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भारत में इनोवेशन ‘नवाचार’ से जुड़ी चुनौतियां और अवसर

हमें अपनी सीमाओं के भीतर भारतीय इनोवेशन के लेकर विश्वसनीयता कायम करनी चाहिए और लोगों को यह विश्वास दिलाना चाहिए कि भारत में किए गए शोध की गुणवत्ता, विश्व में सर्वश्रेष्ठ हो सकती है.

देश के पहले जैव प्रौद्योगिकी यानी बायोटेक स्टार्टअप के रूप में मैंने साल 1978 में अपनी कंपनी ‘बायोकॉन’ की शुरुआत की. यह एक ऐसा दौर था जब इनोवेशन और उद्यमशीलता की बातें अनसुनी थीं. बायोकॉन ने बेहत कम पूंजी में, एक गैराज स्टार्टअप के रूप में अपनी यात्रा शुरू की, जिसमें मेरे अलावा कुल दो और कर्मचारी शामिल थे. आज बायोकॉन, इनोवेशन पर आधारित एक वैश्विक बायोफार्मास्यूटिकल (दवा और संबंधित उत्पाद बनाने वाली) कंपनी है, जो सस्ती जीवन-रक्षक दवाओं की वैश्विक ज़रूरतों को पूरा कर रही है.

बायोकॉन और इंफोसिस जैसी कंपनियों ने यह दिखाया है कि, उद्यमिता और इनोवेशन की ताक़त को उजागर करने से देश को कई तरह के लाभ मिल सकते हैं और लाखों भारतीयों के लिए यह बेहतर जीवन की शुरुआत हो सकती है.

वैश्विक स्वास्थ्य सेवा पर सकारात्मक प्रभाव डालने के अलावा, बायोकॉन ने कई सालों के अपने सफर के दौरान, 12,000 से अधिक नौकरियां पैदा की हैं. इसके अलावा बायोकॉन से संबंधित कई सहायक व्यवसायों ने भी भारत में रोज़गार पर सकारात्मक असर डाला है. बायोकॉन और इंफोसिस जैसी कंपनियों ने यह दिखाया है कि, उद्यमिता और इनोवेशन की ताक़त को उजागर करने से देश को कई तरह के लाभ मिल सकते हैं और लाखों भारतीयों के लिए यह बेहतर जीवन की शुरुआत हो सकती है.

जिस तरह बायोकॉन ने भारत में बायोटेक के शुरुआत की है, इंफोसिस ने भारत में 180 बिलियन अमेरिकी डॉलर वाले सूचना प्रौद्योगिकी उद्योग का बीज बोया है, जो सीधे चार मिलियन से अधिक लोगों को रोज़गार देता है. इसके अलावा 12 मिलियन अप्रत्यक्ष रोज़गार के अवसर भी पैदा हुए हैं और यह उद्योग आज देश की जीडीपी में आठ प्रतिशत का योगदान देता है.

भारत में भविष्य में विकास की संभावनाओं के लिए इनोवेशन और बौद्धिक संपदा यानी आईपी (intellectual property) का सृजन बेहद महत्वपूर्ण है. उद्यमियों को इस तरह व्यवसायों की नींव रखने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए, जो टिकाऊ हों और भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास में लंबे समय तक सहयोग कर सकें, ताकि देश आत्मनिर्भर हो और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा लोगों के समक्ष रखे गए ‘आत्मनिर्भर भारत’ के सपने को साकार किया जा सके.

इनोवेशन को बढ़ावा देने की ज़रूरत
भारत में, ‘इनोवेशन’ यानी नवाचार को लेकर बहुत सी चर्चाएं होती हैं, लेकिन ‘मेड इन इंडिया’ इनोवेशन यानी भारतीय कंपनियों द्वारा ईजाद किए गए, नए उत्पादों और तकनीकों पर शायद ही कभी चर्चा की जाती है.

