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विवशता और प्रतिशोध

शिवानी को माँ के पास आये हुए आज पूरे दो वर्ष हो गए हैं | अचानक पड़ौस में रहने वाली सुनीति भी अपनी ससुराल से अपनी माँ के घर आई हुई थी | जब सुनीति को पता चला कि शिवानी भी आजकल अपनी माँ के पास रहती है तो मिलने चली आई | शिवानी और सुनीति बचपन से ही साथ साथ पढ़तीं और मन की हर बात एक दूसरे से कहते कहते बड़ी हुई थीं | साथ साथ पढ़ती थी | सुनीति का विवाह शिवानी से लगभग एक वर्ष पूर्व हुआ था और वह शिवानी के विवाह में सम्मिलित नहीं हो पाई थी | इसलिए वह अपने मन में बचपन की यादें संजोये, शिवानी के विवाह की बातें पूछने की इच्छुक थी |

शिवानी ने जब सुनीति को देखा तो भागकर गले से लिपट कर रोने लगी, और अपने कमरे में ले गई | दोनों सखियाँ घनिष्टता से बातें करने लगीं | सुनीति के पूछने पर कि अचानक तुम यहाँ माँ के पास आकर रहने लगीं? क्या बात हुई जो तुमने पति को छोड़ दिया ? तब शिवानी ने लम्बी साँस लेकर बताया कि शादी के बाद वह अपने पति अवनीश के साथ अमेरिका चली गई थी | लगभग एक सप्ताह तक तो सब कुछ ठीक रहा परन्तु अवनीश की छुट्टी समाप्त होते ही वह ऑफिस जाने लगा और पीछे से मैं घर में अकेली रह जाती थी | एक दिन मैंने अवनीश से कहा कि मैं थोड़ा आसपास घूम कर आना चाहती हूँ क्योंकि समय नहीं कटता है तो अवनीश ने मना कर दिया और कहा कि, “मैं लेकर चलूँगा | तुम कहीं भी अकेली नहीं जाओगी |” घर में गिनी चुनी नाप तोल कर बहुत कम खाने पीने की चीज़ें आती थीं | पूरी गृह व्यवस्था अवनीश के हाथ में थी | मुझे किसी चीज़ की आवश्यकता होती तो अवनीश मना कर देता था | माँ और पिता जी से भी बात नहीं कर पाती थी क्योंकि फ़ोन में पैसे ख़र्च होते थे और वह भी डॉलर में | धीरे धीरे मैंने अवनीश से कहा कि मैं पढी लिखी हूँ कुछ काम कर सकती हूँ पर इसकी भी अनुमति नहीं मिली | बस मैं घर की चार दीवारी में बंद होकर रह गई |

शिवानी अपनी व्यथा कथा सुनाये जा रही थी | बीच बीच में दुःख भरे आंसू निकल कर शिवानी के कपोलों पर लुढ़क जाते थे | शिवानी ने कहा, “सुनीति तुम्हें तो मालूम है कि मैं अपने स्कूल और कॉलेज में हमेशा हर गतिविधि में प्रथम रहती थी | कितने सारे कप और पुरस्कार जीते थे मैंने | लेकिन क्या वे सब यही दिन देखने के लिए थे सोच सोच कर मेरा दम घुटने लगा | मैंने कई बार अवनीश को समझाया लेकिन उस पर कोई असर नहीं हुआ | वह तो बस एक एक पैसा जमा कर के अपनी माँ को भेजता था | ऑफ़िस जाते समय मुझे केवल आधी ज़ुकुनी और आधा आलू काट कर दे जाता था और बाकी सभी खाने की वस्तुएं ताले में बंद कर जाता था | घर के दरवाज़े में भी बाहर से ताला लगा जाता था | यही सिलसिला लगभग छः माह तक चलता रहा | मैं पूरी तरह से ऊब गई थी, इस समस्या से बाहर निकलने का कोई भी समाधान मेरे पास नहीं था | कैसे अवनीश को समझाऊँ कुछ समझ में नहीं आता था | कोई सखि भी तो नहीं थी जो बात करके अपनी मन की परेशानी साँझा कर सकती | नौबत यहाँ तक आ गई कि वह मुझ पर हाथ भी उठाने लगा | हम दोनों का विवाहित दम्पति के रूप में तालमेल नहीं बैठ रहा था | तलाक़ के लिए भी मैंने सुझाया लेकिन उस पर भी सहमत नहीं हुआ | अब मुझे लगने लगा कि वह मुझे यूँ ही जीते जी मार डालने पर आमादा है | मैंने पहली बार मनुष्य के रूप में एक राक्षस को अपने ही घर में रहते देखा | अगर कभी माँ का फ़ोन आता तो मुझे डराता कि अगर कुछ भी कहा तो मार डालूँगा, इसी डर से कभी माँ से भी कुछ नहीं कह पाई | सदा ही अपने माँ और पिता जी को विवशता पूर्ण अँधेरे में रखती रही | मैं उसके घर में केवल एक कामवाली मात्र बन कर रह गई थी | एक कामवाली को भी अपने मन से जीने की स्वतंत्रता होती है | मैं उससे भी वंचित रखी गई थी |” अपने माँ, पिता की इकलौती संतान जिसे कभी किसी भी चीज़ से वंचित नहीं रखा गया आज एक एक दाने की मुहताज थी | कितने प्यार से पिता जी ने मेरे लिए यह लड़का देखा था, उन्हें क्या पता था कि उनकी लाडली यहाँ अमेरिका में इतने दुखों का सामना अकेले ही करेगी |

