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श्रद्धांजलि
 

  • मॉडल से संत बने भ्ययू महाराज की आत्महत्या ने सबको चौंकाया

    मॉडल से संत बने भ्ययू महाराज की आत्महत्या ने सबको चौंकाया

    आध्यात्मिक गुरु भय्यू जी महाराज ने गोली मारकर आत्महत्या कर ली है. इंदौर के बॉम्बे अस्पताल में उनकी मौत की पुष्टि की है.

  • बिरसा मुंडा आज भी प्रासंगिक हैं

    बिरसा मुंडा आज भी प्रासंगिक हैं

    भारतीय इतिहास में बिरसा मुंडा एक ऐसे क आदिवासी नेता और लोकनायक थे जिन्होंने भारत के झारखंड में अपने क्रांतिकारी चिंतन से उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में आदिवासी समाज की दशा और दिशा बदलकर नवीन सामाजिक और राजनीतिक युग का सूत्रपात किया।

  • साहित्यकार अभिमन्यु अनत नहीं रहे

    साहित्यकार अभिमन्यु अनत नहीं रहे

    9 अगस्त, 1937 को त्रिओले, मॉरीशस में जन्मे अभिमन्यु अनत ने हिंदी शिक्षण, रंगमंच, हिंदी प्रकाशन आदि अनेक क्षेत्रों में कार्य किए हैं ।

  • श्रेयांस  : जीवंत रहेंगी निश्छल मुस्कान की निर्मल यादें

    श्रेयांस : जीवंत रहेंगी निश्छल मुस्कान की निर्मल यादें

    प्रभावित होना और प्रभावित करना जीवंतता का लक्षण है । कुछ लोग हैं जो प्रभावित होने को दुर्बलता मानते हैं । मैं इससे सहमत नहीं हूँ क्योंकि जो सहज से, सुंदर से, शालीन से, साधारण में छुपे निश्छल और निर्दम्भ असाधारण से प्रभावित नहीं होते, उन्हें संवेदनहीन कहना उचित है । जो जाग रहा है, वह जगत के भाव-प्रभाव से आदान-प्रदान का संबंध बनाकर ही जीवन-पथ पर आगे बढ़ता

  • क़तल की उस रात क्या हुआ था….

    क़तल की उस रात क्या हुआ था….

    इंदिरा गांधी के प्रधान सचिव रहे पीसी एलेक्ज़ेंडर ने अपनी किताब 'माई डेज़ विद इंदिरा गांधी' में लिखा है कि इंदिरा गांधी की हत्या के कुछ घंटों के भीतर उन्होंने ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट के गलियारे में सोनिया और राजीव को लड़ते हुए देखा था.

  • छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ पत्रकार श्री गोविंदलाल वोरा का निधन

    छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ पत्रकार श्री गोविंदलाल वोरा का निधन

    उनकी अंतिम यात्रा दोपहर बाद गीता नगर स्थित निवास से निकाली जाएगी, जबकि अंतिम संस्कार मारवाड़ी श्मशान घाट में किया जाएगी। वे राज्यसभा सांसद व वरिष्ठ कांग्रेसी नेता मोतीलाल वोरा के छोटे भाई और गिरीश और राजीव वोरा के पिता थे।

  • मुख्य मंत्री नाम भूल गए और ‘कवि’ से ‘बाल कवि’ बन गए बैरागी

    मुख्य मंत्री नाम भूल गए और ‘कवि’ से ‘बाल कवि’ बन गए बैरागी

    स्व. बालकवि बैरागी का जन्म 10 फरवरी 1931 को रामपुराग गांव में द्वारिकादास बैरागी एवं धापूबाई बैरागी के घर हुआ थ। उन्होंने अपनी पहली रचना 9 साल की उम्र में लिखी जब वे चौथी कक्षा में पढ़ते थे। यह कविता उन्होंने व्यायाम पर सुनाई थी।

  • संस्मरणः बालकवि बैरागी: वे कवियों में राजनीतिज्ञ और राजनेताओं में कवि थे

    संस्मरणः बालकवि बैरागी: वे कवियों में राजनीतिज्ञ और राजनेताओं में कवि थे

    इंदौर। वे कवियों में राजनीतिज्ञ और राजनेताओं के बीच कवि के रूप में माने जाते थे। अपने 70 साल के राजनीतिक जीवन में उन्होंने कभी पार्टी नहीं बदली। वे अपनी पार्टी के नेता नहीं, समर्पित कार्य

  • स्व.  बालकवि बैरागी ने लिखा थाः   मैं अपनी गंध नहीं बेचूंगा

    स्व. बालकवि बैरागी ने लिखा थाः मैं अपनी गंध नहीं बेचूंगा

    'चाहे सभी सुमन बिक जाएं, चाहे ये उपवन बिक जाएं, चाहे सौ फागुन बिक जाएं, पर मैं अपनी गंध नहीं बेचूंगा।' जैसी पक्तियां लिखने वाले बालकवि बैरागी जी रविवार की शाम इस दुनिया से रुखसत हो गए। हमारे

  • बालकवि बैरागी: बुझ गया ‘दीवट का दीप’

    बालकवि बैरागी: बुझ गया ‘दीवट का दीप’

    दीये की बाती जलती है तब सबको उजाले बांटती है। बीज उगता है तब बरगद बन विश्राम लेता है। समन्दर का पानी भाप बन ऊंचा उठता है तब बादल बन जमीं को तृप्त करने बरसता है। ऐसे ही लाखों-लाखों रचनाकारों की भीड़ में कोई-कोई रचनाकार जीवन-विकास की प्रयोगशाला मेें विभिन्न प्रशिक्षणों से गुजरकर महानता का वरन करता है, विकास के उच्च शिखरों पर आरूढ़ होता है और अपने लेखन, विचार एवं कर्म से समाज एवं राष्ट्र को अभिप्रेरित करता है। ऐसे ही एक महान् शब्दशिल्पी, समाज निर्माता एवं रचनाकार थे बालकवि बैरागी। दीवट पर दीप, हैं करोड़ों सू

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