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व्यंग्य
 

  • मैं और बकरी

    मैं और बकरी

    उन दिनों हम भाइयों का स्वास्थ्य अचानक ही काफी अच्छा होने लगा था तथा हमें गांधीजी की इस बात पर भरोसा होने लगा था कि बकरी का दूध सेहत के लिए सर्वोत्तम होता है।

  • पुलिस मंत्री का पुतला

    पुलिस मंत्री का पुतला

    इतने में रामलीला का मौसम आ गया। एक बड़े पुलिस अफसर को ‘ब्रेनवेव’ आ गई। उसने रामलीलावालों को बुलाकर कहा,

  • आंख मार भाषण

    आँख मानव जीव का एक ऐसा अंग है जिसके देखने अलावा और कई मुख्य कार्य हैं। ये देश के विज्ञानियों के लिये बहुत महत्वपूर्ण विषय माना जाना चाहि

  • स्व. शरद जोशी की इन पाँच  लघु  कथाओँ से  समझिये आपातकाल क्या था !

    स्व. शरद जोशी की इन पाँच लघु कथाओँ से समझिये आपातकाल क्या था !

    हिंदी के जाने माने व्यंग्यकार स्व. शरद जोशी ने अपनी व्यंग्य रचनाओं से देश को झकझोर दिया था। आपतकाल में जब अखबार से लेकर फिल्मी गानों तक पर सरकारी शिंकजा कसा हुआ था, ऐसे में शरद जोशी ने अपनी धारदार कलम से आपातकाल के फरेब को जिस साहस के साथ उजागर किया,

  • माननीयों का नॉन स्टॉप  महाभारत …!!

    माननीयों का नॉन स्टॉप महाभारत …!!

    फिल्मी दंगल के कोलाहल से काफी पहले बचपन में सचमुच के अनेक दंगल देखे । क्या दिलचस्प नजारा होता था। नागपंचमी या जन्माष्टमी जैसे त्योहारों पर मैदान में गाजे - बाजे के बीच झुंड में पहलवान घूम - घूम कर अपना जोड़ खोजते थे।

  • वो टॉर्च बेचता रहा, दूसरा प्रकाश पुंज बन गया

    वो टॉर्च बेचता रहा, दूसरा प्रकाश पुंज बन गया

    वह पहले चौराहों पर बिजली के टार्च बेचा करता था । बीच में कुछ दिन वह नहीं दिखा । कल फिर दिखा । मगर इस बार उसने दाढी बढा ली थी और लंबा कुरता पहन रखा था ।

  • आप हमारे लीडर नहीं हो …!

    आप हमारे लीडर नहीं हो …!

    पहले दिल्ली और लखनऊ में टिकट के लिए हाथ फैलाते हैं फिर जनता के पास आकर वोट के लिए । अगर आपकी दिल्ली -लखनऊ में बात नही बनी तो वहीं विचारों में मतभेद बताकर आप दूसरी पार्टी में भी छलांग लगाकर कूदने से बाज नही आते हो ।

  • सेल्फी चिंतन

    एक महाशय सुबह से इसी बात पे नाराज थे कि जिसे देखो वो सेल्फी खींच कर डालने पर अड़ा है, पड़ा है सड़ा है . सेल्फी देख देखकर कुढा रहे थे.' मैंने भी पूछ ही लिया -"क्या हुआ भाई क्यों बडबडा रहे हो... बैठे बैठे.'

  • बेवकूफी का तमाशा

    बेवकूफी का तमाशा

    अप्रैल आने वाला था. बेवकूफ बनाने वाले लोगों को बेवकूफ बनाने की फ़िराक में थे. वैसे अब कोई महीना निश्चित नहीं है. अप्रैल का महीना भी अपमानित हो रहा है कि आखिर बेवकूफ बनाने का दर्जा हमसे क्यों छीन लिया है. अब तो हर दिन बेवकूफ बनाया जा रहा है अवाम को.

  • ईमानदारी का पर्व और वो

    क रात जब देश सोने की तैयारी कर रहा था, उस वक्त देश के आला अधिकारी ने बड़े नोटों को बंद करने का ऐलान कर दिया. जिस ऐलान को देश हित में बताया गया. अगले दिन सुबह बैंक बंद दो दिन एटीएम बंद. रातोंरात मेहनत से कमाया पैसा कागज के टुकड़े हो गये.

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