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वनवासी संस्कृति में रचा बसा छत्तीसगढ़

ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक विविधतापूर्ण राज्य खूबसूरत प्राकृतिक दृश्यों, वन्यजीवों एवं पुरातात्विक महत्व के स्मारकों एवं मंदिरों तथा जनजातीय संस्कृति के लिए अपनी विशेष पहचान बनाता है। धान की भरपूर खेती होने से धान का कटोरा कहा जाता है। छत्तीसगढ़ राज्य मध्य प्रदेश से अलग होकर 1 नवम्बर 2000 को 26 वें राज्य के रूप में भारतीय गणराज्य का हिस्सा बना। इससे आदिवासियों की लंबे समय से चली आ रही मांग पूरी हुई।

प्राचीनकाल में इस क्षेत्र को दक्षिण कोशल के नाम से जाना जाता था। इस क्षेत्र का उल्लेख रामायण और महाभारत में भी मिलता है। छठी और बारहवीं शताब्दियों के बीच सरभपूरिया, पांडुवंशी, सोमवंशी, कलचुरी और नागवंशी शासकों ने इस क्षेत्र पर शासन किया। कलचुरियों ने छत्तीसगढ़ पर सन 980 से लेकर 1791 तक राज किया। सन 1854 में अंग्रजों के आक्रमण के बाद ब्रिटिश शासनकाल में राजधानी रतनगढ़ के बजाय रायपुर का महत्व बढ़ गया। सन 1904 में संबलपुर, ओडिशा में चला गया और सरगुजा रियासत बंगाल से छत्तीसगढ़ के पास आ गई।

छत्तीसगढ़ के उत्तर में उत्तर प्रदेश, उत्तर-पश्चिम में मध्य प्रदेश, उत्तर-पूर्व में ओडिशा एवं झारखण्ड, दक्षिण में तेलंगाना तथा पश्चिम में महाराष्ट्र राज्य की सीमाएं लगी हुई हैं। राज्य का क्षेत्रफल 135194 वर्ग कि.मी. तथा जनसंख्या 25545198 है। प्रशासनिक दृष्टि से रायपुर को नये राज्य की राजधानी बनाया गया तथा राज्य में 27 जिले शामिल हैं। राज्य की साक्षरता दर 71 प्रतिशत है। महानदी और उसकी सहायक नदियां विशाल एवं उपजाऊ मैदान का निर्माण करती हैं। मैदान के पश्चिम में महानदी तथा शिवनाथ का दो आब क्षेत्र है। यहां की महानदी, शिवनाथ, खारोल, पैरी, अरपा एवं इन्द्रवती प्रमुख नदियां हैं। मैदानी क्षेत्र के उत्तर में मैकल पर्वत श्रृंखला पाई जाती है।

यह राज्य ऊँची-नीची पर्वत श्रेणियों एवं घने जंगलों से घिरा हुआ है। यहां के जंगलों में सागौन, साल, बांस और बीजा के वृक्ष बहुतायत से पाये जाते हैं। सागौन की कुछ उन्नत किस्में केवल छत्तीसगढ़ के वनों में ही देखने को मिलती हैं। भारत के कुल वन क्षेत्र का लगभग 12 प्रतिशत वन क्षेत्र यहाँ पाया जाता है, जो जैवविविधता से परिपूर्ण है। राज्य में तीन राष्ट्रीय उद्यान एवं 11 वन्यजीव अभ्यारण्य राज्य को प्राकृतिक सुन्दरता प्रदान करते हैं। इन्द्रावती राष्ट्रीय उद्यान सबसे बड़ा उद्यान है। कांगेर घाटी भी प्रमुख राष्ट्रीय उद्यान है।

