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संघ के समक्ष चुनौतियाँ: क्या समझेगा संघ?

एक मित्र, जिन्हें विदेशी समाजों का भी गहरा लंबा अनुभव है, लिखते हैं, ‘‘बीजेपी की प्रशासनिक नाकामी और आरएसएस की महत्वाकांक्षा ने हाशिये पर पड़ी कांग्रेस को फिर से खड़ा कर दिया। … बिहार में महागठबंधन फिर तैयार है और कोई आश्चर्य नहीं, यदि आने वाले लोकसभा चुनाव में एनडीए बिहार में पटखनिया खा जाये। कैसा पर्फारमेंस दिया सत्ताधारी एनडीए ने कि बिहार की जनता सरकारी लूट में जेल काट रहे अपराधी को मौका देने के लिये तैयार है।’’

यह सचेत अवलोकन है। किसी अन्य टिप्पणी में वे लिखते हैं, ‘‘समाज, राजनीतिक पार्टी और सरकार में फर्क है। और यह अंतर रहना चाहिये। पर यह भेद मिट रहा है। वैसे यह प्रयोग नया नहीं। कम्युनिस्टों ने इस का सफल प्रयोग रुस में किया। नतीजा सब के सामने है। अर्थशास्त्र, राजनीति, दर्शन, इतिहास, साहित्य, संस्कृति सब रूसी कम्युनिस्ट पार्टी तक सिमट गई। भारत में भी वामपंथियों ने इस का प्रयोग किया और देश के सब से प्रबुद्ध राज्य बंगाल और केरल की सामाजिक संरचना को नष्ट करने में सफल रहे। बंगाल और केरल अब तक उस प्रयोग से नहीं उबर सका। वामपंथियों का प्रयोग राज्यों तक ही सीमित रहा। पर अब समस्त भारतवर्ष की सत्ता बीजेपी के हाथ में है और वह भी वामपंथियों की तरह समाज, राजनीतिक पार्टी और सरकार को एक करने का प्रयास कर रही है।’’

दोनों बातें भाजपा की बुनियादी नासमझी पर ऊँगली रखती है। इस पार्टी का निर्माण और प्रशिक्षण आर.एस.एस. (संघ) ने किया है, अतः इस पर उसे भी सोचना चाहिए। पिछले तमाम क्रिया-कलाप दिखाते हैं कि संस्कृति, हिन्दुत्व, आदि की बातें करते रहना केवल सतही भंगिमा रही। उन के ठोस काम और विचार कांग्रेस और कम्युनिस्टों के अनुकरण भर हैं। यह बहुत बड़ा भटकाव या स्थायी दिशाहीनता है, जिसे कोरी दलीलों से झुठलाया नहीं जा सकता।

संघ संस्थापक ने हिन्दू समाज को संगठित करने का लक्ष्य रखा था। इसे सचेत हिन्दू एकता समझें, तो बात ठीक है। किन्तु हिन्दू कहलाने वाले वोटरों को किसी पार्टी के पीछे लाना वही चीज नहीं है। चेतना का कार्य कोई दलीय कार्य नहीं है। यह सांस्कृतिक और बड़ा कार्य है। यह राजनीतिक एक्टिविस्टों के बस की बात नहीं।

स्वतंत्रता-पूर्व स्थिति भिन्न थी। तब राष्ट्रवाद और हिन्दू भाव था। तिलक, श्रीअरविन्द, रवीन्द्रनाथ टैगोर, मालवीय, गाँधी जैसे अनेकानेक मनीषी और नेता ‘हिन्दू समाज’, ‘हिन्दू चेतना’, ‘हिन्दू परंपरा’ जैसे पदों का सहजता से उल्लेख करते थे। पर आज? कोई भाजपा नेता भी नहीं करता!

यह नेहरूवादी-वामपंथी वैचारिकता को आत्मसात कर लेने का दुष्परिणाम है। नेहरू ने हिन्दू भाव को नीचा माना था। उस का मुकाबला करने संघ ने अपनी पार्टी बनाई। पहले जनसंघ, फिर भाजपा बनी। किंतु जल्द ही इस दलीय कार्य का महत्व सांस्कृतिक, सामाजिक कार्य से कई सोपान ऊपर हो गया। यह बहुत बड़ी हानि हुई, जो हिन्दू एकता के ही विरुद्ध पड़ी।

अब तो भाजपा के ‘विशिष्टता वाली पार्टी’ (पार्टी विथ ए डिफेरेंस) के दावे की याद दिलाने पर संघ के बौद्धिक भी यही कहते हैं कि ‘राजनीति की कोठरी ही काली है। जो उस में जाएगा, वही सब करेगा जो और लोग करते हैं।’ किन्तु तब अपनी अलग पार्टी बनाना संघ की भूल नहीं थी?

