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व्यंग्य
 

  • सात दशक की स्वतंत्रता और चंदू भैया की शोध डायरी

    सात दशक की स्वतंत्रता और चंदू भैया की शोध डायरी

    स्वतंत्रता का स्वच्छंदता में बदलना एक गहन शोध का विषय है। पर भारत में शोध बिना सरकारी सहायता के संभव नहीं है और कोई भी सरकार स्वतंत्रता के स्वच्छंदता में बदलने के कारण पर शोध करवाने में कोई रुचि नही रखती

  • फेसबुकिया वैराग्य

    फेसबुकिया वैराग्य

    अल सुबह एक भुक्तभोगी कवि ने ईमानदारी से कमेंट किया- ‘चंचल जी ये आभासी दुनिया है। किसी बात के लिए बुरा मान कर प्रस्थान भी कर गये तो आपको फूफाजी की तरह मनाने कोई नहीं आने वाला। आपके होने न होने से फेसबुक

  • किसम-किसम के लोग

    किसम-किसम के लोग

    किस्में तो ओर भी है पर उपरोक्त लिखी कुछ किस्मों के अलावा साहित्यकारों,कवियों,कलाकारों,ज्ञानियों,परम ज्ञानियों को इसमें शामिल नहीं किया जा सकता है। यह लघु शोध पत्र केवल साधारण मनुष्यों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है।

  • चलो, फुर्सत हो गई अब मर जाओ‍!

    चलो, फुर्सत हो गई अब मर जाओ‍!

    उनको अब न ताने सुनने पड़ रहे है और न ही कोई घर से बाहर जाने को बोलता है। घर के लोग भी सोचते है पड़ा रहने दो, घर से बाहर गया तो न जाने कहॉ से सामान के साथ कोरोना ले आया तो लेने के देने पड़ जाएंगे।

  • हिंदी साहित्य के इतिहास में तालाबंदी काल

    हिंदी साहित्य के इतिहास में तालाबंदी काल

    फेसबुक के माध्यम से ऑनलाइन आने वालों ने भी लॉकडाउन काल में कुछ कम योगदान नहीं दिया है। रोज किसी ना किसी विषय को लेकर घंटों लंबी चर्चाएं करते है। जो चर्चाएं अभी तक बंद कमरे या किसी स्कुल के हाल में होती थी

  • एक मध्यमवर्गीय कुत्ता

    एक मध्यमवर्गीय कुत्ता

    थोड़ा-सा मरी आवाज में गुर्राया। आसपास वे आवारा कुत्ते भौंक रहे थे, पर यह उनके साथ भौंका नहीं। थोड़ा गुर्राया और फिर निढाल पड़ गया। मैंने मेजबान से कहा, 'आज तुम्हारा कुत्ता बहुत शांत है।'

  • ऑनलाइन: तब और अब

    ऑनलाइन: तब और अब

    आज हमें ऑनलाइन होने के लिए मोबाइल, लेपटॉप, कंम्प्यूटर इत्यादि साधनों की आवश्यकता पड़ती है परंतु उन मनीषियों ने तो अपने तपोबल,योगबल साधना से अपने शरीर को ही ऑनलाइन कर रखा था,

  • आलोचना जीवन का सत्य है

    आलोचना जीवन का सत्य है

    उस रात सुलोचना के कोमल हाथ अपने हाथों में ले पाए बिना भी मैंने सच-सच कह दिया - 'सुलोचना! आलोचना का मापदंड परिस्थितियों के साथ बदलता है। समूचा हिंदी जगत तीन भागों में बँटा है।

  • “अतिथि! तुम कब आओगे…?”

    “अतिथि! तुम कब आओगे…?”

    बेवज़ह कई-कई दिनो तक जमे रहने वाले हे अतिथि! सानंद रहने वाला घर, बुद्धिमान बच्चे, मनभावन पत्नी,अच्छे व सच्चे मित्र, ईमानदार नौकर, नित्य अतिथियों का आदर-सत्कार, ईश्वर की आराधना,

  • मैडम कोरोना की प्रेस कॉन्फ्रेंस

    मैडम कोरोना की प्रेस कॉन्फ्रेंस

    मेरा तो एक ही भारत की जनता से निवेदन है कि मुझसे गले मिलो मेरे शौहरों से गले मिलो हम आप को सीधे जन्नत में भेज देंगे। भारत सरकार से अपील करूंगी कि मुँह पर

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