अमेरिका में, मॉडर्ना थैरेप्यूटिक्स (Moderna Therapeutics) ने हाल ही में, कोरोनोवायरस की वैक्सीन के लिए तीसरे चरण के चिकित्सीय परीक्षणों की शुरुआत की और इस उत्पाद को जनता के सामने लाने से वह अब एक क़दम दूर है. मॉडर्ना ने 63 दिनों के रिकॉर्ड समय में वैक्सीन को केंब्रिज मैसेचुसेट्स स्थित लैब से इंसानी परीक्षणों तक पहुंचाया है. यह संभव हो पाया क्योंकि मॉडर्ना, आपरेशन वार्प स्पीड (Operation Warp Speed) के अमेरिकी अभियान से जुड़ी है, जो अमेरिका के स्वास्थ्य व सेवा विभाग के नेतृत्व में चलाया जा रहा एक अभियान है. इसके तहत कंपनियों को वैक्सीन की दिशा में तेज़ी से काम करने के लिए सरकारी सहयोग की नींव रखी गई है.

यह तथ्य कि मॉडर्ना कंपनी को अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा खुद प्रोत्साहन दिया गया, इस बात का स्पष्ट संकेत है कि अमेरिका में इनोवेशन को किस तरह सम्मानित और प्रोत्साहित किया जाता है, यह इस बात को भी समझाता है, कि क्यों अमेरिका लगातार अत्याधुनिक इनोवेशन को लेकर दुनिया में पहले स्थान पर है. इसके विपरीत, कर्नाटक सरकार, बायोटेक्नोलॉजी विभाग व जैव प्रौद्योगिकी उद्योग अनुसंधान सहायता परिषद (DBT-BIRAC) के सहयोग से बेंगलुरू स्थित, सेंटर फॉर सेल्युलर एंड मॉलिक्यूलर प्लेटफ़ॉर्म (C-CAMP), के मार्ग-दर्शन में काम कर रहे, बगवर्क रीसर्च (Bugworks Research) का अनुभव अच्छा नहीं रहा है.

मॉडर्ना कंपनी को अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा खुद प्रोत्साहन दिया गया, इस बात का स्पष्ट संकेत है कि अमेरिका में इनोवेशन को किस तरह सम्मानित और प्रोत्साहित किया जाता है, यह इस बात को भी समझाता है, कि क्यों अमेरिका लगातार अत्याधुनिक इनोवेशन को लेकर दुनिया में पहले स्थान पर है.

बगवर्क, दुनिया भर की उन चुनिंदा कंपनियों में से एक है, जो रोगाणुरोधी प्रतिरोध (antimicrobial resistance) की अत्यंत महत्वपूर्ण और बढ़ती वैश्विक समस्या के समाधान पर काम कर रही है. इस समस्या का वैश्विक स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है.

बैक्टीरिया जनित महामारी (Bacterial pandemics) उतनी ही भयावह और घातक हो सकती है, जितना कोविड-19 जो एक वायरस जनित महामारी है और जिसके चलते दुनिया भर में लाखों लोगों की मौत हो चुकी है. फिर भी, उपचार संबंधी प्रयोगों को आगे बढ़ाने के लिए, बगवर्क को आर्थिक मदद के लिए भारत के बाहर का रास्ता ढूंढना पड़ा. फंडिंग यानी वित्तीय पोषण के ताज़ा क्रम में कंपनी को जापान की यूनिवर्सिटी ऑफ टोक्यो एज कैपिटल (University of Tokyo Edge Capital), ग्लोबल ब्रेन कॉर्पोरेशन (Global Brain Corporation), और दक्षिण अफ्रीका के अक्विफार्मा होल्डिंग्स (Acquipharma Holdings) से 7.5 मिलियन अमेरिकी डॉलर की आर्थिक मदद मिली.