दोनों बातें एक साथ नहीं कही जा सकती। या तो, हिन्दू एकता की चिंता करने वालों को अपनी अलग पार्टी कदापि नहीं रखनी चाहिए। अपनी संगठित वोट-शक्ति से वे किसी भी पार्टी से हिन्दू-हित के काम करवाते रह सकते थे। तब तुलना में मुस्लिम वोट-बैंक खड़ा ही न हो पाता। बल्कि मुस्लिमों में भी सच्चे उदारवादी ही पनपते। यह सचेत हिन्दू भाव से होता, न कि किसी कथित ‘भारतीय जन’ की पार्टी से।

अन्यथा, दूसरी सूरत में, अपनी पार्टी बना लेने पर उसे किसी हाल में कांग्रेसियों, वामपंथियों से प्रभावित आरामपसंद हवाबाजों के हाथ नहीं देना चाहिए था। जो 1960 ई. के उत्तरार्द्ध से ही हो गया (सीताराम गोयल की आत्मकथा पढ़ें)। इस प्रकार, हिन्दू राष्ट्र की परिकल्पना कीचड़ में फँस गई। उसे अपनी ही चुनावी तिकड़मों के अंतहीन जाल ने जकड़ लिया। यही वह चुनौती है जिस का सामना न करने पर संघ से आये नेता भी व्यर्थ होते रहेंगे। इस की शिकायत स्वयं संघ कार्यकर्ता करते हैं। पर वे इसे केवल नेता बदल कर ठीक करने की आशा रखते हैं। उन्हें देख सकना चाहिए कि उन के अच्छे-भले स्वयंसेवक ही सहजता से कम्युनिस्ट कांग्रेसी विचार, व्यवहार अपना लेते हैं। उन्हें इस का भान भी नहीं होता! उलटे वे दावा करते हैं कि उन के सारे कार्य, विचार, पैंतरे, आदि बिलकुल ठीक हैं।

अर्थात संघ से भाजपा नेता बने महानुभावों की मान्यता है कि हिन्दू धर्म, दर्शन के अनुरूप राज्यनीति ढालने का काम अव्यवहारिक है। पर यह पराजित मानसिकता व अज्ञान है। जिसे अपनी ही ज्ञान-परंपरा, शास्त्रीय व्यवहार, देश-विदेश के इतिहास एवं अनुभव की कोई समझ नहीं है। अथवा, कहना होगा कि स्वामी विवेकानन्द, श्रीअरविन्द या श्रद्धानन्द जैसे लोग ही कपोल-कल्पनावादी थे, कि उन्हें वास्तविक राजनीति समस्याएं मालूम नहीं थी, आदि। किन्तु ऐसा कहना गलत होगा। क्योंकि ठीक व्यवहार में ही उन मनीषियों ने हमारे समाज पर जो प्रभाव डाला, उस की तुलना कोई संघ-भाजपा नेता नहीं कर सकता। तब व्यवहारिक कौन हुआ?

ठीक है कि संगठन विस्तार के साथ नई समस्याएं आती हैं। पुराने लोग विदा होते हैं जिन्होंने किसी विशिष्ट लक्ष्य के लिए संगठन बनाया चलाया था। पर जिम्मेदारी सँभालने वाले नए लोग उन्हीं भावों वाले हों, इस के लिए सतत सचेत और कटिबद्ध रहना होता है। नेताओं में पद से चिपकने, शक्ति-सुविधा आदि से लगाव, आदि अनेक अवांछित प्रवृत्तियाँ घर करने लगती हैं।

कईयों के लिए संगठन स्वयं देवता बन जाता है। उसी की पूजा से उन की पहचान जुड़ जाती है। इस प्रकार, जो बड़ा लक्ष्य साधने हेतु संगठन बना था, वह कई कारणों से अनायास पीछे दबता जाता है। यह सब समस्याएं संगठन बढ़ने के साथ आती ही हैं। संघ इस का अपवाद नहीं। यद्यपि इस में आज भी असंख्य निःस्वार्थ समाजसेवी हैं। अच्छी संख्या में आदर्शवादी युवा उन से जुड़ते हैं। मगर उन का भविष्य क्या है? स्वामी विवेकानन्द को गौरवान्वित करने वाला, या किसी हवाबाज नेता को खुश करने वाला?

यह दोनों दो दिशाएं हैं। दोनों व्यवहारिक हैं। प्रश्न है – आप किसे चुनते हैं, और उस के लिए क्या प्रयत्न करते हैं?

जैसा इतिहास दिखाता है, संघ-भाजपा नेताओं के क्रिया-कलाप एक सचेत हिन्दू में भरोसा पैदा नहीं करते। क्योंकि भाजपा सूत्रधारों की दिशा दूसरों जैसी ही रही है। ये हिन्दू-विरोधियों से लोहा नहीं ले सकते। वे शत्रु के मैदान में, शत्रु के नियमों से, शत्रु के विचारों, तरीकों की नकल कर खेलते रहे हैं। अपनी जमीन, अपने नियम, विचार, आदि ‘व्यवहारिकता’ के नाम पर छोड़ देते हैं। तब नकल करने वाले असल को कैसे हराएंगे? अधिक से अधिक, वे कांग्रेस को हटाकर खुद कांग्रेस बन जाएंगे। जो अभी तक होता रहा है। यह वे सभी भाजपाई भी मानते हैं जो किसी कारण सत्ता से विलग रहने को विवश हैं। यह सब हिन्दू समाज की कोई मदद नहीं है। उलटे सामान्यतः उस के शत्रु बलवान होते जाते हैं। वे साफनजर और अनुभवी हैं। इसलिए धैर्यपूर्वक समय काटते हैं। अभी उन का मौन किसी भाजपा महानायक से डर नहीं, उलटे मजे से इन के निपटने का इंतजार है जो ऐसे नायकों की अपनी ही करनी से हो जाता है।

संघ-भाजपा के विवेकशील लोगों को कथित ‘रणनीति’ के बचकानेपन से मुक्त होकर कभी सच्चा चिंतन करना चाहिए। हिन्दू एकता बनाने की दृष्टि से अभी तक वे मुख्यतः काल्पनिक या कम्युनिस्ट दुनिया में रहे हैं। मित्र का अवलोकन यही दर्शाता है।

साभार- https://www.nayaindia.com/ से



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