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कोरोना की लहर बनी राजनैतिक उपसर्ग

देश के हालात ऑक्सीज़न और साँसों के लिए मोहताज हो रहे थे, भय और भयाक्रांत जनता इधर-उधर दौड़ रही थी, किसान पहले से ही सड़कों पर थे, अब मरीज़ और परिजन दवाओं, इंजेक्शन और अस्पताल में उपचार मिलने की प्रतीक्षा करते-करते हाँफ़ चुके थे, कहीं रेमडीसीवीर तो कहीं प्लाज़्मा की चिल्लपुकार सुनाई दे रही थी। आपदा में कुछ लोग अवसर खोज रहे थे तो कुछ अपनों को बेबस रूप से चिर विदाई देते हुए रो रहे थे, कहीं मासूमियत शर्मसार थी तो कहीं माँग का सिंदूर यकायक उजड़ रहा था, कहीं घर का कमाऊ पूत छोड़कर जा रहा था तो कहीं परिवार की अन्नपूर्णा अपने साकेत की ओर प्रस्थान कर रही थी, कहीं मातम पसरा हुआ था तो कहीं हाहाकार। इसी आपदाकाल में राजनीति कभी गुरुदेव रविन्द्र नाथ के बंगाल में उबासियाँ ले रही थीं तो कहीं दमोह के नाम से मध्यप्रदेश में हल्ला बोल था। होना क्या था बस वही कि एक जंग जीत कर सौ जंग हार जानी थी। हुआ भी वही…. राजा जीत कर हार गया और प्रजा हार कर अपनी मृत्यु के वियोग में आज भी बेबस, लाचार और शोकमग्न है।

हालात देश के कुछ इस तरह के हो चुके हैं कि समाधान की ओर जाने वाले रास्तों पर परेशानियों ने चक्काजाम लगा दिया और सुलह के सारे रास्ते मौन हो गए। पक्ष और विपक्ष दोनों की ही ज़िद ने कोरोना को भारत पर हावी कर दिया और सत्ता का मदमस्त हाथी अपनी ही धुन में आज भी अपने ही गीत गा रहा है।

सत्ता का नैतिक कर्म है प्रजा का पालक बनना पर यहाँ हम हार गए, प्रजापालक ने कोशिशें तो की पर तब जब भयावह कोरोना भारत में अपनी पैठ जमा चुका था, इसीलिए वो तमाम प्रयास नाकाम ही माने गए। कहने को आईटी सेल तो अब अमेरिका या अन्य देशों से तुलना करके उपलब्धि के रूप में प्रचारित कर देगा कि ‘हमने फलाने देश से ज़्यादा लोगों की जान बचाई या फलाने देश की दवा से ज़्यादा कारगर हमारे देश की दवा निकली या फिर तमाम तरह के जतन पर असल तो यही है कि राजनीति ने राज की नीति के स्वप्न के चलते प्रजा को दीन-हीन और निरीह कर दिया।

अस्पतालों के बाहर मरने वालों की कतारें और श्मशान या क़बिस्तान में जलती अथवा दफ़नाई लाशों की गिनती भी रोंगटे खड़े कर हक़ीक़त बयाँ करने के लिए काफ़ी है। सुलगती चिकित्सा व्यवस्था और ध्वस्त होती मानवीयता ने देश के दूसरे मुखौटे से भी परिचित करवाया और राजनीति के ईमानदार जननेताओं पर समाजसेवियों के पुरुषार्थ को हावी होते देश ने देखा है।

यकीन मानिए विगत वर्ष आई कोरोना लहर ने मज़दूरों का खाली पेट, नंगे पाँव पलायन भी देखा है तो राशन, भोजन और रोज़गार-व्यवसाय के लिए तड़पता भारत दिया था और इस वर्ष आई कोरोना आपदा ने सुलगता और बिलखता भारत बनाने में कोई कमी नहीं रखी।

भारत में राजनीति की शाश्वत शिक्षा रामायण, महाभारत और चाणक्य नीति से सीखी जाती रही है और उन किताबों में कहाँ लिखा है कि एक-एक करके अपने योद्धाओं को खो देने के बाद भी प्रत्यर्पण न करने की हठ से सम्पूर्ण साम्राज्य को धधकती अग्नि में होम कर दो। वर्तमान दौर की राजनीति से नीति का विलोप हो गया और समर में केवल योद्धाओं की लाशों का अंबार लग गया, इसके बावजूद भी हमें चुनाव परिणामों की चिंता खाये जा रही थी।

आखिरकार मानवता भी मन के किस कोने में दुबक कर बैठ गई, यह भी देश जानने का इच्छुक है। एक समय तो सम्राट अशोक का मन भी इतनी लाशों को देखकर पिघल गया था कि ऐसे युद्ध से तो साम्राज्य हासिल हो सकता है पर बिना अपनों के उस साम्राज्य का क्या मोल! आपदाकाल में सरकार चुनाव की बजाए व्यवस्थाओं के दुरुस्तीकरण की ओर बढ़ जाती तो शायद यह दृश्य नहीं बनता और कई चिराग़ अब भी रोशन रहते।

विश्व स्वास्थ्य संगठन तो अब भी आगाह कर रहा है कि कोरोना की तीसरी लहर आने को है, पर क्या हमारी व्यवस्थाएँ इतनी दुरुस्त हैं कि उस लहर का मुकाबला कर पाएँगे? देश में दस में से छह शासकीय अस्पतालों में पीआईसीयू यानी बच्चों के लिए गहन देखभाल कक्ष अथवा वेंटिलेटर जैसे अत्यावश्यक उपकरणों की कमी है, चिकित्सा विज्ञान की आयुर्वेद के साथ ठनी हुई व्यवस्था देश को सही और कारगर उपचार देने में असमर्थ है। आखिर ऐसे कालखण्ड में राजनीति की नई चिंगारी देश को गर्त के सिवा कहाँ ले जाएगी!

भारत की राजनीति का आँकलन यदि बीते दो वर्षों का करेंगे तो यह कोरोनाकाल तो भारत की राजनीति पर उपसर्ग ही रहा क्योंकि इसी कोरोनाकाल में मानवीयता को किनारे कर जो लोग राजनीति का दुशाला ओढ़े घी पीने में मशगूल थे, उन्हीं चंद ज़िम्मेदार लोगों के कारण आपदा पर लगाम नहीं लग सकी और देश में स्थितियाँ बेकाबू होते हुए लाखों लोगों को काल का ग्रास बना गई।

हम यह कहते हुए अपनी ज़िम्मेदारियों से भाग नहीं सकते कि अन्य राष्ट्र भी कोरोना से जूझ रहे हैं या उनकी तुलना में हम कम या ज़्यादा हैं। यह तुलना का समय नहीं बल्कि अपने लोगों को आफ़त से बाहर निकालने का समय है। इस राजनैतिक उपसर्ग का परिणाम तो आगामी आम चुनावों में देखने को मिल सकता है क्योंकि हर भारतीय ने कोई अपना कहीं न कहीं खोया है।

[लेखक डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा देश में हिन्दी भाषा के प्रचार हेतु हस्ताक्षर बदलो अभियान, भाषा समन्वय आदि का संचालन कर रहे हैं]

डॉ. अर्पण जैन “अविचल”
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