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  • कब मिलेगा घाटी के विस्थापित हिंदुओं को न्याय ?

    कब मिलेगा घाटी के विस्थापित हिंदुओं को न्याय ?

    जम्मू-कश्मीर से हिंदू समाज को बाहर करने की तैयारी तो मुसलमानों ने आजादी के समय 1947 से पहले शुरू कर दी थी। पर उस समय तब उनकी आबादी इतनी ज्यादा नही थी, लेकिन बहुसंख्यक समाज पर उनके अत्याचार शुरु होने शुरु हो गए थे। 1980 के दशक में आते-आते उन्होंने हिंदुओं को सरेराह पीटना शुरु कर दिया था और माताओं बहनों की इज्जत को सरेराह बीच बाजार

  • सांकेतिक दलित भोज: इस ‘नाटक’ की ज़रूरत ही क्यों?

    सांकेतिक दलित भोज: इस ‘नाटक’ की ज़रूरत ही क्यों?

    भारतवर्ष कभी विश्वगुरू हुआ करता था,इस कथन को विश्व कितनी मान्यता देता है इस बात का तो पता नहीं परंतु इतना ज़रूर है कि हमारे देश में 21वीं शताब्दी में भी लोगों को इस बात के लिए शिक्षित किया जा रहा है कि वे खुले में शौच करने से बाज़ आएं,अपने घर व पास-पड़ोस में सफ़ाई रखें,जनता को अभी तक यही समझाया जा रहा है कि गंदगी फैलने से बीमारी व संक्रमण फैलता

  • हर गांव में पहुंची बिजली, अब हर घर को रौशन करने का लक्ष्य

    देश के सभी गांवों तक बिजली पहुंचाए जाने की सूचना से हर भारतवासी प्रसन्न होगा। हालांकि इस पर राजनीतिक बयानवाजी चलती रहेगी, इसका श्रेय लेने की होड़ भी पार्टियों के बीच जारी रहने वाली है। सरकार के दावों पर प्रश्न भी उठेंगे। यह हमारी राजनीति का स्थायी चरित्र है। लेकिन प्रधानमंत्री के ट्वीट एवं उर्जा मंत्रालय के दावों को स्वीकार करें तो मणिपुर के लेइसांग गांव के साथ दे

  • जनप्रतिनिधियों की सुविधाओं पर उठते सवाल

    सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश विधानसभा द्वारा पारित वह कानून निरस्त कर दिया है जिसके मुताबिक पूर्व मुख्यमंत्रियों को आजीवन सरकारी बंगले में रहने की सुविधा दी गई थी। कोर्ट का कहना है कि किसी को इस आधार पर सरकारी बंगला अलॉट नहीं किया जा सकता कि वह अतीत में किसी सार्वजनिक पद पर रह चुका है। बात केवल उत्तर प्रदेश की नहीं हैं, बात केवल सरकारी बंगले की ही नहीं है, बात जनप्रतिनिधियों को मिलने वाले वेतन, पेंशन एवं अन्य सुविधाओं की भी है। संविधान में सांसद, विधायक, विधान परिषद सदस्य, स्पीकर, डिप्टी स्पीकर, प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, मंत्रियों के वेतन-भत्ते और अन्य सुविधाओं के संबंध में निर्णय लेने का अधिकार संसद, विधानसभा और विधान परिषद को दिया गया है। दुनिया के अनेक देशों में जनप्रतिनिधियों को वेतन व अन्य सुविधा

  • न्यूनतम मजदूरी का कानून बनाने की जरुरत

    न्यूनतम मजदूरी का कानून बनाने की जरुरत

    हर वर्ष अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस मई महीने की पहली तारीख को मनाया जाता है। अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस को मई दिवस भी कहकर बुलाया जाता है। अमेरिका में 1886 में जब मजदूर संगठनों द्वारा एक शिफ्ट में काम करने की अधिकतम सीमा 8 घंटे करने के लिए हड़ताल की जा रही थी। इस हड़ताल के दौरान एक अज्ञात शख्स ने शिकागो की हेय मार्केट में बम फोड़ दिया, इसी दौरान पुलिस ने मजदूरों पर गोलियां चला दीं, जिसमें 7 मजदूरों की मौत हो गयी। इस घटना के कुछ समय बाद ही अमेरिका ने मजदूरों के एक शिफ्ट में काम करने की अधिकतम सीमा 8 घंटे निश्चित कर दी