राज्य की अर्थव्यवस्था का आधार प्राकृतिक संसाधनों से सम्पन्न होना है। राज्य में कृषि मुख्य व्यवसाय है। यहां 80 प्रतिशत आबादी कृषि व्यवसाय पर निर्भर करती है। धान की भरपूर खेती होने से इस राज्य को ”धान का कटोरा“ भी कहा जाता है। यहां से 600 मिलों को चावल की आपूर्ति की जाती है। वनों से राज्य को 44 प्रतिशत राजस्व प्राप्त होता है।

छत्तीसगढ़ में वन, खनिज और भूजल प्राकृतिक संसाधनों का असीम भंडार है। पिछले कुछ वर्षो में राज्य में महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए हैं और यह उद्योगों के मामले में बहुत फल-फूल रहा है। छत्तीसगढ़ में देश का लगभग 20 प्रतिशत इस्पात और 15 प्रतिशत सीमेंट तैयार होता है। भिलाई इस्पात संयंत्र, राष्ट्रीय खनिज विकास निगम, साउथ-ईस्टर्न कोल फील्ड्स लिमिटेड, एन.टी.पी.सी. जैसे भारत सरकार के उपक्रम और ए.सी.सी. गुजरात अंबुजा, ग्रासिम, एल एंड टी, सी सी आई और फ्रांस के लाफार्ज जैसे बड़े सीमेंट प्लांट, करीब 133 इस्पात ढालने के कारखाने, अनेक लघु इस्पात संयेत्र, 11 फेरो-एलॉय कारखाने, इंजीनियरिंग और निर्माण सामग्री और वनोत्पाद पर आधारित कारखाने हैं।

छत्तीसगढ़ में आग्नेय, कायांतरित और तलछटी क्षेत्रों में अनेक प्रकार के खनिज पाए जाते हैं। कोयला, कच्चा लोहा, चूना पत्थर, बॉक्साइट, डोलोमाइट तथा टिन के विशाल भंडार राज्य के विभिन्न हिस्सों में फैले हुए हैं। रायपुर जिले में डाइमंडीफैरस किंबरलाइट्स में से काफी मात्रा में हीरा प्राप्त किया जाता है। इसके अलावा सोना, आधार धातुओं, बिल्लौरी पत्थर, चिकना पत्थर, सेटाइट, फ्लोराइट, कोरंडम, ग्रेफाइट, लेपिडोलाइट, उचित आकार की एम्लीगोनाइट के विशाल भंडार मिलने की संभावना है। राज्य में देश के 20 प्रतिशत इस्पात और सीमेंट का उत्पादन किया जाता है। कच्चे टिन का उत्पादन करने वाला यह देश का एकमात्र राज्य है। यहां खनिज संसाधनों से उत्खनन, खनिज आधारित उद्योग लगाने और रोजगार के अवसर बढ़ाने की अपार क्षमता है। छत्तीसगढ़ में विश्व का सबसे अधिक किंबरलाइट भंडार क्षेत्र है। आठ ब्लॉकों में हीरे की संभावना का पता लगाने के लिए पहचान की गई है। हीरे के अलावा सोने की संभावना के लिए चार तथा आधार धातुओं के लिए पांच ब्लॉक चिन्हित किए गए हैं।

लकड़ी पर नक्काशी का कार्य, बांस की बनी वस्तुएं,फर्नीचर, कांसा धातु से बने शिल्प, मृदुभांड की मूर्ति्तयां, जनजाति लोगों के आभूषण, पेंटिंग और मिट्टी से बनी कलाकृतियां प्रमुख हस्तशिल्प है। काष्ठ कला में मुख्य रूप से लकड़ी के फर्नीचरों में बस्तर की संस्कृति, त्योहारों, जीव जंतुओं, देवी देवताओं की कलाकृति बनाना, देवी देवताओं की मूर्तियाँ, साज सज्जा की कलाकृतियाँ बनायी जाती है।मृदा कला में , देवी देवताओं की मूर्तियाँ, सजावटी बर्तन, फूलदान, गमले, और घरेलु साज-सज्जा की सामग्रियां बनायी जाती है। धातु कला में ताम्बे और टिन मिश्रित धातु के ढलाई किये हुए कलाकृतियाँ बनायीं जाती है, जिसमे मुख्य रूप से देवी देवताओं की मूर्तियाँ, पूजा पात्र, जनजातीय संस्कृति की मूर्तियाँ, और घरेलु साज-सज्जा की सामग्रियां बनायीं जाती है।

