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चुनाव आयुक्तों की संवैधानिक स्थिति

भारत विश्व का सर्वाधिक जनसंख्या वाला लोकतंत्र है ।भारत के निर्वाचन आयोग के अनुसार भारत में लगभग 900 मिलियन लोग वोट देने के लिए पात्र हैं ,जिसमें 432 मिलियन महिलाएं भी है। त्रिस्तरीय लोकतंत्र में( केंद्रीय / संघीय स्तर, राज्य स्तर एवं स्थानीय स्तर) पर शासन को भयमुक्त और स्वतंत्र संचालित करने के लिए स्वतंत्र, दबाव विहीन चुनाव आयोग की वर्तमान परिपेक्ष में अति आवश्यकता है। चुनाव में सभी सामाजिक समूह बिना किसी भेद( धर्म, लिंग ,जाति और समुदाय के आधार) पर सम्मिलित हो सके, जिससे एक सशक्त एवं स्थिर सरकार का निर्माण करके लोकतांत्रिक मूल्यों एवं आदर्शों को स्थापित किया जा सके। भारत में स्वच्छ ,पारदर्शिता पूर्ण चुनाव को पूर्ण करने में चुनाव आयोग की महत्वपूर्ण भूमिका होती है ।देश( राज्य) की स्वच्छ और निष्पक्ष चुनाव प्रक्रिया की स्वस्थ लोकतंत्र का आधार होती है ।

हाल ही में माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति को लेकर टिप्पणी की है कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्तों पर बहुत महत्वपूर्ण जिम्मेदारी होती है ,अतः इनके निष्पक्ष नियुक्ति के लिए मुख्य न्यायाधीश को शामिल किया जाना चाहिए।न्यायालय के उपयुक्त टिप्पणी करने का लोकतांत्रिक शासन प्रणाली में क्या उद्देश्य है? चुनाव आयुक्त का कार्यकाल 6 वर्ष का होता है, सन 1991 के विधि में प्रावधान है कि यदि आयुक्त 6 साल पूरे होने के पहले 65 साल का हो जाता है तो उसका कार्यकाल समाप्त हो जाएगा। सरकार ऐसे नौकरशाह को नियुक्त करती है जो कार्यकाल पूरा होने से पहले ही 65 वर्ष का हो जाए, ताकि वह नया चुनाव आयुक्त नियुक्त कर सके; इससे मुख्य चुनाव आयुक्त एवं अन्य चुनाव आयुक्त दबाव में रहते हैं एवं सरकार के प्रति शुभ इच्छा का भाव रखते हैं। न्यायपालिका का कहना है कि ऐसे चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की जाए जो कार्यकाल को लेकर दबाव में ना रहे, एवं सरकार के मंत्रिपरिषद, यहां तक कि प्रधानमंत्री के विरुद्ध भी शिकायत मिलने पर कार्यवाही कर सकें। किसी भी संवैधानिक पद पर नियुक्ति के लिए तटस्थ एवं योग्य चयन समिति समय की मांग है, क्योंकि लोकतंत्र में समानता ,स्वतंत्रता एवं न्याय के संप्रत्यय का अत्यधिक महत्व है ।

चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए ‘ कॉलेजियम’ के समान व्यवस्था की आवश्यकता है; इसमें प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और मुख्य न्यायाधीश सम्मिलित हो,जिससे पारदर्शिता एवं योग्य व्यक्ति का चयन हो सके, जिसके पश्चात राष्ट्रपति नियुक्त कर सके। न्यायपालिका भी इसी तथ्य की ओर इशारा कर रही है कि संविधान के अनुच्छेद 324 के लिए ऐसी व्यवस्था का निर्माण हो, जिससे लोकतांत्रिक व्यवस्था कल्याणकारी लक्ष्यों को पूरा कर सकें ।

