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  • दम तोड़ती संवेदनाएं…

    दम तोड़ती संवेदनाएं…

    भारतवर्ष महादानियों व परोपकारियों का देश माना जाता है। यदि हम अपने देश में चारों ओर नज़र उठाकर देखें तो लगभग प्रत्येक राज्य में लंगर,भंडारे,छबीलें,मुफ्त स्वास्थय सुविधाएं,गरीब कन्याओं की शादियां,आंखों के मुफ्त ऑप्रेशन कैंप,गरीबों को सर्दियों में स्वेटर तथा कंबल बांटने,गरीब बच्चों को मुफ्त शिक्षा देने जैसी गतिविधियां संचालित होती दिखाई देती हैं। इन्हें देखकर तो यही प्रतीत होता है गोया परोपकारियों के इस देश में किसी गरीब व्यक्ति को किसी भी प्रकार की दु:ख-तकलीफ तो हो ही नहीं सकती। इसमें कोई संदेह भी नहीं कि गरीबों के कल्याण के लिए संचालि

  • कावेरी पर राजनीतिक कालिमा क्यों?

    कावेरी पर राजनीतिक कालिमा क्यों?

    एक बार फिर कावेरी जल बंटवारे के मसला चर्चा में है। अदालत ने जल बंटवारे के बारे में फैसला फरवरी में ही सुना दिया था। दरअसल सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार का पक्ष रखते हुए अटॉर्नी जनरल के.के. वेणुगोपाल ने कहा कि ड्राफ्ट कैबिनेट के सामने पेश किया गया है, लेकिन प्रधानमंत्री के कर्नाटक चुनाव में व्यस्त होने के कारण वह अभी तक इसे देख नहीं पाए हैं। केंद्र

  • लाल बाग बस्ती उजड़ने-बसने की कहानी

    लाल बाग बस्ती उजड़ने-बसने की कहानी

    नई दिल्ली के मानसरोवर मेट्रो स्टेशन के ठीक बगल में एक बस्ती है लाल बाग। इस जगह जाने से इंडिया और भारत का फर्क नजर आ जाता है। यह बस्ती तीन भागो में बंटी हुई है, पहले भाग में फ्लाईओवर के नीचे राजस्थान का परिवार रहता है, दूसरे भाग में यूपी और बिहार के लोग रहते हैं, तीसरे भाग मे, जो कि रेलवे और मेट्रो की जमीन पर बसा हुआ है वहां पर यूपी के बराबंकी और फैजाबाद जिले के बंजारा, जाट, नट, समुदाय के 300 परिवार रहता है। यह परिवार सड़क से कबाड़ चुनने, ढोल-ताश बजाने और निंबू मिर्च बेचने का काम करता है। बस्ती में पानी के एक टैंकर से यह 300 परिवार अपनी प्यास बुझाते थे और दूसरे तरह के कामों के लिए बस्ती में स्थित रैन बसेरा के मोटर के द्वारा निकले पानी पर निर्भर रहते थे।

  • बदहाल शिक्षा व्यवस्था: जिम्मेदार कौन?

    बदहाल शिक्षा व्यवस्था: जिम्मेदार कौन?

    कुछ दिनों पहले हुई उत्तर प्रदेश बोर्ड की परीक्षाओं में जो तथ्य सामने आए हैं, वह वाकई में शर्मसार कर देने वाले हैं। या यूं कहें कि जिन तथ्यों को सरकार द्वारा जनता को एक सुंदर थाली में सजाकर पेश किया गया है, वह चैकाने वाले हैं। दस लाख से अधिक परीक्षार्थियों ने इस वर्ष उत्तर प्रदेश बोर्ड परीक्षाएं छोड़ दी हंै, और जिस प्रकार उत्तर पुस्तिकाओं को जांचा जा रहा है उसको देख बस हंसी ही आती है। प्रदेश के डिप्टी सी.एम डॉ. दिनेश शर्मा की माने तो यह सब नकल माफियाआंे पर सख्ती व मुख्यमंत्री जी के जादुई ग्यारह निर्देशांे का असर है। परंतु सवाल उठता है कि आखिर क्यों इन छात्र-छत्राओं को इनकी जरूरत पड़ी ? क्या कक्षा में शिक्षक उपस्थित नहीं थे ? या छात्र ही अनुपस्थित रहे ? कई वर्षांे से ये ट्रेंड बन गया है, आप विद्यालय बिना जाए भी 70ः अंक प्राप्त कर सकते हैं। प्रयोगात्मक परीक्षाओ में उपस्थित अनिवार्य नहीं है, बस रुपये भिजवा दो काम हो जाएगा। कुछ परीक्षा केंद्र तो आपकी अनुपस्थित में भी मुख्य परीक्षा करवाने की सहूलियत दे देते हैं। शिक्षा व्यवस्था का यह ट्रेंड विद्यार्थी को अंक तो दिला सकता है,परंतु ज्ञान नहीं। जिस कारण हमारे देश व प्रदेश में डिग्री धारकों की संख्या में लगातार वृद्धि हो रही है। वर्तमान के डिग्री धारक के पास बस डिग्री है, ज्ञान नहीं। सिर्फ डिग्री से रोजगार नहीं मिलता, परन्तु हृदय को झूठी सन्तुष्टि जरूर मिल जाती है।

