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सम्मेलन होते रहे मगर संयुक्त राष्ट् संघ की भाषा नही बन सकी हिंदी

‘विश्व हिंदी दिवस’ मनाए जाने के पीछे ‘विश्व हिंदी सम्मेलनों’ की भूमिका रही है। उन्नीस सौ पचहत्तर से ‘विश्व हिंदी सम्मेलनों’ का सिलसिला चला। पहला नागपुर में हुआ। दूसरा सम्मेलन उन्नीस सौ छिहत्तर में मॉरीशस में। फिर सात वर्ष के अंतराल के बाद सन उन्नीस सौ तिरासी में नई दिल्ली में आयोजित हुआ। चौथा इसके दस साल बाद उन्नीस सौ तिरानवे में पुन: मॉरीशस में हुआ। पांचवां उन्नीस सौ छियानवै में त्रिनिदाद में, छठा, उन्नीस सौ निन्यानवै में लंदन में, सातवां दो हज़ार तीन में सूरीनाम में आयोजित हुआ और आठवां न्यूयार्क में। नवां दो हज़ार बारह में जोहान्सबर्ग में हुआ, दो हज़ार पंद्रह में भोपाल में हुआ। अब तक का अंतिम ग्यारहवां हुआ है, मॉरीशस में। बताता चलूं कि मैं अधिकांश सम्मेलनों में दी गई ज़िम्मेदारियों के साथ सम्मिलित हुआ हूं।

‘विश्व हिंदी सम्मेलन’ की संकल्पना राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा द्वारा की गई थी। राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा के ही तत्त्वावधान में तीन-दिवसीय प्रथम विश्व हिंदी सम्मेलन चूंकि दस जनवरी उन्नीस सौ पिचहत्तर को नागपुर में आयोजित किया गया, इसीलिए आगे चलकर प्रतिवर्ष ‘विश्व हिंदी दिवस’, मनाने के लिए दस जनवरी की तिथि सुनिश्चित कर दी गई।

सम्मेलन का उद्देश्य पहले सम्मेलन में ही स्पष्ट कर दिया गया था कि, उन्हें तत्कालीन वैश्विक परिस्थिति में हिंदी को किस प्रकार सेवा का साधन बनाना है। उनकी कामना थी कि हिंदी संयुक्त राष्ट्र संघ में प्रवेश पाकर विश्वभाषा के रूप में समस्त मानवजाति की सेवा की ओर अग्रसर हो। साथ ही यह किस प्रकार भारतीय संस्कृति का मूलमंत्र ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ विश्व के समक्ष प्रस्तुत करके ‘एक विश्व एक मानव-परिवार’ की भावना का संचार करे।
पहला विश्व हिंदी सम्मेलन किसी सामाजिक या राजनीतिक प्रश्न अथवा संकट को लेकर नहीं, बल्कि हिंदी भाषा तथा साहित्य की प्रगति और प्रसार से उत्पन्न प्रश्नों पर विचार के लिए भी आयोजित किया गया।

माना कि हिंदी राजभाषा है, लेकिन राजभाषा के रूप में इसका कितना महत्व है और राजकाज में कितना प्रयोग में आती है, ये कुछ ऐसी बातें हैं, जिन्हें हम दबा देते हैं। हिंदी अपने ही देश में अपने अधिकार खोने लगी थी और हम बात कर रहे थे संयुक्त राष्ट्र संघ में हिंदी की आधिकारिकता की।
संयुक्त राष्ट्र संघ में भाषा की ‘श्रेष्ठता’ स्वीकार कराने के लिए कुछ निर्धारित मानक थे। हिंदी से जुड़े आंकड़ों को लेकर हम वहां खरे नहीं उतरे। दरअसल, हुआ क्या कि चीन में भाषा के प्रति राजनीतिक सदिच्छा रही और लाल झंडे तले लालफ़ीताशाही ने देश के सारे नागरिकों से भाषा के कॉलम में एक ही नाम भरवा लिया—‘मंदारिन’। हमारे लोकतंत्र में कोई अंकुश तो था नहीं, जनगणना में राज्यवार हमारे नागरिकों ने अलग-अलग भाषाएं लिख दीं। हालांकि, चीन में भी हमारे देश के समान तीस-चालीस भाषाएं अस्तित्व और चलन में थीं। सत्तर के दशक के प्रारंभ में उनकी आबादी लगभग सत्तर करोड़ थी। जनगणना के भाषागत सर्वेक्षण के आधार पर यूएनओ ने स्वीकार कर लिया कि चीनी बोलने वाले सत्तर करोड़ हैं। और उन्होंने ‘मंदारिन’ को मान्यता दे दी। संख्या-बल में हम दूसरी महाशक्तियों से भी पिछड़ते गए।

