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  • मुसलमान : वक़्त बदला, हालात नहीं

    देश को आज़ाद हुए सात दशक बीत चुके हैं। इस दौरान बहुत कुछ बदल गया, लेकिन अगर कहीं कुछ नहीं बदला है, तो वह है देश के मुसलमानों की हाल

  • खतरे में है भारत की सांस्कृतिक अखंडता और विरासत

    खतरे में है भारत की सांस्कृतिक अखंडता और विरासत

    भारत देश एक बहु-सांस्कृतिक परिदृश्य के साथ बना एक ऐसा राष्ट्र है जो दो महान नदी प्रणालियों, सिंधु तथा गंगा, की घाटियों में विकसित हुई सभ्यता है, यद्यपि हमारी संस्कृति हिमालय की वजह से अति विशिष्ट भौगोलीय क्षेत्र में अवस्थित, जटिल तथा बहुआयामी है, लेकिन किसी भी दृष्टि से अलग-थलग सभ्य

  • राजनीतिक चंदे का नियमन जरूरी

    राजनीतिक चंदे का नियमन जरूरी

    राजनीतिक दलों को मिलने वाले विदेशी चंदे का मुद्दा एक बार फिर गरमा गया है। मामला 2016 में बने विदेशी चंदा नियमन कानून और 2018 में उसमें किए गए संशोधन का है। वर्ष 2019 में होने वाले आम चुनाव से पूर्व राजनीतिक दलों के पास आ रहे धन का नियमन एवं नियंत्रण जरूरी है। राजनी

  • कब रुकेगा भूख से मौतों का सिलसिला

    कब रुकेगा भूख से मौतों का सिलसिला

    देश में भूख से मौतों का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। पिछले दिनों भारतीय जनता पार्टी शासित प्रदेश झारखंड से भूख से मरने की ख़बरें आईं।

  • पश्चिम बंगाल में लोकतंत्र और मानवता की हत्या

    पश्चिम बंगाल में लोकतंत्र और मानवता की हत्या

    पश्चिम बंगाल में खूनी राजनीति के शिकंजे में फंसे लोकतंत्र का दम घुंट रहा है और वह सिसकियां ले रहा है। पंचायत चुनावों में तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने जिस प्रकार हिंसा का नंगा नाच किया था, उससे ही साफ जाहिर हो गया था कि बंगाल की राजनीति के मुंह खून लग गया है।

  • धर्मगुरुओं की बढ़ती महत्वाकांक्षाओं से मुक्ति मिले

    धर्मगुरुओं की बढ़ती महत्वाकांक्षाओं से मुक्ति मिले

    आज धर्म एवं धर्मगरुओं का व्यवहार एवं जीवनशैली न केवल विवादास्पद बल्कि धर्म के सिद्धान्तों के विपरीत हो गयी है। नैतिक एवं चरित्रसम्पन्न समाज बनाने का नारा देकर तथाकथित धर्मगुुुरुओं ने अपने भौतिक एवं आर्थिक साम्राज्य के विस्तार के लिये अशांति, अपवित्रता, असन्तलन एवं अंधकार को फैलाया है। राजनीति की ओर उनकी रवानगी, उनका व्यवसायी हो जाना, उनके सैक्स स्कैंडल का उछलना, उनके द्वारा महिलाओं का शोषण किया जाना गहरी सामाजिक बहस की मांग करता है। हाल में हमारे देश में ऐसे ही अनेक धर्मगुरुओं का उभार हुआ है। उनके प्रशंसकों की संख्या अब करोड़ों में है, उनका करोडों-अरबों का साम्राज्य है। इन तथाकथित बाबाओं एवं धर्मगुरुओं की अंध-भक्ति और अंध-आस्था कहर बरपाती रही है और उनसे जन-जीवन आहत है। इन विडम्बनापूर्ण स्थितियों ने अनेक प्रश्न खड़े किये हैं, मुख्य प्रश्न है कि कब तक इन धर्मगुरुओं एवं बाबाओं के स्वार्थों के चलते जनजीवन गुमराह होता रहेगा? कब तक इनकी विकृतियां से राष्ट्रीय अस्मिता घायल होती रहेगी? कब तक सरकारें इनके सामने नतमस्तक बनी रहेगी? कब तक कानून को ये अंगूठा दिखाते रहेंगे? कब तक जनता सही-गलत का विवेक खोती रहेगी?