सांस्कृतिक दृष्टि से प्राकृतिक सुन्दरता से लबरेज राज्य शहरी व ग्रामीण संस्कृति का मिश्रण है।बस्तर का श्दशहराश्, रायगढ़ का श्गणेशोत्सवश् तथा बिलासपुर का श्राउत मढ़ईश् हैं, जिनकी अपनी एक बहुत-ही विशिष्ट पहचान है। पंडवानी, भरथरी, पंथी नृत्य, करमा, दादरा, गैड़ी नृत्य, गौरा, धनकुल आदि प्रमुख नृत्य हैं। यहां आदिवासी देवी त्यौहार , तीज त्यौहार, चैतराई, आमाखानी, अकती, बीज खुटनी, हरियाली, इतवारी, नयाखाई आदि मुख्य रूप से मनाते हैं। आदिवास बूढ़ादेव, ठाकुर दाई, रानीमाता, शीतला, रावदेवता, भैंसासुर, मावली, अंगारमोती, डोंगर, बगरूम आदि देवी देवताओं को पान फूल, नारियल, चावल, शराब, मुर्गा, बकरा, भेड़, गाय, भैंस, आदि देकर अपने-अपने गांव-परिवार की खुशहाली के लिए मन्नत मांगते है।प्रमुख और लोकप्रिय गीतों में भोजली, पंडवानी, जस गीत, भरथरी लोकगाथा, बाँस गीत, गऊरा गऊरी गीत, सुआ गीत, देवार गीत, करमा, ददरिया, डण्डा, फाग, चनौनी, राउत गीत और पंथी गीत हैं। इनमें से सुआ, करमा, डण्डा व पंथी गीत नाच के साथ गाये जाते हैं। बाल खेलों में अटकन-बटकन, बालिकाओं द्वारा खेला जाने वाला फुगड़ी, ,लंगड़ी, खुडुवा (कबड्डी) डांडी पौहामुख्य खेल लोकप्रिय हैं। यहां प्रमुख रूप से हिन्दी भाषा बोली जाती है। हिन्दी के साथ-साथ छत्तीसगढ़ी, मराठी, उड़िया, गोंडी भाषाएं प्रचलन में हैं।

छत्तीसगढ़ रेल, सड़क एवं हवाई मार्गों से अच्छी तरह जुड़ा हुआ है। छत्तीसगढ़ में विलासपुर, दुर्ग एवं रायपुर लगभग हर बड़े शहर रेल द्वारा जुड़े हुए हैं। यहां कई राष्ट्रीय और राज्य राजमार्ग है, जो छत्तीसगढ़ को भारत के अन्य हिस्सों से जोड़ते हैं। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में हवाई अड्डा है जो बैंगलूर, विशाखापटनम्, हैदराबाद, दिल्ली, मुम्बई, जयपुर, भुनेश्वर, कोलकाता, नागपुर, ग्वालियर, भोपाल एवं इन्दौर से जुड़ा हुआ है।

