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हास्य लिखना बहुत कठिन होता है : अरुण जेमिनी

अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति के तत्वाधान में प्रस्तुत हास्य कवि सम्मेलन में भाग लेने के लिए अरुण जैमिनी जी आजकल अमेरिका की यात्रा पर हैंl इसी दौरान उनसे बात करने का मौका मिला प्रस्तुत है उनसे की गयी बातचीतl 

साहित्य के प्रति आपका रुझान कैसे हुआ?

क्या था घर का माहौल ख़राब था  (हँसने  लगते हैं) l पिताजी कवि थे, तो उसका असर तो पड़ना ही थाl मै आठवीं कक्षा में था, जब मेरी पहली कविता पराग में छपी थी, तो बस उसके बाद लिखना शुरू कर दिया और छपने भी लगा, तो ग़लतफ़हमी भी हो गयी की कवि हूँl मेरी कविताएँ, दैनिक हिंदुस्तान, माधुरी, धर्मयुग, साप्ताहिक हिंदुस्तान आदि में प्रकाशित हुईंl

क्या आपके पिताजी को पता था की आप कवितायेँ लिखते हैं?
हाँ पता था ये बात छुपने की नहीं थी फोटो के साथ कविता छपती थी झूठ भी नहीं बोल सकता था।

क्या  पढ़ाई के कारण आपकी साहित्यिक साधना में बाधा हुई?
नहीं, मुझे तो कविता लिखने में बहुत सहायता मिली क्यों की मै हिंदी का विद्यार्थी था तो अलग-अलग कवियों और लेखकों को पढ़ने का मौका मिला, जितना पढ़ा जायेगा उतना ही अच्छा लिखा भी जायेगा।

क्या कभी आपने सोचा था की आप काव्य यात्रा करते हुए इतने प्रसिद्ध हो जायेंगे और देश-विदेश में सभी आपको इतना स्नेह और सम्मान देंगें ?

नहीं, ऐसा तो मैने कभी नहीं सोचा थाl पहले तो ये सोचा था की कविता लिखेंगे और साथ में कोई नौकरी करेंगेl क्योंकि पिता जी मेरे उप प्रधानाचार्य के पद से सेवानिवृत हुए हैंl मैने ये नहीं सोचा था की केवल कविता पाठ करके आजीविका चल सकती हैl जब मैने ८० में स्नातकोत्तर किया और पत्रकारिता में डिप्लोमा कियाl उसके बाद १ साल तक कवि सम्मेलन किया और नौकरी का प्रयास भी किया जब नौकरी नहीं मिली तो फिर मैने सोच लिया की नौकरी करनी ही नहीं हैl शादी करने के लिए एकबार व्यवसाय करना पड़ा क्योंकि लड़की वाले आते थे, तो पूछते थे की लड़का क्या करता है? तो घर वाले कहते थे कवि है, तो वो लोग बोलते थे ये तो ठीक है, पर करता क्या है? कवि जान लेने के बाद वो वापस नहीं आते थेl  मैने ३-४ लाख रूपये ख़राब किये शादी करने के लिए, शादी करते ही मैने व्यवसाय बंद कर दिया क्योंकि व्यवसाय करना मुझे आता ही नहीं थाl शादी के बाद मेरी सास बहुत परेशान रहती थी ,क्योंकी लोग पूछते थे  आपका दामाद क्या करता है, तो जब वो कहती थीं कि कवि है तो लोग सहानभूति की दृष्टि से देखते थे।

क्या आपको कभी ऐसा लगा की आपने नौकरी न करने का निर्णय ले कर गलती की?
नहीं, मुझे कभी भी नहीं लगा क्योंकि ये ही मेरे मन का कार्य है और दूसरी बात जब मै लोगों के हँसते हुए चेहरे देखता हूँ तो बहुत ही ख़ुशी होती हैl  फिर इस ख़ुशी को किसी भी पैसे से तौला ही नहीं जा सकता हैl