  • कानून से ज्यादा जरूरी है सोच का बदलना

    कानून से ज्यादा जरूरी है सोच का बदलना

    बाल यौन उत्पीड़न संरक्षण कानून यानी पॉक्सो में संशोधन संबंधी अध्यादेश को केंद्रीय मंत्रिमंडल और फिर राष्ट्रपति की मंजूरी मिल गई। अब बारह साल से कम उम्र की बच्चियों के साथ बलात्कार करने वालों को मौत की सजा का प्रावधान किया जा सकेगा। प्रश्न है कि अभी तक पाॅक्सो कानून ही पूरी तरह से सख्ती से जमीन पर नहीं उतरा है तो उसे और कड़ा करना क्यों जरूरी है? हमारे देश में कानून बनाना आसान है लेकिन उन कानूनों की क्रियान्विति समुचित ढं़ग से न होना, एक बड़ी विसंगति है। क्या कारण है कि पाॅक्सों कानून बनने के बावजूद एवं उसकी कठोर कानूनी स्थितियों के होने पर भी नाबालिग बच्चियों से बलात्कार की घटनाएं बढ़ रही है। पिछले दिनों उन्नाव, कठुआ और सूरत आदि में नाबालिग बच्चियों के साथ सामूहिक बलात्कार की घटनाएं सामने आईं, तो देश भर से मांग उठी कि पॉक्सो कानून में बदलाव कर नाबालिगों के साथ बलात्कार मामले में फांसी का प्रावधान किया जाना चाहिए। क्या फांसी की सजा का प्रावधान कर देने से इस अपराध को समाप्त किया जा सकेगा? सोच एवं व्यवस्था में बदलाव लाये बिना फांसी की सजा का प्रावधान कारगर नहीं होगा।

  • न्यायपालिका को कठघरे में खड़ा मत करो महाराज

    न्यायपालिका को कठघरे में खड़ा मत करो महाराज

    देश में राजनीतिक विरोध का ऐसा माहौल पहले कभी नहीं देखा गया है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता के बीच अपनी राजनीतिक लड़ाई हारे हुए समस्त विपक्षी दल अब भाजपा और केंद्र सरकार को घेरने के लिए संवैधानिक संस्थाओं को भी निशाना बनाने में संकोच नहीं कर रहे हैं। जज बीएच लोया की कथित संदिग्ध मौत के मामले में जाँच की माँग को जब सर्वोच्च न्यायालय ने खारिज कर दिया, तो कांग्रेस सहित विपक्षी दलों एवं उनके समर्थक कथित बुद्धिजीवियों ने जिस प्रकार न्यायपालिका पर अविश्वास जताया है, वह घोर आश्चर्यजनक तो है ही, निंदनीय भी है। कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी से लेकर अन्य प्रमुख नेताओं ने न्यायपालिका को कठघरे में खड़ा करने का प्रयत्न किया है। सर्वोच्च न्यायालय ने स्वयं यह माना है कि इस प्रकरण के माध्यम से न्यायपालिका की विश्वसनीयता पर हमला बोला गया है। सर्वोच्च न्यायालय का यह कथन कांग्रेस नेताओं के वक्तव्यों ने सही साबित कर दिया।

  • सामाजिक क्रांति के अग्रदूत : बाबासाहब आंबेडकर

    सामाजिक क्रांति के अग्रदूत : बाबासाहब आंबेडकर

    सामाजिक समता, सामाजिक न्याय, सामाजिक अभिसरण जैसे समाज परिवर्तन के मुद्दों को प्रमुखता से स्वर देने और परिणाम तक लाने वाले प्रमुख लोगों में डॊ. भीमराव आंबेडकर का नाम अग्रणीय है. उन्हें बाबा साहेब के नाम से जाना जाता है. एकात्म समाज निर्माण, सामाजिक समस्याओं, अस्पृश्यता जैसे सामजिक मसले पर उनका मन संवेदनशील एवं व्यापक था. उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन ऊंच-नीच, भेदभाव, छुआछूत के उन्मूलन के कार्यों के लिए समर्पित कर दिया. वे कहा करते थे- एक महान आदमी एक आम आदमी से इस तरह से अलग है कि वह समाज का सेवक बनने को तैयार रहता है.

  • राजनीतिक अपराध का एक और काला पृष्ठ

    राजनीतिक अपराध का एक और काला पृष्ठ

    मूल्यों पर आधारित राजनीति करने का आश्वासन देने वालों से उन्नाव की एक घटना कुछ सवालों के जवाब मांग रही हैं। मुख्य सवाल तो यही है कि राजनीति का अपराधीकरण हो रहा है या अपराध का राजनीतिकरण? एक और सवाल यह है कि राजनीति के अपराधीकरण ने सिस्टम को नाकारा बना दिया है। आखिर लोग जाएं तो जाएं कहां? मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अगर यूपी को अपराधमुक्त बनाना चाहते हैं तो इस मामले में दोषी विधायक को राजनीति एवं प्रशासनिक संरक्षण क्यों मिला? भले ही यह यूपी का मामला है, पर पूरे देश की नजरें इस पर टिकी हैं क्योंकि यह मामला उस सत्ताधारी पार्टी के विधायक से जुड़ा है जो राजनीति को अपराधमुक्त बनाने की बात करती है। अब यह राज्य सरकार पर है कि वह इस धारणा की कसौटी पर खरी उतरती है या नहीं? इस मामले की जल्द से जल्द निष्पक्ष जांच सुनिश्चित नहीं होती है तो इसके दुष्परिणाम झेलने के लिये तैयार रहना होगा।

  • टीबी से बचाव ही टीबी का बेहतर उपचार

    टीबी से बचाव ही टीबी का बेहतर उपचार

    टीबी (क्षय रोग) एक घातक संक्रामक रोग है जो कि माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरक्लोसिस जीवाणु की वजह से होती है।

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