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श्रद्धांजलि
 

  • बलिदानदिवस :  “एक ऐसा पत्रकार जिसके लिए पत्रकारिता सदैव एक मिशन रहा

    बलिदानदिवस : “एक ऐसा पत्रकार जिसके लिए पत्रकारिता सदैव एक मिशन रहा

    25 मार्च के ही दिन गणेश शंकर विद्यार्थी जैसे महान शख्सियत ने देश की अखण्डता को बनाये रखने के लिए अपना बलिदान दिया था । आज वो हमारे बीच नही हैं पर उनके बताये गए आदर्श व् सिद्धांत जरूर आज भी हमें मजबूती प्रदान करते हैं । गणेश शंकर विद्यार्थी भारतीय पत्रकारिता के पितामह हैं ।

  • गौरक्षक समाजसेवी पत्रकार अशोक लुनिया नही रहे

    गौरक्षक समाजसेवी पत्रकार अशोक लुनिया नही रहे

    ज्जैन। गत दो दशको से गौरक्षा की लड़ाई लड़ने वाले समाजसेवी वरिष्ठ पत्रकार सच्चा दोस्त मीडिया समूह के स्वामी श्री अशोक लुनिया नही रहे. उज्जैन CHL अपोलो अस्पताल में दिनांक 16 मार्च को हार्ट फ़ैल होने के कारण श्री अशोक लुनिया का देहांत हो गया. उनके पुत्र विनायक लुनिया ने किया ने स्वर्गीय लुनिया को मुखाग्नि दी व अंतिम संस्कार किया।

  • देह के बाद अनुपम

    देह के बाद अनुपम

    जब देह थी, तब अनुपम नहीं; अब देह नहीं, पर अनुपम हैं। आप इसे मेरा निकटदृष्टि दोष कहें या दूरदृष्टि दोष; जब तक अनुपम जी की देह थी, तब तक मैं उनमें अन्य कुछ अनुपम न देख सका, सिवाय नये मुहावरे गढ़ने वाली उनकी शब्दावली, गूढ से गूढ़ विषय को कहानी की तरह पेश करने की उनकी महारत और चीजों को सहेजकर सुरुचिपूर्ण ढंग से रखने की उनकी कला के।

  • फिराक़ गोरखपुरीः   तू एक था मेरे अशआर में हज़ार हुआ

    फिराक़ गोरखपुरीः तू एक था मेरे अशआर में हज़ार हुआ

    फ़िराक़ गोरखपुरी बीसवीं सदी के वह शायर हैं, जो जंगे-आज़ादी से लेकर प्रगतिशील आंदोलन तक से जुडे रहे. उनकी ज़ाती ज़िंदगी बेहद कड़वाहटों से भरी हुई थी, इसके बावजूद उन्होंने अपने कलाम को इश्क़ के रंगों से सजाया. वह कहते हैं

  • अभागे ओम पुरी का असली दर्द और विधवा विलाप

    अभागे ओम पुरी का असली दर्द और विधवा विलाप

    ओम पुरी की मौत पर उस दिन नंदिता पुरी अगर बिलख बिलख कर रुदाली के अवतार में रुदन – क्रंदन करती नहीं दिखती, तो ओम पुरी की जिंदगी पर एक बार फिर नए सिरे से कुछ नया लिखने का अपना भी मन नहीं करता।

  • जाना एक जनकवि का….

    जाना एक जनकवि का….

    इन हृदयविदारक पंक्तियों के रचनाकार जगदीश ‘सुधाकर’ अभी इसी माह अपनी इहलीला समेटकर परलोक गमन कर गए. अपनी अंतिम साँस तक अभावों से जूझते रहे सुधाकर जी को लगभग छह महीने पहले जून 2016 में ‘ब्रेन-अटैक’ आया था.

  • ओम पुरी कोई यूं नहीं हो जाता !

    ओम पुरी कोई यूं नहीं हो जाता !

    मुंबई की उस जगमगाती रात की उस शानदार पार्टी में भारतीय सिनेमा के परम ज्ञानी किस्म के कुछ नामी लेखक, सम्मानित कलाकार और जाने माने निर्माता अपने अवाक कर देने वाले अंदाज में उपस्थित थे।

  • अनुपम स्मृति: मेरा कुर्ता पकड़कर अब कौन खींचेगा ? – राजेन्द्र सिंह

    अनुपम स्मृति: मेरा कुर्ता पकड़कर अब कौन खींचेगा ? – राजेन्द्र सिंह

    हम सभी के अपने श्री अनुपम मिश्र नहीं रहे। इस समाचार ने खासकर पानी-पर्यावरण जगत से जुडे़ लोगों को विशेष तौर पर आहत किया। अनुपम जी ने जीवन भर क्या किया; इसका एक अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि अनुपम जी के प्रति श्रृ़द्धांजलि सभाओं के आयोजन का दौर इस संवाद को लिखे जाने के वक्त भी देशभर में जारी है।

  • देश की जल संरक्षण की महान विरासत को फिर से जीवित कर गए अनुपम भाई

    देश की जल संरक्षण की महान विरासत को फिर से जीवित कर गए अनुपम भाई

    ऐसी विरली ही पुस्तकें होती हैं जो न केवल पाठक तलाशती हैं, बल्कि तलाशे पाठकों को कर्मठ सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में तराशती भी हैं। अपनी प्रसन्न जल जैसी शैली तथा देश के जल स्रोतों के मर्म को दर्शाती एक पुस्तक ने भी देश को हज़ारों कर्मठ कार्यकर्ता दिए हैं।

  • दो जोड़ी कपड़े और एक जोड़ी चप्पल वाला पर्यावरण का महान योध्दा

    दो जोड़ी कपड़े और एक जोड़ी चप्पल वाला पर्यावरण का महान योध्दा

    प्रसिद्ध पर्यावरणविद, जल संरक्षण कार्यकर्ता और गांधीवादी अनुपम मिश्रा का सोमवार दिल्ली के एम्स अस्पताल में निधन हो गया। वो 68 साल के थे। मिश्र पिछले कुछ सालों से प्रोस्ट्रैट कैंसर से पीड़ित थे।

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