कविता लिखने की बहुत सी विधाएँ हैl आपने हास्य व्यंग को ही क्यों चुना ?
हास्य का बोध तो बचपन से ही होता है, बस उसी धारा में लिखता गया वैसे तो गंभीर कविता भी बहुत लिखीं है l मेरे विचार से गंभीर कविता लिखना आसान होता हैl हास्य लिखना बहुत कठिन होता है किसी को रुलाना आसान है, पर हँसाना बहुत ही कठिन होता हैl

आप अपनी कविता का विषय कैसे चुनते हैं?
मै अपने आसपास की घटनाओं को ही अपनी कविता का विषय बनाता हूँl हास्य विसंगतियों से ही निकलता है l हास्य के धरातल में करुणा ही होती हैl काल्पनिक स्थितियों में हँसना कठिन होता है।

आप अपनी  मानक कविता किसको मानते हैं?
रचना जी ये तो वही बात है की किसी माँ से पूछा जाये की आपका कौन सा बच्चा आपको ज्यादा प्यारा है  मुझे तो अपनी सारी ही कवितायेँ पसंद आती हैl कुछ लोगों को 'साहब सेब और राधेश्याम' पसंद आती है, किसी को 'ढूंढते रह जाओगे' और किसी को 'कारगिल 'वाली पसंद आती हैl
 
'साहब सेब और राधेश्याम 'इस कविता का विषय आपको कैसे मिला?
कोई मुझे बता रहा था की नौकरी पर किसी और को रखना था, तो साक्षात्कार में खाना पूर्ति के लिए ऐसे ही प्रश्न पूछ रहा था और उत्तर देने वाले को भी पता था की उसको नौकरी नहीं मिलनी है, तो बस जानबूझकर वो गलत गलत जवाब दे रहा थाl बस, इसी बात को मैने संवाद के रूप में लिखा दिया और कविता बन गई।

कारगिल युद्ध के समय किस बात ने आपको आहत किया जिससे कारगिल वाली कविता बनी?
मै एक कार्यक्रम का संचालन  कर रहा था,  उस समय कारगिल युद्ध चल ही रहा थाl उस समय खून देने की मुहिम चल रही थी संचालन करते समय मेरे मुँह से निकल गया  सैनिकों को देने के लिए खून  भेजा तो जा रहा है पर कहीं किसी नेता का खून न चला जाये,नहीं तो बहुत गड़बड़ हो जाएगी l बस उसी दिन ये कविता लिखी गईl

एक  कवि के लिए पुरस्कार पाना कितना महत्वपूर्ण है?
पुरस्कार पाना अच्छा लगता है, पर एक कवि को तो रोज ही पुरस्कार मिलता हैl जब आपके श्रोता तालिया बजते हैं, हँसते हैं बही उसका पुरस्कार होता है l उससे बड़ा पुरस्कार और क्या हो सकता है?

आपकी कविताओं को सुन कर श्रोता आपकी बहुत प्रशंसा करते हैं क्या कोई ऐसी प्रशंसा जो आपको अभी भी याद हो?
जी हाँ, ऐसी तो बहुत सी हैं पर एक बताता हूँ, शिकागो में कर्यक्रम था तो वहां एक सज्जन आये, उन्होंने कहा की मेरी उम्र ८२ साल है और मै जीवन में इतना आज तक नहीं हँसाl जब ऐसे कोई कहता है तो इससे बड़ा पुरस्कार क्या होगा।

आप कर्यक्रमों के सिलसिले में बहुत दिनों तक घर से बाहर रहते हैं, क्या इसको लेकर घर में कभी कोई परेशानी हुई?
नहीं, ऐसा तो नहीं हुआ क्या है कि जब घर पर रहते हैं तो पूरा  समय घर को ही देते हैं। एक बार क्या हुआ कि मै करीब १० दिनों तक घर पर रहा तो मेरा बेटा जो की उस समय छोटा था मेरे पास आया बोला इतने दिनों से आप घर पर हैं तो घर का खर्च कैसे चलेगा?
 