राज्य की राजधानी रायपुर का मध्यकालीन दुर्ग दर्शनीय हैं जिसमें अनेक प्राचीन मंदिर देखने को मिलते हैं। दूधाधारी महाराज के नाम से प्रसिद्ध है। इस मंदिर पर हिन्दू देवी-देवताओं की अनेक मूर्तियां खुदी हुई हैं। शिखर के नीचे के भाग में रामायण की कथा के सुन्दर दृश्य देखने को मिलते हैं। यहां की मूर्ति कला विशेष रूप से महत्व रखती है। मंदिर के गुप्तकालीन होने का पता चलता है।रायपुर की नगरघड़ी देखते ही बनती है जो हर घण्टे में छत्तीसगढ़ी लोक धुनें सुनाती है। बूढ़ा तालाब शहर का सबसे बड़ा तालाब है जिसे विवेकानन्द सरोवर के नाम से भी जाना जाता है। इसके मध्य एक उद्यान बनाया गया है। राजीव गांधी ऊर्जा पार्क में अनेक स्थान देखने लायक हैं, झूले सौर ऊर्जा से संचालित हैं। यहाँ उदंती वन्य अभ्यारण्य, सीता नदी राष्ट्रीय अभ्यारण्य , नंदन वैन प्रकृति केन्द्र, घाटी, झरने, राजीव लोचन मंदिर, नया रायपुर सेन्ट्रल पार्क, जाटभाई मंदिर, महंत घासीदास संग्रहालय एवं महाकौशल कलादीर्घा दर्शनीय हैं। चम्पारन में महाप्रभु वल्लभाचार्य का मंदिर तथा चम्पाकेश्वर महादेव मंदिर, आरंग में भाण्डल देव जैन मंदिर एवं बाघदेवल तथा चन्द्रखुरी में प्राचीन शिव मंदिर दर्शनीय हैं।

जगदलपुर बस्तर जिले का एक शहर है जो बस्तर का जिला मुख्यालय भी है। यहां बहने वाली इन्द्रावती नदी इन लोगों के आस्था और भक्ति का प्रतीक है। कांकेर में कांकेर का किला पहाड़ के ऊपर बना है जो यहां के समृद्ध इतिहास का प्रतीक है। नगर के दक्षिण में स्थित मढ़ियापहाड़ पुरातात्विक महत्व का स्थल है। जगन्नाथपीठ का भव्य मंदिर एवं देवी दंतेश्वरी मंदिर प्रमुख मंदिरों में आते हैं। करीब 40 कि.मी. परिधी में प्रकृति के अनुपम उपहार सुन्दर जल प्रपात देखने को मिलते हैं। चित्रकोट जल प्रपात, चित्रधारा, ताम्रघूमर तथा तीरथगढ़ प्रमुख दर्शनीय स्थल हैं। देवी दंतेश्वरी का मंदिर जगदलपुर से 90 कि.मी. दूर दंतेवाड़ा जिले में स्थित है। तथा भारत के 51 शक्तिपीठों में एक है। करीब 600 वर्ष प्राचीन मंदिर प्राचीन धरोहर स्थलों में गिना जाता है। दंतेश्वरी देवी बस्तर के राजाओें की कुल देवी थी।

राजधानी रायपुर से करीब 133 कि.मी. दूर विलासपुर जिला पर्यटन के आकर्षण का प्रमुख केन्द्र है। विलासपुर में विवेकानन्द उद्यान, दीनदयाल उद्यान, स्मृति वन, ऊर्जा पार्क, यातायात पार्क, रामकृष्ण आश्रम, स्मृति वाटिका, विलासा ताल एवं काली मंदिर तिफरा आदि प्रमुख दर्शनीय स्थल हैं। जिले में मल्हार पुरातात्विक महत्व का का स्थल ळें विलासपुर के समीप सेतगंगा का श्रीराम जानकी मंदिर, रतनपुर का महामाया मंदिर, अय्यप्प मंदिर (तिफरा पुल के पास), रानी सती मंदिर, अचानकमार वन्यजीव अभ्यारण्य एवं टाईगर रिजर्व, चैत्तुरगढ़, पाली एवं कोरवा दर्शनीय स्थल हैं। तालागांव में शिव की प्रतिमा रूद्र के नाम से जानी जाती है तथा कानन में पेंडारी चिड़ियाघर दर्शनीय है। विलासपुर से 30 कि.मी. दूरी पर तालागांव के मंदिर तथा 40 कि.मी. दूरी पर खूंटाघाट में खारग नदी पर बना बांध एवं टापू पर बना उद्यान दर्शनीय स्थल हैं।

