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  • सुन्दरी

    सुन्दरी

    ये तब की बात है जब मैं छोटा था. कोई चौदह पंद्रह साल का. हमारे गाँव में एक आदमी रहता था. नाम था विरजपाल. वह बहरा था तो जोर से बोलने पर सुनता था. लोग इसका फायदा उठा उससे मजाक किया करते थे. उसकी पत्नी भी थी. सुंदरी. नाम बेशक सुंदरी था लेकिन दिखने में आम महिला थी.

    • By: धर्मेन्द्र राजमंगल
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    • In: कहानी
  • थिएटर ऑफ़ रेलेवंस’ द्वारा   4 दिवसीय आदिवासी ‘युवाओं और बच्चों’ के लिए नाट्य कार्यशाला

    थिएटर ऑफ़ रेलेवंस’ द्वारा 4 दिवसीय आदिवासी ‘युवाओं और बच्चों’ के लिए नाट्य कार्यशाला

    7 -10 मई 2017, चिखलवाड़ी, त्र्यम्बकेश्वर , नासिक उत्प्रेरक : रंगचिन्तक मंजुल भारद्वाज ‘बेचने और खरीदने’ के मन्त्र से चलने वाले इस ‘मुनाफ़ाखोर’ भूमण्डलीकरण के दौर में मानव ने अपने ‘लालच’ की भूख को मिटाने के लिए ‘अंधाधुंध’ विकास के

  • भाजपा चलाएगी दल बदल एक्सप्रेस

    भारतीय जनता पार्टी के सत्ता में आने के बाद जिस तेजी से कांग्रेस से लेकर आप तक के नेता अपनी पार्टी छोड़कर भाजपा में जा रहे हैं और ये सिलसिला रुकने का नाम ही नहीं ले रहा है उसे लेकर भाजपा में इस बात पर चिंतन चल रहा है कि ऐसे लोगों के लिए दल बदल एक्सप्रेस के नाम से विशेष रेल चलाई जाए।

  • मुंशी प्रेमचंद की कहानी जिहाद सामने लाती है हिंदुओं का दर्द

    मुंशी प्रेमचंद की कहानी जिहाद सामने लाती है हिंदुओं का दर्द

    इस कहानी में मुंशी जी ने बहुत कम शब्दों में ही बहुत कुछ बता दिया है। जरूर पढ़ें... बहुत पुरानी बात है। हिंदुओं का एक काफ़िला अपने धर्म की रक्षा के लिए पश्चिमोत्तर के पर्वत-प्रदेश से भागा चला आ रहा था।

  • थिएटर ऑफ़ रेलेवंसः एक नया प्रयोग

    थिएटर ऑफ़ रेलेवंसः एक नया प्रयोग

    हमारा जीवन हर पल ‘राजनीति’ से प्रभावित और संचालित होता है पर एक ‘सभ्य’ नागरिक होने के नाते हम केवल अपने ‘मत का दान’ कर अपनी राजनैतिक भूमिका से मुक्त हो जाते हैं और हर पल ‘राजनीति’ को कोसते हैं ...और अपना ‘मानस’ बना बैठे हैं की राजनीति ‘गंदी’ है ..कीचड़ है ...हम सभ्य हैं ‘राजनीति हमारा कार्य नहीं है ... जब जनता ईमानदार हो तो उस देश की लोकतान्त्रिक ‘राजनैतिक’ व्यवस्था कैसे भ्रष्ट हो सकती है ? ....

  • देश के बँटवारे के बाद सीमा पर स्थित पागलखाने का विवाद कुछ यूँ सुलझा

    देश के बँटवारे के बाद सीमा पर स्थित पागलखाने का विवाद कुछ यूँ सुलझा

    बंटवारे के दो-तीन साल बाद पाकिस्तान और हिंदुस्तान की हुकूमतों को ख्याल आया कि अख्लाकी कैदियों की तरह पागलों का भी तबादला होना चाहिए, यानी जो मुसलमान पागल हिन्दुस्तान के पागलखानों में हैं उन्हें पाकिस्तान पहुंचा दिया जाय और जो हिन्दू और सिख पाकिस्तान के पागलखानों में है उन्हें हिन्दुस्तान के हवाले कर दिया जाय।

  • हर शहर में होता है एक बुध्दिजीवी

    मारे देश के हर शहर और गाँव में सभी तरह के लोग पाए जाते हैं। हर गाँव में नेता, पत्रकार, गुंडे, असामाजिक तत्व, अवारा और छुटभैयों के अलावा बुध्दिजीवी भी होते हैं। बुध्दिजीवियों का रुतबा इन सबसे अलग होता है। यानी पूरा गाँव या शहर एक तरफ और बुध्दिजीवी एक तरफ।

  • नागनाथ सांपनाथ का चुनावी उत्सव

    गजब ये है कि अपनी मौत की आहट नहीं सुनते, वो सबके सब परीशां हैं, वहां पर क्या हुआ होगा। दुष्यंत कुमार की यह ग़ज़ल कोयल एक पेड़ पर बैठी गा रही है .

  • अब बैंक के सामने से निकलने पर भी पैसे कटेंगे

    रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया के मार्गदर्शन में और मोदी जी के अच्छे दिनों को लाने के लिए काम कर रही सभी बैंकों ने तय किया है कि अब जो भी खाताधारक बैंक की शाखा के सामने से निकलेगा उसके खाते से भी पैसे कटेंगे। अभी यह तय नहीं किया गया है कि कितने पैसे कटेंगे, लेकिन सैध्दांतिक तौर पर सभी बैंक वाले इस बात पर राज़ी हो गए हैं कि इससे बैंकों की आमदनी भी बढ़ेगी, सड़कों पर लोग अवारागर्दी नहीं करेंगे और यातायात की समस्या भी सुधरेगी। पहले इसे कुछ बैंकों में लागू किया जाएगा इसके सफल होने

  • चुनाव और श्राध्दः एक अध्यात्मिक चिंतन

    चुनाव और श्राध्दः एक अध्यात्मिक चिंतन

    हमारे देश में दो चीजों का बड़ा महत्व है चुनाव और श्राध्द का। चुनाव तो गाहे बगाहे साल में एक बार या कई बार दो दो बार भी आ जाते हैं लेकिन श्राध्द तो साल में एक बार ही आते हैं। लेकिन दोनों में गजब की समानता है।

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