  • कठुआ बर्बर दुष्कर्म मामला सीबीआई को सौंपा जाना चाहिए

    कठुआ बर्बर दुष्कर्म मामला सीबीआई को सौंपा जाना चाहिए

    इस समय पूरे देश में उबाल है। वास्तव में जम्मू के कठुआ में एक आठ साल की बच्ची आसिफा के साथ बर्बरता की जो घटना सामने आई है वह किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को अंदर से हिला देने वाली है। अभी तक जो कुछ सामने आया है उसे सच मान लें तो इसकी तुलना यदि किसी घटना से की जा सकती है तो दिसंबर 2012 में दिल्ली में हुई निर्भया कांड से। सामान्यतः जब भी ऐसी वीभत्स घटना कहीं घटती है तो पूरे देश में गुस्सा पैदा होता है और एक ही आवाज उठती है कि दोषियांे को कड़ी से कड़ी सजा दी जाए। ऐसी प्रतिक्रिया बिल्कुल स्वाभाविक है। कठुआ मामले में पुलिस ने जो आरोप पत्र दाखिल किया है उससे गुस्सा और बढ़ा है। इसमें बच्ची को पकड़कर बंधक बनाए रखने, नशीली दवाएं खिलाने, लगातार बलात्कार करने और फिर मार दिए जाने का जो विवरण है वह एकदम जमे हुए खून मंे भी उबाल पैदा कर देता है। आरोप पत्र में एसपीओ के बारे में कहा गया है कि जब सब उसकी हत्या करने जा रहे थे तो उसने कहा कि थोड़ा रुक जाओ एक बार और बलात्कार कर लूं और उसने किया। यही नहीं उन लोगों ने उसकी हत्या करने के बाद पत्थरों से कुचला। एक आठ साल की लड़की साथ ऐसा होने की कथा हमारे सामने आएगा तो प्रतिक्रिया क्या और कैसी होगी? किंतु सम्पूर्ण जम्मू और कठुआ का माहौल देखिए तो अलग ही तस्वीर है। वहां जांच करने वाली पुलिस टीम के खिलाफ भी चारों ओर आक्रोश है। पूरा जम्मू

  • विकास के नाम पर पर्यावरण की उपेक्षा क्यों?

    विकास के नाम पर पर्यावरण की उपेक्षा क्यों?

    ‘सबका साथ, सबका विकास’ वर्तमान सरकार का नारा है, यह नारा जितना लुभावना है उतना ही भ्रामक एवं विडम्बनापूर्ण भी है।

  • जोखिमभरा बचपन सभ्य समाज की त्रासदी

    जोखिमभरा बचपन सभ्य समाज की त्रासदी

    इक्कीसवीं सदी का सफर करते हुए तमाम तरह के विकास के वायदें तब खोखले साबित हो रहे हैं जब हम अपने बचपन को उपेक्षित होते एवं कई तरह के खतरों से जूझते देखते हैं। निश्चित रूप से यह चिंताजनक है और हमारी विकास-नीतियों पर सवाल भी उठाती है।

