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श्रद्धांजलि
 

  • ओम पुरी कोई यूं नहीं हो जाता !

    ओम पुरी कोई यूं नहीं हो जाता !

    मुंबई की उस जगमगाती रात की उस शानदार पार्टी में भारतीय सिनेमा के परम ज्ञानी किस्म के कुछ नामी लेखक, सम्मानित कलाकार और जाने माने निर्माता अपने अवाक कर देने वाले अंदाज में उपस्थित थे।

  • अनुपम स्मृति: मेरा कुर्ता पकड़कर अब कौन खींचेगा ? – राजेन्द्र सिंह

    अनुपम स्मृति: मेरा कुर्ता पकड़कर अब कौन खींचेगा ? – राजेन्द्र सिंह

    हम सभी के अपने श्री अनुपम मिश्र नहीं रहे। इस समाचार ने खासकर पानी-पर्यावरण जगत से जुडे़ लोगों को विशेष तौर पर आहत किया। अनुपम जी ने जीवन भर क्या किया; इसका एक अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि अनुपम जी के प्रति श्रृ़द्धांजलि सभाओं के आयोजन का दौर इस संवाद को लिखे जाने के वक्त भी देशभर में जारी है।

  • देश की जल संरक्षण की महान विरासत को फिर से जीवित कर गए अनुपम भाई

    देश की जल संरक्षण की महान विरासत को फिर से जीवित कर गए अनुपम भाई

    ऐसी विरली ही पुस्तकें होती हैं जो न केवल पाठक तलाशती हैं, बल्कि तलाशे पाठकों को कर्मठ सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में तराशती भी हैं। अपनी प्रसन्न जल जैसी शैली तथा देश के जल स्रोतों के मर्म को दर्शाती एक पुस्तक ने भी देश को हज़ारों कर्मठ कार्यकर्ता दिए हैं।

  • दो जोड़ी कपड़े और एक जोड़ी चप्पल वाला पर्यावरण का महान योध्दा

    दो जोड़ी कपड़े और एक जोड़ी चप्पल वाला पर्यावरण का महान योध्दा

    प्रसिद्ध पर्यावरणविद, जल संरक्षण कार्यकर्ता और गांधीवादी अनुपम मिश्रा का सोमवार दिल्ली के एम्स अस्पताल में निधन हो गया। वो 68 साल के थे। मिश्र पिछले कुछ सालों से प्रोस्ट्रैट कैंसर से पीड़ित थे।

  • इस किताब के आगे तमाम सक्सेस स्टोरी दम तोड़ देती है

    इस किताब के आगे तमाम सक्सेस स्टोरी दम तोड़ देती है

    इन दिनों पढ़ने की आदत कम हो रही है। लेकिन फिर भी कुछ रौशनदान ऐसे हैं जो आशा बंधाते हैं। अनुपम मिश्र ऐसे ही गांधीवादी हैं। गर्भनाल में नीलम कुलश्रेष्ठ का लेख पढ़ा तो आंखें भर आईं।

  • आपके लिए कौन रोएगा?

    आपके लिए कौन रोएगा?

    धनबल, बाहुबल, जनबल के इस युग में जहां सामाजिक परिर्वतन को सिरमौर बनने की दृष्टि से देखा जा रहा है, वहीं दूसरी ओर सामाजिक गिरावट के दौर में एक ऐसा व्यक्तित्व भी देखने को मिलता है, जो लोगों की आस्था का केंद्र बनता है।

  • आखिर पहेली जैसी क्यूं थी जयललिता !

    आखिर पहेली जैसी क्यूं थी जयललिता !

    जयललिता शुरू से ही आजाद जिंदगी जीना चाहती थीं, अपनी मर्ज़ी से। कोई और नियंत्रित करे, यह उन्हें कतई पसंद नहीं था। और ऐसा ही हुआ। वक्त ने उन्हें वह सब दिया, जो वह चाहती थीं। किसी न उन्हें रहस्यों की रानी कहा, तो किसी ने अबूझ पहेली बताया।

  • धर्मेंद्र के साथ एक हिन्दी  फिल्म की थी जयललिता ने, हिट था उनका डांस

    धर्मेंद्र के साथ एक हिन्दी फिल्म की थी जयललिता ने, हिट था उनका डांस

    छह बार तमिलनाडु की मुख्यमंत्री रहीं जयललिता राजनेता बनने से पहले तमिल, कन्नड़ और तेलुगु फिल्मों की बेहद सफल अभिनेत्री रही थीं लेकिन कम लोग जानते हैं कि उन्होंने एक हिंदी फिल्म भी की थी जो हिट रही रही थी और फिल्म में उन पर फिल्माया गया एक गीत हिंदी सिनेमा के सदाबाहर डांस-सॉन्ग में शुमार किया जाता है।

  • जब अपनी ही फिल्म  नहीं देख पाई थी जयललिता‍

    जब अपनी ही फिल्म नहीं देख पाई थी जयललिता‍

    जयललिता ने 1965 में अपनी पहली तमिल फिल्म “वेन्निरा अदाई” (सफेद लिबास) महज 16-17 साल की उम्र में की थी। अजीब संयोग ये रहा कि इस फिल्म को सेंसर बोर्ड ने “एडल्ट” श्रेणी का सर्टिफिकेट दिया था। इस तरह नाबालिग जयललिता खुद अपनी फिल्म सिनेमाघर में जाकर नहीं देख सकती थीं। माना जाता है कि उनकी फिल्म को एक गाने की वजह से एडल्ट सर्टिफिकेट दिया गया था।

  • फिदेल कास्त्रो के रुप में एक किंवदंती का अंत

    फिदेल कास्त्रो के रुप में एक किंवदंती का अंत

    90 वर्ष की उम्र में फिदेल कास्त्रो के निधन के साथं विश्व इतिहास के एक युग का अंत हो गया है। आज की पीढ़ी के लिए फिदेल कास्त्रो भले रोमांच पैदा करने वाला नाम नहीं है, पर 60 और 70 के दशक में पूरी दुनिया में सशस्त्र विद्रोह और क्रांति से तख्ता पलटने का ख्वाब देखने वालों के लिए फिदेल कास्त्रो लेनिन और माओ से ज्यादा प्रेरणादायी नाम बन गया था।

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