दंतवाड़ा जिले में स्थित इन्द्रावती नदी के किनारे स्थित राज्य का प्रमुख इन्द्रावती राष्ट्रीय उद्यान करीब 2799 वर्ग कि.मी. क्षेत्र में फैला हुआ है। इसे 1981 में राष्ट्रीय उद्यान का दर्जा दिया गया तथा 1983 में प्रोजेक्ट टाईगर योजना के तहत टाईगर रिजर्व घोषित किया गया। यहां कई प्रकार की वनस्पति एवं घास पाई जाती है। दुर्लभ प्रकार के वन्यजीवों में जंगली भैंसे, बारहसिंगा, बाघ, चीता, नीलगाय, सांभर, चैसिंगा, भालू, जंगली कुत्ते, उड़न गिलहरी, बंदर एवं लंगूर आदि पाये जाते हैं। यहां मीठे पानी का घड़ियाल, माॅनिटर छिपकली, अजगर, कोबरा आदि सरीसृप प्रजाति के जानवर देखने को मिलते हैं। यहां पर कई प्रजातियों की चिड़ियाएं भी देखी जाती हैं, जिनमें पहाड़ी मैना सबसे प्रमुख है। जिले के बरसुर से 6 कि.मी. दूरी पर स्थित सातधारा जलप्रपात विशेष रूप से दर्शनीय है।

अम्बिकापुर सरगुजा जिले का मुख्यालय है। जिला वनों, सरोवरों, नदियों एवं पहाड़ों की सुन्दरता लिए हुए है। यहां कवि कालीदास ने मेघदूत लिखा तथा भगवान राम ने 14 वर्ष के वनवास के कुछ दिन यहां पर बिताये। जिले के चंदाग्राम जलप्रपात, रक्सगण्डा जलप्रपात, भेडिया जलप्रपात, बेनगंगा जलप्रपात, सेदम जलप्रपात, मेनपाट जलप्रपात प्रमुख झरनों में आते हैं। पुरातत्व महत्व की दृष्टि से रामगढ़, लक्ष्मणगढ़, कंदरी प्राचीन मंदिर, अर्जुन गढ़, सीता लेखनी, डिपाडीह, महेशपुर एवं सतमहल प्रमुख स्थल हैं। धार्मिक महत्व की दृष्टि से माया मंदिर, तकिया सरगुजा, कुदरतगढ़, पारदेश्वर शिव मंदिर, शिवपुर, बिलद्वार गुफा, देवगढ़ आदि प्रमुख धार्मिक स्थल हैं। वन्यजीवों की दृष्टि से जिले का सेमरसोत अभ्यारण्य एवं तमोर पिंगला अभ्यारण्य भी दर्शनीय हैं। चांग-भखार में मठों एवं मंदिरों के पुरावशेष पाये जाते हैं। मेनपाट की वादियां, शिमला जैसे पर्वतीय स्थल की याद ताजा करती हैं। यहां दलदली, टाईगर प्वांइट और फिश प्वांइट दर्शनीय स्थल हैं। यहां आने वालों के लिए पर्याप्त सुविधाएं उपलब्ध हैं। मेनपाट विन्ध्य पर्वत माला पर स्थित है। मेनपाट की लम्बाई 28 कि.मी. और चैड़ाई 10 से 12 कि.मी. है। यहां पर तिब्बती बड़ी संख्या में निवास करते हैं।