 भारत के संविधान का अनुच्छेद 324 निर्वाचन आयोग को संसद(लोकसभा + राज्यसभा + राष्ट्रपति), विधानसभाओं, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनाव की प्रक्रिया में निरीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण की अत्यंत महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपता है ।सर्वोच्च न्यायालय ने मोहिंदर सिंह गिल बनाम मुख्य चुनाव आयुक्त( 1978) के मामले में टिप्पणी करते हुए कहा है कि चुनाव आयोग को व्यापक उत्तरदायित्व सौंपे गए हैं ।इस उत्तरदायित्व( स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव करवाने का) के अंतर्गत काम करवाने का अधिकार, जिम्मेदारी तथा प्रशासनिक और अन्य तरह के काम आते हैं, जैसा की स्थिति के अनुसार आवश्यक हो”। इसी प्रकार सर्वोच्च न्यायालय ने भीम सिंह बनाम चुनाव आयोग(1996) के वाद में कहा है कि चुनाव करवाने के लिए’ उपर्युक्त और अनुकूल वातावरण ‘ बनाए रखा जाए ,इसका आशय यह है कि चुनाव आयोग उपर्युक्त एवं अनुकूल वातावरण को सुनिश्चित करने के लिए जो भी आवश्यक समझे, कर सकता है। उन अधिकारों का भी प्रयोग कर सकता है जो ‘ निर्वाचनों का संचालन नियम’ और उसके अंतर्गत बनाए गए नियमों द्वारा निर्दिष्ट न हो ” । इससे यह स्पष्ट होता है कि चुनाव आयोग को अप्रत्याशित स्थितियों में कार्य करने के लिए अवशिष्ट शक्तियां प्रदान की गई है, जिसके द्वारा निष्पक्ष राजनीतिक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित कर सकें। लोकतांत्रिक शासन प्रणाली का सकारात्मक उपादेयता है कि भारत में चुनाव आयोग इन्हीं शक्तियों के माध्यम से वे नियम बनाए हैं जिनसे राजनीतिक दल संचालित होते हैं।

चुनाव आयोग ने 1951 – 1952 में होने वाले प्रथम चुनाव से ही अपने अधिकारों व शक्तियों एवं तटस्थ उपादेयता के कारण अपनी संवैधानिक कर्तव्य एवं दायित्वों का निर्वहन किया है। 90 के दशक में रहे मुख्य चुनाव आयुक्त श्री टी. एन शेशन को उनके मजबूत व गंभीर व्यक्तित्व एवं ठोस निर्णयों के लिए याद किया जाता है। सरकार चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक निकाय पर अपना पूर्ण नियंत्रण बनाए रखना चाहती है।संविधान के अनुसार इसे सरकार से अलग स्वतंत्र निकाय के रूप में काम करना चाहिए। इस विषय को लेकर अनेक समिति और आयोग बनाए गए ,जिन्होंने इसके गठन व स्वायत्तता पर प्रतिवेदन दिया है। दिनेश गोस्वामी समिति ने अपनी संस्तुति सरकार को दी थी, लेकिन सरकार ने इसको ठंडे बस्ते में डाल दिया है।

सरकारों (किसी भी दल की ) इस मनमानी के पीछे समस्या यह है कि चुनाव आयुक्तों को लेकर संविधान एवं 1991 के चुनाव आयोग अधिनियम में उन मुद्दों को लेकर स्पष्टता नहीं है जिन पर होनी चाहिए ।आयुक्तों को 6 वर्ष या 65 वर्ष तक ही बने रहने का अधिकार है ।सरकार ने इस बिंदु का लाभ उठाते हुए इतने वरिष्ठ नौकरशाहों की नियुक्ति की परंपरा बना ली है कि चुनाव आयुक्त (मुख्य चुनाव निर्वाचन) बहुत जल्द सेवा मुक्त हो जाते हैं। संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार एवं संसदीय परंपराओं के आधार पर चुनाव आयुक्त के पदों पर प्रशासनिक अधिकारी को नियुक्त किया जाता है। ऐ प्रशासनिक अधिकारी जिलों में लंबे समय तक काम करते हुए चुनाव करवाने का लंबा अनुभव होता है ,इसलिए इनको प्राथमिकता दी जाती है। न्यायपालिका संविधान की संरक्षक है, और न्यायपालिका ने इस मामले को उठाकर स्वस्थ लोकतंत्र, मजबूत एवं पारदर्शी चुनाव आयोग के लिए गंभीरता से कदम उठाया है। हमारे संविधान (जो भूभाग की सर्वोच्च विधि होती है )निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव संविधान का मौलिक तत्व है।देश( राज्य) के बौद्धिक व्यक्तित्व एवं संवैधानिक मामलों के विशेषज्ञ इस मामले में कोई सकारात्मक हल निकाल लेने की आशा की जाती है।

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