'फ़िलहाल इतना ही' आपकी पहली किताब हैl इसको निकालने का आपने कैसे सोचा और इसका नाम ये क्यों रखा?
उस समय तक मेरे पास इतनी ही कविताएँ थी, तो मैने नाम रखा 'फ़िलहाल इतना ही'  बाकी की बाद में देखेंगेl किताब निकालने के दो कारण थेl एक तो ये की मेरी पहली अमेरिका यात्रा होने वाली थीl इसलिए लगा की एक किताब होनी चाहिए पर तब निकल नहीं पायी थी, जब मै दूसरी बार आया तब किताब ले कर आया था। किताब निकालने से सारी कविता एक जगह संग्रहित हो जाती हैं। कागज़ पर लिख दो तो इधर-उधर हो जाता है एक बार मेरी डायरी कहीं रह गयी थी, तो मेरी सारी कविताएँ चली गयीं फिर  मिली नहीं मुझे। 'हास्य व्यंग की शिखर कवितायेँ' मेँ मैने कविताओं का संकलन किया है इसमें ओम प्रकाश ‘आदित्य’, हुल्लड़ जी, माणिक वर्मा जी, वेद प्रकाश जी तक की श्रेष्ठ कविताएँ हैं,  मै अभी एक पुस्तक पर कार्य कर रहा हूँ वेद प्रकाश के बाद जितने भी हास्य व्यंग्य के कवि आये हैं उन पर किताब निकालने की सोच रहा हूँ।

हास्य और व्यंग्य के बीच जो अंतर है वो क्या है?
हास्य यदि थोड़ा सा फिसले तो अश्लील हो सकता हैl व्यंग्य यदि फिसले तो गाली हो जाता हैl  हास्य को अश्लील नहीं होना चाहिएl व्यंग्य ऐसा होना चाहिए की जिसपर किया जाय उसको भी मजा आयेl  इन दोनों में मै हास्य को कठिन मानता हूँl

अमेरिका में कविता सुनाने मेँ आपको कैसा  लगता है?
यहाँ लोग बहुत ही अच्छा सुनते हैंl बस एक ही बात की कमी लगती है कि यहाँ का युवा कवि सम्मेलनों मेँ नहीं आता है l जो बच्चे यहाँ जन्मे हैं, वो नहीं जुड़ रहे हैंl मुझे ऐसा लगता है कि हमने अपने बच्चों को धर्म के प्रति तो जागरूक किया, पर भाषा के प्रति जागरूक नहीं कर पाएl

टीवी पर कविता सुनाने मेँ और मंच पर कविता सुनाने मेँ  क्या अंतर पाते हैं, और आपको कविता सुनाने मेँ कहाँ ज्यादा अच्छा लगता है?
मंच पर कविता सुनाने मेँ ज्यादा आनंद आता हैl टीवी पर कविता सुनाने मेँ ऐसा है की लोगों को चेहरा जाना-पहचाना हो जाता है और एक साथ पूरे भारत मेँ लोग देख पाते हैंl मंच पर कविता सुनाने मेँ आप लोगों की प्रतिक्रिया तुरन्त देख पाते हैंl

कभी ऐसा हुआ है के आपने किसी पर व्यंग्य किया हो और उसको बुरा लगा हो?
जी ऐसा एक किस्सा बहुत रोचक हैl मै दिल्ली में एक कार्यक्रम में कविता पढ़ रहा था, उसमे मल्लिका शेरावत पर दो-तीन व्यंग्यात्मक टिप्णियाँ हो गईं थी, तो एक सज्जन बहुत गुस्से में मेरे पास आये बोले, "ये क्या बकवास कर रहें हैंl" मैंने कहा "क्या कर दिया मैने?"  वो बोले, "वो मल्लिका शेरावत का काम हैl  मैंने कहा "ये मेरा काम है, फिर आप इतना नाराज क्यों हो रहें है"? उसने कहा मै उसका पिता हूँ, तो मैंने तुरन्त माफ़ी मांग लीl मल्लिका शेरावत खुद होती तो आनंद ले भी सकती थी, पर पिता तो पिता है उसको बुरा लगना स्वाभाविक थाl

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