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‘इप्टा’ की सुनहरी यादों से सजी चौपाल

मुंबई की चौपाल ऐसा मंच है जहाँ मात्र चार घंटे में आप एक ही मंच पर कई शख्सियतों, किताबों को पढ़ने से लेकर कई शख्सियतों की संगत का मजा लेते हुए विविध संस्कृतियों की धारा में बहने लगते हैं। रंगकर्मी श्री अतुल तिवारी, रंगऋषि श्री शेखर सेन और जाने माने अभिनेता राजेन गुप्ता के साथ ही श्री अशोक बिंदल से लेकर कविता गुप्ता, दिनेश गुप्ता जैसे कई सिध्द योगी हैं जिन्होंने मुंबई की चौपाल को एक ऐसा मंच बना दिया है जहाँ आकर कोई कलाकार हो या श्रोता या दर्शक, कभी खाली नहीं जाता। इस बार चौपाल ने अपनी शुरुआत के 20 साल पूरे किए तो इप्टा के 75वें साल पूरे होने के जश्न को इस मंच पर जीवंत कर दिया।

श्री अतुल तिवारी जब चौपाल का संचालन करने खड़े होते हैं तो अपनी यादों के खजानों से रोचक व ऐतिहासिक जानकारियों से श्रोताओं को साहित्य, कला, संस्कृति की दरिया में ऐसे गोते लगवाते हैं कि सब वाह वाह कर उठते हैं।

अतुलजी का अंदाजे बयाँ इतना रोचक होता है कि हर बार वे एक नई जानकारी लेकर श्रोताओं को अचंभित कर देते हैं। उन्होंने कहा कि अंग्रेजी के शब्दकोश में जिसे प्लेटिनम जयंती कहा जाता है वह 70 साल पूरे होने पर मनाई जाती है, लेकिन हमारी परंपरा में तो 75 साल पूरे होने पर हीकर जयंती मनाई जाती है इसलिए हम इप्टा की हीरक जयंती मना रहे हैं प्लेटिनम जुबिली नहीं।

इप्टा की स्थापना के मात्र दो महीने बाद ही मुंबई में भारत छोड़ो आंदोलन की शुरुआत हो गई। यह वह दौर था जब विश्व युध्द चल रहा था। विश्व युध्द में 20 हजार लोग मारे गए थे, लेकिन अंग्रेजी हुकूमत द्वारा बंगाल में षड़यंत्रपूर्वक अनाज की सप्लाई रोक देने से भयंकर अकाल फैल गया था और इसमें 30 लाख लोग मारे गए थे। उस समय भारत सहित दुनिया भर के अखबार विश्वयुध्द में मरने वाले लोगों के आँकड़े दे रहे थे लेकिन बंगाल के अकाल की कहीं चर्चा तक नहीं थी। इप्टा के समर्पित रंगकर्मियों के माध्यम से बंगाल के अकाल की चर्चा पूरे देश में फैली और फिर देश भर से वहाँ मदद भी पहुँचने लगी। अतुलजी ने बताया कि सुभाष चन्द्र बोस ने सिंगापुर से चावल का एक जहाज बंगाल भिजवाया मगर अंग्रेजी हुकुमत ने उस जहाज को बंगाल से वापस कर दिया। उन्होंने कहा कि इप्टा नाच-गाने या रंगकर्म का ही आंदोलन नहीं था बल्कि इसमें पूरे हिन्दुस्तान की आवाज़ थी। यह एक ऐसा आंदोलन था जिसने पूरे देश को जगाया और आज भी वो सिलसिला जारी है।

कार्यक्रम की शुरुआत स्वर्गीय कैफी आज़मी के लिखे इप्टा के गीत से हुई। चौपाल के प्रति जी जान से समर्पित जाने माने संगीतकार कुलदीप सिंह जी के संगीत निर्देशन में उनके सहयोगी कलाकारों ने ये गीत प्रस्तुत किया।

हम दीवाने, हम परवाने, प्यास ने हमको जनम दिया, धूप ने अपनी कोख में पाला

इस कार्यक्रम में विशेष रूप से स्वर्गीय फैज़ अहमद फैज़ की बेटी श्रीमती मुनीजा हाशमी भी मौजूद थी। उन्होंने कहा कि मेरे कंधों पर फैज़ साहब की विरासत की जिम्मेदारी हैऔर मैं इसे लेकर चल रही हूँ। पाकिस्तान में हम हर साल नंवबर में फैज़ साहब की याद में मेला आयोजित करते हैं और इसमें दुनिया भर के फैज़ प्रेमी आते हैं।