भारत में फंडिंग संबंधी सहयोग की कमी, भारतीय इनोवेटर्स व उद्यमियों को अपने आईपी अधिकारों को देश के बाहर ले जाने के लिए मजबूर करती है. परिणामस्वरूप भारत, ग्लोबल इनोवेशन इंडेक्स यानी विश्व नवाचार सूचकांक में काफ़ी पीछे रह गया है. साल 2019 में चीन की 14वीं रैंकिंग की तुलना में भारत 52वें स्थान पर था. भारत अगर अपनी बौद्धिक संपदा और उससे जुड़े अधिकारों को अपनी सीमाओं के भीतर रखना चाहता है, और अपने इनोवेशन के ज़रिए वैश्विक स्तर पर मुनाफ़ा कमाना चाहता है, तो उससे कहीं अधिक प्रयास करने होंगे. लेकिन सबसे पहले, हमें अपनी सीमाओं के भीतर, भारतीय इनोवेशन के प्रति विश्वसनीयता पैदा करनी होगी और लोगों को यह विश्वास दिलाना होगा कि भारत में किए गए शोध की गुणवत्ता दुनिया में मौजूद सर्वश्रेष्ठ विकल्पों के समकक्ष है.

कमियों की भरपाई कैसे हो
भारत के पास वैज्ञानिक प्रतिभा है, लेकिन पश्चिमी देशों की तरह हमारे पास आर्थिक संसाधन उपलब्ध नहीं हैं, जो इनोवेशन को बढ़ावा देने वाले तंत्र को स्थापित कर सकें. अक्सर, हम वैश्विक फार्मा कंपनियों के साथ अनुबंधों के आधार पर, अनुसंधान सेवा प्रदाताओं के रूप में ही नई से नई इनोवेशन पर ही काम करते हैं. हम पथ-प्रदर्शक इनोवेशन की दिशा में काम नहीं करते, क्योंकि इस तरह की इनोवेशन को घरेलू स्तर पर उचित मान्यता नहीं मिलती है.

हम वैश्विक फार्मा कंपनियों के साथ अनुबंधों के आधार पर, अनुसंधान सेवा प्रदाताओं के रूप में ही नई से नई इनोवेशन पर ही काम करते हैं. हम पथ-प्रदर्शक इनोवेशन की दिशा में काम नहीं करते, क्योंकि इस तरह की इनोवेशन को घरेलू स्तर पर उचित मान्यता नहीं मिलती है.

यह मानसिकता इस तथ्य में परिलक्षित होती है कि भारत अपने सकल घरेलू उत्पाद का एक प्रतिशत से भी कम हिस्सा, अनुसंधान और विकास पर खर्च करता है, जो भारत के समकक्ष अधिकांश वैश्विक देशों की तुलना में बहुत कम है.

इसके अलावा भारत में निवेशक, पूर्वानुमानित, नकल करने वाले व्यावसायिक मॉडल और पुरानी आज़माई हुई तकनीकों के आधार पर बने उत्पादों को ही पसंद करते हैं, जहां उन्हें सुनिश्चित रूप से मुनाफ़े और रिटर्न का विश्वास हो. दूसरी ओर, जो बिज़नेस मॉडल वास्तव में नए हैं, अपनी तरह के पहले होने का दावा करते हैं और इसके चलते बाज़ार में आज़माए हुए नहीं हैं, उनके प्रति निवेशक आमतौर पर उदासीन रहते हैं. इसकी वजह है कि वास्तविक रूप से किए गए इनोवेशन में जोख़िम, एक अंतर्निहित तत्व होता है, जो भारतीयों के लिए किसी भी रूप में प्रेरक नहीं है. नतीजतन, आप भारत में लोगों को वास्तविक इनोवेशन में उद्यम निधि निवेश करते हुए नहीं देखेंगे.

उदाहरण के लिए जैव प्रौद्योगिकी क्षेत्र को लें. भारत में अधिकांश बायोटेक कंपनियां कम जोख़िम वाली सेवाओं और जेनेरिक डायग्नोस्टिक्स, टीके और चिकित्सा क्षेत्र में काम करती हैं. जो कंपनियां जोख़िम उठाकर, मेडिकल इनोवेशन को लैब से बाज़ार तक लाने में सफल होती हैं, जैसे बायोकॉन उन्हें नज़रअंदाज किया जाता है. भारत में आज के दौर में, न तो निवेशक (वेंचर कैपिटलिस्ट) और न ही बाज़ार, इनोवेशन का मूल्य समझते हैं.