अनेक विद्वान मानते हैं कि हिंदी की महनीयता तभी मानी जाएगी, जब वह संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा के रूप में मान्यता पा जाएगी। विडम्बना देखिए कि सन् पिचहत्तर से लेकर अब तक ग्यारह विश्व हिंदी सम्मेलन हो चुके हैं लेकिन हिंदी को संयुक्त राष्ट्र संघ की आधिकारिक भाषा बनने का गौरव प्राप्त नहीं हुआ। संयुक्त राष्ट्र संघ के नखरे बहुत थे।

दसवें सम्मेलन की अनुशंसा थी— ‘संयुक्त राष्ट्र संघ में हिंदी को समयबद्ध तरीक़े से आधिकारिक भाषा बनाने के लिए संकल्प लिया जाना चाहिए। इस संबंध में अन्य देशों का समर्थन जुटाने के लिए भारतीय दूतावासों/मिशनों को और अधिक प्रयास करने चाहिए’।
इसमें संदेह नहीं कि तत्कालीन विदेश मंत्री सम्मान्या श्रीमती सुषमा स्वराज के नेतृत्व में अनुशंसा अनुपालन समितियों की अठारह बैठकें हुईं और लगने लगा कि अब तो पुराना सपना साकार हो ही जाएगा। उन्होंने भारत सरकार के विभिन्न मंत्रालयों में हिंदी की अनिवार्यता के लिए बहुत कुछ किया पर वे भी संयुक्त राष्ट्र संघ के मंच से एक हिंदी बुलेटिन प्रारंभ कराने से अतिरिक्त कुछ नहीं कर पाईं ।
‘विश्व हिंदी दिवस’ का आयोजन अभी तक विदेश मंत्रालय ही अपने सीमित दायरे में कराता आ रहा है। विदेश मंत्रालय में अब सुषमा जी जैसा कोई विकट हिंदी एवं अन्य भारतीय भाषा-प्रेमी नज़र नहीं आ रहा। ऐसा लगने लगा है कि मंत्रालय की प्राथमिकताओं में भारतीय भाषाओं की अस्मिता जैसे मुद्दे गौण हो गए हैं।

उम्मीदें कभी समाप्त नहीं होतीं। हिंदी में भारत है। भारत की समेकित संस्कृति है। हम अगर नए वैश्विक संदर्भों में ‘विश्व हिंदी दिवस’ मनाएंगे, तो लक्ष्य भी पा जाएंगे। इस बार एक नए सोच के साथ विज्ञान-भवन में एक भव्य आयोजन होना था, लेकिन अफ़सोस कि कोरोना की भेंट चढ़ गया।

अनुपालन को प्यासी बैठीं जाने कितनी अनुशंसाएं,
आड़े आती हैं शंकाएं, पीड़ित करती आशंकाएं।
मंज़िल हो जाए परास्त अगर गतिमान प्रगति का चक्का हो,
अनकिया सभी पूरा हो यदि, संकल्प हमारा पक्का हो।

[email protected]

साभारः वैश्विक हिंदी सम्मेलन की वैबसाइट –www.vhindi.in
‘वैश्विक हिंदी सम्मेलन’ फेसबुक समूह का पता-https://www.facebook.com/groups/mumbaihindisammelan/
संपर्क – [email protected]

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