अतुल जी ने कहा फैज साहब की पत्नी श्रीमती एलिस लंदन की थी और उर्दू नहीं जानती थी, और लोग उनसे पूछते थे कि आप तो उर्दू नहीं समझती तो आप शायरी कैसे समझती होंगी, इसके जवाब में वे कहती थी मैं शायरी समझूँ या न समझूँ मगर शायर को तो बखूबी समझती हूँ।

इसके बाद मुंबई विश्वविद्यालय के छात्रों ने स्व. दुष्यंत कुमार की गज़लों से पूरे माहौल को एक अलग रंग दे दिया।

इस अवसर पर जानी मानी अभिनेत्री सुलभा आर्य ने बताया कि वो 17 साल की उम्र से इप्टा से जुड़ी थी और आज 71वें साल में भी उसी शिद्दत से जुड़ी हुई है। उन्होंने पहले पु.ल. देशपांडे के अमर नाटक शतरंज के मोहरे के संवादों से दर्शकों को भावविभोर कर दिया। इसमें उन्होंने छात्रावास में रहने वाली एक छात्रा द्वारा भजिये बनवाकर खा लेने पर उसके साथ हुए सामाजिक बहिष्कार और अपमान की व्यथा को बहुत ही मार्मिकता से प्रस्तुत किया। 47 साल पहले उन्होंने ही इस छात्रा की भूमिका अदा की थी।

अतुल जीने बताया कि ये नाटक आज 47 साल बाद भी खेला जा रहा है। इसी तरह स्व. कैफी आज़मी साहब द्वारा लिखा गया नाटक आख़री शमाँ विगत 50 सालों से खेला जा रहा है।

इस अवसर पर खासतौर पर उपस्थित हुई श्रीमती शबाना आज़मी ने कहा कि मैं जब चार महीने की थी तब मेरी मम्मी मुझे नाटक की रिहर्सल पर लेकर जाती थी। वो मुझे बाहर सुलाकर नाटक खेलती थी। इसके बाद मैने अपनी मम्मी के साथ रहते हुए ये सीखा कि नाटक में काम करना मतलब हर तरह से अपने आपको अनुशासित रखना। उन्होंने बताया कि मैं 1980 से फिल्मों में काम कर रही हूँ, मुझे एमएस सथ्यू के साथ एक नाटक करना था, लेकिन उन्होंने ये शर्त रखी कि मैं 10 दिन तक रिहर्सल पर अगर समय पर आई तो वे मुझे इसमें काम देंगे नहीं तो नहीं देंगे। मैने फिल्मों की शूटिंग की व्यस्तता के बावजूद उनकी इस शर्त को पूरा किया और उस दौर में जो सिखा वो आज भी मेरे जीवन का हिस्सा है।

शबाना जी ने बताया कि एक बार सुलभाजी और हम हैदराबाद नाटक सफेद कुंडली लेकर गए थे, उसमें उनके 4 साल के बेटे की भी भूमिका थी, उसे 103 डिग्री का बुखार चढ़ा था मगर सुलभाजी ने नाटक शुरु हने से पहले उसे मानसिक रूप से नाटक करने के लिए तैयार किया और उसने तेज बुखार में भी नाटक में अपनी भूमिका निभाई। शबानाजी ने एक और रोचक किस्सा बताया कि एक बार एके हंगल साहब और मेरी मम्मी शौकत आपा हैदराबद एक नाटकर करने गए। नाटक जिस हाल में होना था उसकी क्षमता 800 लोगों की थी, लेकिन टिकट मात्र 8 ही बिके थे। लेकिन सथ्यू साहब ने कहा कि नाटक तो होगा ही भले एक दर्शक हो या 800। शबानाजी ने कहा कि इप्टा में रहकर हमने यही संस्कार सीखे कि एक दूसरे के प्रति बराबरी का व्यवहार करें। फिल्मी दुनिया में तो छोटे कलाकार के साथ अलग व्यवहार होता है और बड़े कलाकार के साथ अलग व्यवहार होता है। लेकिन इप्टा की दुनिया में तो हर कलाकार बराबर होता है। क्योंकि कभी भी कोई भी कलाकार किसी भी भूमिका में लिया जा सकता है।