बायोटेक स्‍टार्टअप्‍स भी निवेशकों की सूची में कहीं नहीं दिखते. वास्तव में, भारत में सरकार ही मूल रूप से बायोटेक उद्योग के लिए उद्यम निधि उपलब्ध करवाने की भूमिका निभा रही है. बायोटेक स्‍टार्टअप्‍स को बीजक पूंजी (seed capital) और जोख़िम पूंजी (risk capital) प्रदान करने के लिए सरकार ही आगे आई है. वह स्टार्टअप्स में निवेश कर रही है, और उनके ‘बिज़नेस आइडिया’ यानी विचारों को ‘प्रूफ-ऑफ़-कॉन्सेप्ट’ यानी बुनियादी अवधारणात्मक रूप से आगे ले जाने के लिए, वित्त-पोषण प्रदान करती है.

लेकिन ‘प्रूफ-ऑफ़-कॉन्सेप्ट’ के चरण पर और उससे आगे, जहां वेंचर फंड्स यानी वित्तीय पोषण प्रदान किया जाता है, वहां निजी क्षेत्र से कोई भी आगे आने के लिए तैयार नहीं है. परिणामस्वरूप, नए अनुसंधान करने वाले कई प्रभावी स्टार्टअप आगे नहीं बढ़ पाते. ‘वेंचर कैपिटल फंड’ भी भारत में इनोवेशन में निवेश करने को लेकर सहज नहीं हैं, क्योंकि उन्हें अपने लिए कोई आकर्षक निकास मार्ग नहीं दिखाई देता है.

‘वेंचर कैपिटल फंड’ भी भारत में इनोवेशन में निवेश करने को लेकर सहज नहीं हैं, क्योंकि उन्हें अपने लिए कोई आकर्षक निकास मार्ग नहीं दिखाई देता है. कई वीसी भारत में तभी निवेश करते हैं, जब उन्हें आईपीओ के माध्यम से अपने स्टार्टअप निवेश को बढ़ाने का विकल्प दिखाई देता है.

कई वीसी भारत में तभी निवेश करते हैं, जब उन्हें आईपीओ के माध्यम से अपने स्टार्टअप निवेश को बढ़ाने का विकल्प दिखाई देता है. हालांकि, भारत में पूंजी बाज़ार के रास्ते से बाहर निकलना असामान्य है. नैस्डैक (Nasdaq) की सूची पर आने वाला आखिरी भारतीय स्टार्टअप, ‘मेक-माई-ट्रिप’ (MakeMyTrip) था.

भारत की मौजूदा ज़रूरत
मौजूदा दौर की ज्ञान संचालित अर्थव्यवस्था (information led economy) में इनोवेशन, प्रगति और विकास को उद्वेलित करने वाला सबसे महत्वपूर्ण कारक है. जब तक हम अपनी उद्यमशीलता की भावना को नए सिरे से उद्वेलित कर नई अवधारणाओं और नए विचारों के मुद्रीकरण की दिशा में नहीं सोचेंगे, तब तक भारत में धन पैदा करने और सामाजिक बेहतरी, सुनिश्चित करने की क्षमता लगभग स्थगित रहेगी.

जब तक हम अपनी उद्यमशीलता की भावना को नए सिरे से उद्वेलित कर नई अवधारणाओं और नए विचारों के मुद्रीकरण की दिशा में नहीं सोचेंगे, तब तक भारत में धन पैदा करने और सामाजिक बेहतरी, सुनिश्चित करने की क्षमता लगभग स्थगित रहेगी.

