आप यहाँ है :

व्यंग्य
 

  • जैसे उनके दिन फिरे

    जैसे उनके दिन फिरे

    दूसरे दिन छोटे राजकुमार का राज्याभिषेक हो गया। तीसरे दिन पड़ोसी राज्य की गुणवती राजकन्या से उसका विवाह भी हो गया। चौथे दिन मुनि की दया से उसे पुत्ररत्न प्राप्त हुआ और वह सुख से राज करने लगा। कहानी थी सो खत्म हुई। जैसे उनके दिन फिरे, वैसे सबके दिन फिरें।

  • रिसॉर्ट का खेल

    रिसॉर्ट का खेल

    पिछले कुछ सालों से रिसॉर्ट का नाम जिस तरह से हमारे देश की राजनीति में स्थापित हुआ है। उससे लगता है कि ये स्थान देश के बड़े शहरों में किसी तीर्थ स्थान से कम नहीं है। रिसॉर्ट अब राजनीति के केन्द्र बन गये है।

  • होली के रंग कुछ ऐसे भी

    होली के रंग कुछ ऐसे भी

    राजनीतिक लोग आपस में आरोप-प्रत्यारोप के गुब्बारे आये दिन फेंकते रहते हैं. संसद में जुबानी गुलाल-अबीर की बौछार भी करते रहते हैं. इनकी एक खास पहचान है रंगहीन होते हुए भी ये सभी रंगों को मिलकर काला रंग बनाते है और ये स्याह लोग सफेदपोश कहलाते है .

  • प्रेम दिवस पर प्रेमियों से आव्हान

    प्रेम दिवस पर प्रेमियों से आव्हान

    आज प्रेम दिवस पर मैं सभी प्रेमियों से आव्हान करता हूँ समाज तुम्हारा बहिष्कार करे तुम उससे पहले समाज का बहिष्कार कर दो और अपने प्रेमी या प्रेमिका के साथ प्रेम समाज में शामिल हो जाओ।

  • राजनीति में अंक गणित ही नहीं बीज गणित  का भी महत्व है

    राजनीति में अंक गणित ही नहीं बीज गणित का भी महत्व है

    राजनीति करने वाली ताकतें सच में बेहद ताकतवर होती हैं ।

  • दिवाली क्या गई जीना हराम कर गई

    दिवाली क्या गई जीना हराम कर गई

    उनकी सेहत की एक मात्र शुभ चिंतक याने उनकी धर्मपत्नी का सुबह घूमने जाने के लिए किया जाने वाला तगादा,जो उनके फेसबुक और व्हॉटसएप चलाते हुए दिनभर सोफे पर पड़े रहने

  • नियम तो एक सजा है

    नियम तो एक सजा है

    देश की सरकार से लेकर किसी भी छोटे बड़े आयोजन के मंच का माईक जिनके पास होता है। वो सारे नियम तोड़ने का अधिकार रखता है।

  • कब तक मात खाओगे मियां…!

    संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा घोषित 25 आतंकी संगठनों को पालने से अच्छा है आप अपने देश की भावी पीढ़ी के भविष्य की चिंता करें।

  • हनी की वैतरणी

    हनी की वैतरणी

    हमारे यहॉ जब भी ट्रैप होती है तो कुछ डायरियां, कुछ मोबाइल नम्बर और कुछ सीडी पकड़ने की खबरें अखबारों की सुर्खियाँ बनती है।

  • खुद मियाँ फजीहत…

    खुद मियाँ फजीहत…

    मैं कलमघसीट इतना ही लिख पाया था कि मेरे दाहिने हाथ में सप्ताह भर से हो रहा दर्द एकाएक बढ़ गया, तीव्र वेदना होने लगी। इस लिए लेखन कार्य को विराम देना पड़ा।

    • By: भूपेन्द्र सिंह गर्गवंशी
    •  ─ 
    • In: व्यंग्य

Back to Top