एक और रोचक किस्सा बताते हुए शबानाजी कहा कि मेरी मम्मी को कैफी साहब के लिखे एक नाटक पगली में पागल की भूमिका करनी थी। इस भूमिका के चक्कर में वह जहाँ भी मौका मिलता पागलों की तरह संवाद बोलने लगती थी। एक बार उन्होंने खाना बनाते बनाते इतनी जोर से संवाद बोले कि हम समझे कि वो सच में ही पागल हो गई है।

शबाना जी ने एक और किस्सा बताया कि इप्टा में किस समर्पण से काम करना होता है। वे एक अंग्रेजी नाटक में भाग ले रही थी ये नाटक महाराष्ट्र राज्य नाटक प्रतियोगिता में शामिल होना था। लेकिन मेरे पैर में मोच की वजह से भयंकर दर्द हो रहा था। मैं जसलोक अस्पताल में चैकअप कराने गई तो डॉक्टर ने कहा कि आपको तो अभी भर्ती होना पड़ेगा, लेकिन मैने कहा कि मुझे तो दो दिन बाद नाटक करना है। तब डॉक्टर ने मुझे दवाई दी और मैने भयंकर दर्द के साथ नाटक किया और फिर 6 महीने का प्लास्टर चढ़ाया गया।

इस मौके पर ज़ावेद अख़्तर साहब ने कहा कि इप्टा अगर तब शुरु नहीं होता तो आज शुरु करना ही पड़ता क्योंकि आज भी ऐसी ही हालात हैं। हमारी आज़ादी खतरे में है।

कार्यक्रम में गुजराती के प्रमुख स्तंभ लेखक श्री संजय गारोड़िया, जाने माने रंगकर्मी जावेद सिद्दीकी ने इप्टा के आंदोलन से जुड़े कई रोचक तथ्यों को प्रस्तुत किया।

अतुल जी ने इप्टा के इतिहास पर रोशनी डालते हुए बताया कि 25 मई 1943 को मुंबई के मारवाड़ी हाल में प्रो. हीरेन मुखर्जी की अध्यक्षता में इप्टा की स्थापना इस उद्घोष के साथ की थी कि “लेखक और कलाकार आओ, अभिनेता और नाटककार आओ, हाथ से और दिमाग़ से काम करने वाले आओ और स्वंय को आज़ादी और सामाजिक न्याय की नयी दुनिया के निर्माण के लिये समर्पित कर दो”। इसकी स्थापना से पृथ्वीराज कपूर, बलराज और दमयंती साहनी, चेतन और उमा आनंद, हबीब तनवीर, शंभु मित्र, जोहरा सहगल, दीना पाठक, संजीव कुमार जैसे अभिनेता, कृष्ण चंदर, सज्जाद ज़हीर, अली सरदार ज़ाफ़री, राशिद जहां, इस्मत चुगताई, ख्वाजा अहमद अब्बास जैसे लेखक, शांति वर्द्धन, गुल वर्द्धन, नरेन्द्र शर्मा, रेखा जैन, शचिन शंकर, नागेश, रविशंकर, सलिल चौधरी, जैसे संगीतकार, कैफी आज़मी, फ़ैज़ अहमद फ़ैज़, मखदुम मोहिउद्दीन, साहिर लुधियानवी, शैलेंद्र, प्रेम धवन और श्रीपाद डांगे जैसी एक से एक हस्तियाँ जुड़ी थी। इप्टा तत्कालीन सत्ता की मनमानी के खिलाफ एक ऐसी आवाज़ थी जिसकी गूँज पूरे देश में शोषित, पीड़ित और असहाय आम आदमी तक पहुँची। इसकी स्थापना के लिए अनिल डिसिल्वा लंका से आई थी। महान वैज्ञानिक होमी जहाँगीर भाभा भी इसकी स्थापना के समय मौजूद थे।

जाने माने ग़ज़ल गायक श्री सुखविंदर सिंह ने कैफी साहब द्वारा 11 साल की उम्र में लिखी गई ग़ज़ल इतना तो ज़िंदगी में किसी की खलल ना पड़े…ज़िंदगी नज़्म है कुछ लम्हों की- ज़बर्दस्त वाहवाही लूटी।

कुल मिलाकर ये आयोजन ऐसा था मानों इप्टा पर कोई डॉक्यूमेंट्री चल रही है और वहाँ मौजूद दर्शक व श्रोता उस काल, उन परिस्थितियों और उस माहौल को उसी शिद्दत से महसूस कर रहे थे जो आज से 75 साल पहले इप्टा की स्थापना के समय था।



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