इनोवेशन को बढ़ावा देने के लिए यह ज़रूरी है कि सबसे क्रांतिकारी और बुनियादी रूप से नए लगने वाले विचारों को भी वित्त-पोषित किया जाए और उन्हें बाज़ार तक पहुंचाने की इच्छाशक्ति विकसित की जाए. पूंजी के बिना, सबसे परिवर्तनकारी विचार भी, पहली उड़ान भरने से पहले ही, धराशायी हो सकते हैं. जब तक हम ‘फंडिंग-फाइनेंसिंग इकोसिस्टम’ बनाने में सक्षम नहीं हो जाते, तब तक भारत में इनोवेशन-तंत्र एक दूरगामी सपना बना रहेगा.

भारत को इस वक्त, एक राष्ट्रीय इनोवेशन पारिस्थितिकी तंत्र की आवश्यकता है, जो वित्त-पोषण के चक्र की शुरुआत करे, जिसके ज़रिए- अकादमिक क्षेत्र से नए विचार पैदा हों, विशेष रूप से विज्ञान और प्रौद्योगिकी पर आधारित, जो कि सरकार द्वारा प्रायोजित हों और सरकारी मदद से उन्हें ‘प्रूफ-ऑफ़-कॉन्सेप्ट’ के स्तर तक विकसित किया जाए, जिसके बाद उद्यम निधि यानी वेंचर फंडिंग द्वारा उन्हें व्यापार के ज़रिए बाज़ार तक ले जाया जा सके. प्राथमिक और माध्यमिक दोनों रूपों में बाज़ार तक पहुँचने की आसानी, और अधिक लचीलेपन के साथ पूंजी जुटाने में सक्षम होने से ही इनोवेशन को बढ़ावा मिलेगा और एक उद्यमों को लेकर भारत में एक ऐसा क्रांतिकारी दौर आ पाएगा, जिससे भारतीय अर्थव्यवस्था में मूल्य वर्धित विकास को गति मिले.

हालांकि, देश में महिला वैज्ञानिकों द्वारा बेहतरीन इनोवेशन की जा रही हैं, लेकिन हम उन्हें वैश्विक स्तर पर पहचान बनाते हुए नहीं देख रहे हैं, क्योंकि उन्हें लगातार एक ऐसे पारिस्थितिकी तंत्र द्वारा विफल किया जाता है, जो न तो इनोवेशन की सराहना करता है, और न ही उसे प्रोत्साहित करता है.

निष्कर्ष
आज, भारत में उद्यमी ऊर्जा का एक बड़ा भंडार, उत्सर्जित होने की प्रतीक्षा में है. विकास के आर्थिक मॉडल के रूप में, नए से नए विचारों और उद्यमशीलता को बढ़ावा देने के द्वारा, भारत अपने एक अरब से अधिक नागरिकों के लिए बेहतर जीवन सुनिश्चित करने के लिए, इनोवेशन की ताक़त का इस्तेमाल कर सकता है.

सरकार को नए स्टार्टअप्स और ऐसे व्यवसायों को सक्षम बनाने के लिए आगे आना चाहिए जो ‘लोकल’ यानी स्थानीयता को महत्व देते हैं, लेकिन समृद्ध रूप से वैश्विक प्रभाव बनाने की क्षमता रखते हैं. छोटे और मझोले उद्यमों को बड़े स्तर पर औद्योगिक संचालन के लिए प्रोत्साहित करने से, भारत नए से नए विचारों को वैश्विक बाज़ारों तक ले जाने में समर्थ होगा. ऐसा करने से हम वैश्विक मूल्य श्रृंखला (global value chain) में हिस्सेदारी को बढ़ा पाएंगे और ‘मेक इन इंडिया’ व ‘इनोवेट इन इंडिया’ की अवधारणाओं को मिलाकर, एक आत्मनिर्भर भारत बनाने की दिशा में अग्रसर हो पाएंगे.

फोटो: गेटी के माध्यम से हेमंत मिश्रा / मिंट

साभार- https://www.orfonline.org/hindi/ से

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