  • सुकमा में फिर जवानों की शहादत से उठे सवाल

    सुकमा में फिर जवानों की शहादत से उठे सवाल

    छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले में नक्सलवादियों ने सीआरपीएफ के नौ जवानों की नृशंस हत्या करके करोड़ों देशवासियों को आहत किया है। घात लगाकर बैठे इन नक्सलियों ने किस्टाराम थाना क्षेत्र के पलोड़ी में शक्तिशाली विस्फोट में सीआरपीएफ के वाहन को उड़ा दिया। विस्फोट के बाद नक्सलियों ने गोलीबारी भी की। इस प्रकार की नक्सलियों की […]

  • मूर्तियां गिराना भयभीत करता है

    मूर्तियां गिराना भयभीत करता है

    त्रिपुरा का यह दृश्य सारी मीडिया की सुर्खियां बनी जिसमें एक जेसीबी से लेनिन की मूर्तियां तोड़ी जा रहीं हैं। उसके बाद वहां भारत माता की जय के नारे लगे। कुल मिलाकर त्रिपुरा में दो स्थानों पर लेनिन की मूर्तियांें को गिरा दिया गया। यह घटना पहली नजर में चिंता पैदा करती है। चूंकि इस समय कम्युनिस्ट पार्टियों की हार और भाजपा तथा उसके सहयोगी दल इंडिजेनस पीपुल्स्ट फ्रंट ऑफ त्रिपुरा की विजय हुई है इसलिए स्वाभाविक ही इन हिंसक घटनाओं के लिए उन्हें ही दोषी ठहराया गया है। ऐसी घटनाओं की समर्थन कोई विवेकशील व्यक्ति नहीं कर सकता। हालांकि यह मानने का कोई कारण नहीं है कि भाजपा एवं संघ के केन्द्रीय नेतृत्व ने ऐसा करने का किसी तरह संकेत भी दिया होगा। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से लेकर भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने इस पर नाराजगी भी प्रकट की है। अमित शाह ने तो यहां तक कहा है कि अगर उनकी पार्टी के लोग इसमें शामिल पाए जाएंगे तो उनके खिलाफ कार्रवाई होगी। तो क्या यह मान लिया जाए कि भाजपा के दोनों शीर्ष नेताओं की नाराजगी तथा हर ओर से इसकी आलोचना के बाद मूर्तियां गिराने का काम आगे नहीं होगा? इसकी गारंटी नहीं दी जा सकती। त्रिपुरा, पश्चिम बंगाल एवं केरल में कम्युनिस्ट पार्टियों एवं भाजपा सहित पूरे संघ परिवार के बीच जिस तरह का टकराव रहा है उसमें दोनों के बीच सामान्य राजनीतिक प्रतिस्पर्धा नहीं है। दोनों के कार्यकर्ता एक दूसरे के साथ दुश्मनों जैसा व्यवहार करते हैं। वास्तव में लेनिन की मूर्तियां गिराया जाना इसका दुश्मनी राजनीति का ही प्रकटीकरण है। इसलिए आगे क्या होगा कहना कठिन है। इस तरह की लड़ाई लंबी चलने वाली है और इसके परिणामों की भविष्यवाणी नहीं की जा सकती।

  • दरकते रिश्तों से खण्डित होता समाज

    दरकते रिश्तों से खण्डित होता समाज

    अपनी ही बेटी-बहू के साथ बलात्कार की रोंगटे खड़ी कर देने वाली दर्दनाक, वीभत्स, डरावनी खबरों को पढ़कर देश की संवेदना थर्रा जाती है, खौफ व्याप्त हो जाता है और हर कोई स्वयं को असुरक्षित महसूस करता है। ऐसी घटनाएं देशभर में बढ़ रही हैं। क्या हो गया है लोगांे को-सोच ही बदल चुकी है। रिश्ते और उनकी मर्यादाएं भारतीय संस्कृति पहचान हुआ करते थे, आज उनकी मर्यादा एवं शालीनता खंडित हो रही है। यही वजह है कि आपसी रिश्तों में मिठास अब नाममात्र की रह गई है। बेटी-बहू के साथ बलात्कार के अलावा महिलाओं पर हो रहे तरह-तरह के अत्याचार, हिंसक वार और स्टाॅकिंग की घटनाएं समाज के संवेदनाशून्य और क्रूर होते जाने की स्थिति को ही दर्शाता है। रिश्तों की बुनियाद का हिलना एवं विखण्डित होना एक गंभीर समस्या है।

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