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सोशल मीडिया से
 

  • इसलक्ष्या को कितने लोग जानते हैं

    • 1871 का एक कानून है जिसके अंतर्गत उस समय के 198 जनजाति समुदायों के एक करोड़ बीस लाख लोग जन्‍म से ही अपराधी मान लिये जाते थे। चोरी चकारी, उठाईगीरी, हर तरह के अपराध आदि ही उनका पेशा था। अपने पैरों पर खड़े होते ही बच्‍चे को जेब काटने की ट्रेनिंग और भारत ब्‍लेड […]

  • न्यू मीडिया बनाम पत्रकारिता का नया लोकतंत्र

    सूचना क्रांति के वर्तमान युग में समाचारों की दुनिया भी बहुत तेजी से बदल रही है. बार-बार कलमगोई  वाली पत्रकारिता के आदर्शों से विमुख होनेके सवाल उठाये जाते हैं, वहीं आज इसके विपरीत तेजी से कदम बढ़ा रही हैहिंदी वेब पत्रकारिता. वह अभिव्यक्ति का एक बेहद सशक्त माध्यम.  एक ऐसासंचार साधन जिसके जरिये अपनी हर […]

  • ट्विटर पर एक और सुविधा

    लोकप्रिय सोशल साइट ट्विटर (Twitter) ने  ‘retweet with comment’ नाम से एक नया फीचर लॉन्‍च किया है। इसमें यूजर अपनी पोस्‍ट में 140 शब्‍दों की सीमा के बिना भी दूसरे ट्वीट को भी शामिल कर सकते हैं।  इस फीचर पर काम करने के लिए retweet बटन पर क्लिक करने के बाद पॉप अप (Pop-up) मीनू […]

  • कानून सबके लिए बराबर है मगर…

    कानून सबके लिए कुछ इस तरह बराबर है कि किसी को केस लड़ने को वकील नहीं मिलता तो किसी को ज़मानत मिलने पर ज़मानत दार नहीं मिलता और किसी को 13 साल के मुकदमे के बाद चंद घंटों में ज़मानत मिल जाती है, लेकिन साहेबान याद रखें कानून सबके लिए बराबर है. हो सकता है […]

  • लेखकों की बातें, जॉर्ज बर्नार्ड शॉ (1856 – 1950) – अपन तो भई ऐसे हैं।

    • नोबल पुरस्‍कार प्राप्‍त 58 नाटक रचने वाले जॉर्ज बर्नार्ड शॉ का बचपन बहुत गरीबी में बीता था। उन्‍हें जेब खर्च के लिए 6 पेंस मिलते थे जिनसे बड़ी मुश्‍किल से दिन निकाल पाते। एक दिन फुटपाथ पर एक किताब देखी- 6 पेंस में कैसे दिन गुजारें। बड़ी मुश्‍किल से कई दिन तक एक एक […]

  • मीडिया वाले अपनी जाँच खुद करवाएँ

    नेताओं की गाली पड़ते ही मीडिया गोलबंद अर्थात एक हो जाता है। मनमोहन सिंह ने मीडिया पर कपट का आरोप लगाया था, मोदी ने बाजारू कहा, केजरीवाल ने सुपारीदार, वीके सिंह और अन्य अनेक नेता भी भद्दी उपमाएं इस्तेमाल कर चुके हैं। भद्दे प्रयोगों का निश्चय ही प्रतिकार होना चाहिए। ऐसे हमलों की घड़ी में […]

  • टूटती प्रतिमायें बिखरते विचार और भगवान बुद्ध

    कई संग्रहालय देखे और अधिकतर भगवान बुद्ध की खण्डित मूर्तियों से अटे पड़े हैं। निस्संदेह वे आक्रांता न केवल क्रूर थे अपितु मष्तिष्क से पैदल…केवल और केवल साम्राज्यवादी रहे थे अन्यथा कला-संस्कृति-धरोहर-साहित्य किसी के तो मायने उन्होंने समझे होते? मेरी स्मृति में बामियान की वह बुद्ध प्रतिमा साकार हो उठी जिसे तालिबानियों नें विस्फोट से […]

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