कवर्धा जिले में चैराग्राम के समीप पत्थरों से निर्मित भोरम देव मंदिर चैदवीं शताब्दी के शिल्प का एक अच्छा उदाहरण है। हालांकि मंदिर का कुछ हिस्सा जीर्णशीर्ण हो गया है परन्तु मंदिर की बाहरी दीवारों पर बनी कामकला की प्रतिमाओं के कारण मंदिर को देखने के लिए पर्यटक आते हैं। इस कारण इसे छत्तीसगढ़ का खजुराहों कहा जाता है। चंदेल शैली में बना यह मंदिर उत्कृष्ट शिल्प एवं भव्यता का प्रतीक है। मंदिर का निर्माण नागवंश के राजा रामचन्द्र द्वारा किया गया था। कवर्धा महल करीब 11 एकड़ में फैला हुआ है जिसका निर्माण महाराजा धर्मराज सिंह ने 1936-39 ई. में करवाया था। महल के निर्माण में इटेलियन मारबल एवं सफेद संगमरमर का उपयोग किया गया है तथा महल के दरबार के गुम्बद पर सोने और चांदी से नक्काशी की गई हैं। प्रवेश द्वार का नाम हाथी दरवाजा है जो बहुत सुन्दर है। यहाँ राधा कृष्ण मंदिर उजीयार तालाब के किनारे बना है। मंदिर का निर्माण करीब 200 वर्ष पूर्व राजा उजीयार ने करवाया था। राधा कृष्ण मंदिर के साथ-साथ यहां मदन मंजरी महल मंदिर भी दर्शनीय है।

कोरिया को भारत में प्राकृतिक सुन्दरता के लिए पहचाना जाता है। यहां चारों तरफ प्रकृति के मनोरम दृश्य नजर आते हैं। इन्हीं में एक है प्राकृतिक अमृत धारा जल प्रपात, जहां से हसदो नदी का जल गिरता है। यह झरना मनेन्द्रगढ़-बैकुन्ठपुर सड़क पर स्थित है। करीब 90 फीट ऊँचाई से गिरने वाले झरने का वह स्थल जहां पानी गिरता है, वहां एक सुन्दर बादल जैसा स्वरूप बन जाता है, जिससे झरने की सुन्दरता में चार-चाँद लग जाते हैं। इसी के समीप है शिव एवं हनुमान जी के प्राचीन मंदिर। यहां महाशिवरात्रि का उत्सव मेले के रूप में मनाया जाता है।

छत्तीसगढ़ की कांगेर घाटी करीब 34 कि.मी. लम्बी तराई में स्थित है। यह राष्ट्रीय पार्क होने के साथ-साथ एक बायोस्फीयर रिजर्व भी है। यह उद्यान भारत के सर्वाधिक सुन्दर एवं मनोहारी राष्ट्रीय पार्कों में गिना जाता है। अपनी प्राकृतिक सुन्दरता एवं अनोखी समृद्ध जैव विविधता के कारण प्रसिद्ध है। कांगेर घाटी को 1982 ई. में राष्ट्रीय पार्क का दर्जा दिया गया। वन्य जीवन एवं वनस्पति के साथ-साथ उद्यान में सैलानियों के लिए तीर्थगढ़ जल प्रपात, डंडक की गुफाएं, कैलाश गुफाएं तथा कुटुमसार की गुफाएं भी दर्शनीय स्थल हैं। कांगेर धारा एवं भीमसा धारा दो खूबसूरत पिकनिक स्थल है। पार्क में बड़ी संख्या में जनजातीय आबादी निवास करती है। कांगेर घाटी भारतीय उपमहाद्वीप का एक ऐसा स्थान है जहां अब तक अछूता व पहुँच से दूर वनों का हिस्सा बना हुआ है। यहां बाघ, चीता, माउस डीयर, जंगली बिल्ली, चीतल, सांभर, बार्किंग डीयर, भेड़िये, लंगूर, उड़ने वाली गिलहरी, जंगली सूअर, खरगोश, अजगर, कोबरा, घड़ियाल आदि वन्य जीव देखने को मिलते हैं। यहां विभिन्न प्रकार के पक्षी भी पाये जाते हैं।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजस्थान जनसंपर्क विभाग के सेवा निवृत्त अधिकारी हैं)
संपर्क
1-f-18,हाउसिंग बोर्ड कॉलोनी,कुन्हाड़ी,
कोटा(राजस्थान)
मोबाइल:9928076040

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