“एक दिन जब अवनीश बाथरूम में नहा रहा था तो यकायक मेरे मस्तिष्क में एक विचार आया कि क्यौं न अपने पड़ोसियों, जिनसे अभी तक मेरा कोई परिचय नहीं था, की सहायता ली जाय | बस जल्दी से मैंने एक कागज़ के पर्चे पर सूक्ष्म रूप से अपनी समस्या लिखी और ९११ बुलाने के लिए प्रार्थना की क्योंकि मैं उस घर में एक बंधक से अधिक कुछ भी नहीं थी | मनुष्य की सहायता मनुष्य ही तो करते हैं, बस इसी विचार से मैंने यह क़दम उठाया था | जान पहचान होने न होने से अधिक फ़र्क नहीं पड़ता है, ऐसा मेरा विश्वास था | इन्हीं विचारों के बीच मैं जल्दी से वह पर्चा पड़ोसियों के दरवाज़े के तले से अन्दर खिसका कर आ गई | मरती क्या न करती की स्थिति से ग्रस्त मेरी इस क्रिया ने अपना रंग दिखाया | एक घंटे के अन्दर ही पुलिस और अम्बुलेंस वाले मेरे दरवाज़े पर आ पहुंचे | अवनीश उस समय तक ऑफ़िस जा चुका था | बाहर दरवाज़े पर ताला लगा था | लेकिन पुलिस वालों को इस बात का पूरा आभास था कि अन्दर कोई अवश्य बंद है | तभी मैंने खिड़की खोल कर अपने होने का संकेत दिया और इशारों से समझा दिया कि वो कृपया दरवाज़ा तोड़ दें | मेरी स्वतंत्रता अब मुझसे केवल कुछ ही क्षण दूर थी, यह सोच कर मैं फूली नहीं समा रही थी | पुलिस ने दरवाज़ा तोड़ कर मुझे उस बंधन से मुक्त कराया | मेरी पूरी मेडिकल परीक्षा की गई और अवनीश के विरुद्ध मुक़दमा चलाया गया | मैं भारत में माँ और पिता जी के पास वापिस आ गई |”

शिवानी की आँखों से निरंतर अश्रु धारा बह रही थी और सुनीति उसे बराबर सांत्वना दे रही थी | सामने दीवार पर टंगी शिवानी के पिता जी की तस्वीर मानों अपनी प्यारी बिटिया को बचपन की वह लोरी, जो वह अक्सर गाया करते थे, सुनाकर खुश करना चाहती थी | शिवानी को लगा जैसे पिता जी अब भी गा रहे हैं –

“ मेरी प्यारी गुड़िया की गुन गुन, सुन पापा का मन होता रुन झुन…….”

सुनीति ने पूछा, “अब आगे क्या इरादा है ? क्या फिर से शादी करोगी ?” लेकिन शिवानी के मन में तो प्रतिशोध के शोले भड़क रहे थे | वह शादी नहीं करेगी, वह तो पहले अवनीश को सबक़ सिखाएगी | कब और कैसे बस इस की ही योजना बना रही है | “मैं अपने पिता जी की मृत्यु जो मेरे इस ही दुःख के कारण हुई और जो स्वयं को अकारण ही दोषी समझते थे, का बदला लेकर रहूँगी |” इसी अटूट विश्वास के साथ शिवानी उठी | उसे लगा जैसे एक बिजली जैसी चमक उसके मस्तिष्क में उजागर हुई और उसके शरीर में शक्ति भर गई | शिवानी ने सुनीति से कहा क्या तुम मेरा साथ दोगी मुझे मेरे प्रतिशोध में जो इतने वर्षों से मेरे सीने में सीली लकड़ी सा जल रहा है ? सुनीति ने शिवानी का हाथ थाम कर कहा चाहे कुछ भी हो जाए में सदा तुम्हारे साथ हूँ और तुमें न्याय दिलवा कर रहूंगी | दोनों ने योजना बनायी कि किस वकील से मिला जाए और सलाह ली जाए साथ ही अनेक सबूत भी तो इकट्ठे करने थे|

तभी बाहर से माँ की आवाज़ आयी, “अरे तुम दोनों कहाँ हो ? आओ चाय पी लो, चाय तैयार है |” दोनों सखियों के मन में अनोखा विश्वास दिखाई दे रहा था |

सविता अग्रवाल ‘सवि’ : परिचय
सविता अग्रवाल कैनेडा की जानी मानी लेखिका हैं | इनका काव्य संग्रह “भावनाओं के भंवर से” २०१५ में प्रकाशित हुआ और २०१५ में ही एक उपन्यास “खट्टे मीठे रिश्ते” की विश्व के ६५ अन्य लेखकों सहित सह लेखिका रही हैं | सविता जी अनेक संस्थाओं की काव्य गोष्ठियों और सम्मेलनों में काव्य पाठ में सह भागिता करती रहती हैं | इनकी रचनाएँ – कवितायेँ, लेख, लघु कथाएं, हाइकु एवम् संस्मरण समय समय पर भारत, हॉलैंड और कैनेडा की विभिन्न पत्रिकाओं और इ-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहती हैं | सविता जी कैनेडा में एक सिध्हस्त समाज सेविका के रूप में भी कार्यरत हैं और कैनेडा की साहित्यिक संस्था हिंदी रायटर्स गिल्ड की भूतपूर्व निदेशिका।

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