  • दिल्ली की तमाशा सरकार

    दिल्ली की तमाशा सरकार

    अरविन्द केजरीवाल एवं उनकी सरकार हर दिन किसी नये घोटाले, भ्रष्टाचार के संगीन मामले, किसी अजीबोगरीब घटनाक्रम को लेकर चर्चित रही है और अब दिल्ली के मुख्य सचिव को मुख्यमंत्री निवास पर बुलाकर जिस तरह बेइज्जत किया गया है, उनके साथ मारपीट की गयी उसने तो सारी हदे पार पर दी है। यह घटना भारतीय लोकतंत्र को शर्मसार कर देने वाली घटना है। जिसने सिद्ध कर दिया है कि दिल्ली पर ऐसे लोगों की शासन है जिनकी निगाहों में संविधान और लोकतन्त्र द्वारा प्रदत्त विभिन्न शक्तियों और अधिकारों का अर्थ तानाशाही रौब जमाने के अलावा कुछ नहीं है।

  • बर्बादी रोकनी है, तो नमभूमि बचाएँ

    बर्बादी रोकनी है, तो नमभूमि बचाएँ

    विश्व नमभूमि दिवस - दो फरवरी, 2018 पर विशेष तल, वितल, सुतल में नमी न हो, तो भूमि फट जाये और हम सभी उसमें समा जायें। भूमि की ऊपरी परत में नमी न हो, तो चाहे जितने बीज बिखेरें, वे सोये ही रहेंगे; नन्हा अंकुर कभी बाहर नहीं आयेगा। हवा में नमी न हो, तो धरती तापघर में तब्दील हो जाये; नन्हा अंकुर दिन-दहाड़े झुलस जाये। नम हवा चलती है, तो फसलों में जरूर कुछ कीडों वाली छोटी-मोटी बीमारियां लाती है, लेकिन हवा में नमी न हो, तो फसल ही न हो; हम भूख से मर जायें। कितने पौधे हैं, जो अपनी जीवन-जरूरत का पानी मिट्टी से नहीं, हवा से लेते हैं। दुनिया में जैव विविधता का आंकड़ा लगातार घट रहा है। हवा की नमी में और कमी हुई, तो जैव विविधता का सत्यानाश तो तय है; हमारी सेहत का भी।

  • गांव, गरीब और किसान की सुुध लेता बजट

    गांव, गरीब और किसान की सुुध लेता बजट

    बजट हर वर्ष आता है। अनेक विचारधाराओं वाले वित्तमंत्रियों ने विगत में कई बजट प्रस्तुत किए। पर हर बजट लोगों की मुसीबतें बढ़ाकर ही जाता है। लेकिन इस बार बजट ने नयी परम्परा के साथ राहत की सांसें दी है तो नया भारत- सशक्त भारत के निर्माण का संकल्प भी व्यक्त किया है। इस बजट में कृषि, शिक्षा, कौशल विकास, रेलवे और अन्य बुनियादी ढांचागत क्षेत्रों के विकास के साथ-साथ किसानों, गांवों और गरीबों को ज्यादा तवज्जो दी गयी है। सच्चाई यही है कि जब तक जमीनी विकास नहीं होगा, तब तक आर्थिक विकास की गति सुनिश्चित नहीं की जा सकेगी। इस बार के बजट से हर किसी ने काफी उम्मीदें लगा रखी थीं और उन उम्मीदों पर यह बजट खरा उतरा है। शहरों के मध्यमवर्ग एवं नौकरीपेशा लोगों को अवश्य निराशा हुई है। इस बार आम बजट को लेकर उत्सुकता इसलिए और अधिक थी, क्योंकि यह मोदी सरकार के कार्यकाल का आखिरी पूर्ण बजट था। संभवतः इस बजट को नया भारत निर्मित करने की दिशा में लोक-कल्याणकारी बजट कह सकते हैं। यह बजट वित्तीय अनुशासन स्थापित करने की दिशाओं को भी उद्घाटित करता है।

  • भारत सरकार से ज्यादा जमीन चर्च के पास है

    भारत सरकार से ज्यादा जमीन चर्च के पास है

    ईसा मसीह ने दुनिया को शांति का संदेश दिया था। लेकिन गरीब ईसाइयों के जीवन में अंधेरा कम नहीं हो रहा। अगर समुदाय में शांति होती तो आज दलित – आदिवासी ईसाई की स्थिति इतनी दयनीय नहीं होती। भारत में सदियों से ऊंच-नीच, असमानता और भेदभाव का शिकार रहे करोडों दलितों आदिवासियों और सामाजिक हाशिए पर खड़े लोगों ने चर्च / क्रूस को चुना है लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि चर्च उनके जीवन स्तर को सुधारने की जगह अपने साम्राज्यवाद के विस्तार में व्यस्त है। विशाल संसाधनों से लैस चर्च अपने अनुयायियों की स्थिति से पल्ला झाड़ते हुए उन्हें सरकार की दया पर छोडना चाहता है। दरअसल चर्च का इरादा एक तीर से दो शिकार करने का है।

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