है ही, विदेशी साहित्य का भी अलग महत्त्व है।

  • गामा पहलवान, जिनका नाम तब देश के बच्चे-बच्चे की जुबान पर था

    गामा पहलवान, जिनका नाम तब देश के बच्चे-बच्चे की जुबान पर था

    70 या 80 के दशक तक पैदा हुए बच्चों पर अनजाने ही समाजवाद का असर रहता था. हर बहस में कुछ सवाल घूम-घूम कर आते.

  • देश की आजादी और शिक्षा के क्षेत्र में अहम् योगदान रहा स्वामी ब्रह्मानंद जी का

    देश की आजादी और शिक्षा के क्षेत्र में अहम् योगदान रहा स्वामी ब्रह्मानंद जी का

    देश की संसद में स्वामी ब्रह्मानंद जी पहले वक्ता थे जिन्होने गौवंश की रक्षा और गौवध का विरोध करते हुए संसद में करीब एक घंटे तक अपना ऐतहासिक भाषण दिया था। 1972 में स्वामी जी पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी के

  • परसाई के बहाने

    परसाई के बहाने

    हिंदी साहित्य के मशहूर व्यंग्यकार और लेखक हरिशंकर परसाई से आज कौन परिचित नहीं है और जो परिचित नहीं है उन्हें परिचित होने की जरूरत है. मध्य प्रदेश के होशंगाबाद के जमानी गाँव में 22 अगस्त 1924 में पैदा हुए परसाई ने लोगों के दिलों पर जो अपनी अमिट छाप छोड़ी है.

  • जो रचता है वह मारा नहीं जाता है

    जो रचता है वह मारा नहीं जाता है

    हि‍न्‍दी के सुप्रसि‍द्ध कवि‍ भगवत रावत की कविताओं को पढ़ते हुए लगता है, जैसे हम देश के उन आम-आदमियों से मिल रहे हैं जो इस पृथ्वी को कच्छप की तरह अपनी पीठ पर धारण किये हुए हैं पर उन्हें न इस बात का न भान है और न गुमान।

  • मुक्तिबोध स्मारक : साहित्य का सांस्कृतिक करिश्मा

    मुक्तिबोध स्मारक : साहित्य का सांस्कृतिक करिश्मा

    छत्तीसगढ़ की साहित्यिक संस्कारधानी राजनांदगांव में ,साहित्य विभूति गजानन माधव मुक्तिबोध, डॉ.पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी और डॉ.बलदेवप्रसाद मिश्र की स्मृति में बनाये गए मुक्तिबोध स्मारक-त्रिवेणी संग्रहालय के लिए बीबीसी पर अपने भावों को जिस अंदाज़ में व्यक्त किया था,उससे शहर के विधायक व छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ.रमन सिंह जी की संवेदनशीलता, संस्कारधानी राजनांदगांव के तत्कालीन कलेक्टर श्री गणेश शंकर मिश्रा की अटूट लगनशीलता तथा साहित्यिक-सांस्कृतिक विषयों व मुद्दों में उनकी उदार व परिष्कृत सोच का परिचय मिलता है।

  • इतिहास के सुनहरे अक्षरों में लिखा है वीरांगना अवंतीबाई लोधी का नाम

    इतिहास के सुनहरे अक्षरों में लिखा है वीरांगना अवंतीबाई लोधी का नाम

    भारत में पुरुषों के साथ आर्य ललनाओं ने भी देश, राज्य और धर्म, संस्कृति की रक्षा के लिए आवश्यकता पडने पर अपने प्राणों की बाजी लगाईं है। गोंडंवाने की रानी दुर्गावती और झाँसी की रानी वीरांगना लक्ष्मीबाई के चरण चिन्हों का अनुकरण करते हुए रामगढ (जनपद मंडला- मध्य प्रदेश) की रानी वीरांगना महारानी अवंतीबाई लोधी ने सन 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में अग्रेंजो से खुलकर लोहा लिया था और अंत में भारत की स्वतंत्रता के लिए अपने जीवन की आहुति दे दी थी। वीरांगना महारानी अवंतीबाई लोधी का जन्म 16 अगस्त 1831 को मनकेहणी के जमींदार राव जुझार सिंह के यहां हुआ था। 20 मार्च 1858 को इस वीरांगना ने रानी दुर्गावती का अनुकरण करते हुए युध्द लडते हुए अपने आप को चारो तरफ से घिरता देख स्वंय तलवार भोंक कर देश के लिए बलिदान दे दिया।

  • सुनने की फुर्सत हो तो आवाज़ है पत्थरों में

    सुनने की फुर्सत हो तो आवाज़ है पत्थरों में

    ये कहानी है दिल्ली के ’शहज़ादे’ और हिसार की ’शहज़ादी’ की. उनकी मुहब्बत की. गूजरी महल की तामीर का तसव्वुर सुलतान फ़िरोज़शाह तुगलक़ ने अपनी महबूबा के रहने के लिए किया था.

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