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वैश्विक स्तर पर मानसिक स्वास्थ्य को समझने की महत्ती आवश्यकता

विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस 10 अक्टूबर पर
( विख्यात मनोरोग विशेषज्ञ डॉ.एम.एल. अग्रवाल से साक्षात्कार के आधार पर)

प्रगतिशील समाज की संरचना में विभिन्न कारकों के साथ – साथ मानसिक स्वास्थ्य की सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका है और इसे न केवल भारत में वरन वैश्विक स्तर पर बताने की आवश्कता है। भारत ही नहीं वरन दुनिया के सभी देशों में मानसिक स्वास्थ्य की समस्या सामने है। इसके प्रति वैश्विक रूप से समस्त राष्ट्रों को जागरूकता अभियान चलाए जाने की महत्ती आवश्कता है। परिवार और समाज की प्रारंभिक इकाई व्यक्ति होने से उसका मानसिक स्वास्थ्य दुरुस्त हो इसके लिए विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए।

अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त राजस्थान में कोटा शहर के मनोरोग विशेषज्ञ डॉ.एम.एल.अग्रवाल लोगों में जन जागृति के लिए पिछले 45 साल से सतत रूप से सक्रिय हैं। एक साक्षात्कार में उन्होंने ने कहा मानसिक स्वास्थ्य का अभिप्राय मानसिक बीमारी का नहीं होना मानसिक स्वास्थ्य का द्योतक नहीं है बल्कि जीवन पर्यंत व्यक्ति विभिन्न तनावों की परिस्थितियों में समय के अनुसार व्यवहार में उतार चढाव रहित जीवन भाव, स्मृति और विवेक के सामंज्य को बनाए रखना ही अच्छे मानसिक स्वास्थ्य का प्रतीक है। विश्व स्वास्थ्य संगठन भी इसी अवधारणा से इतफाक रखता है।
खराब शारीरिक स्वास्थ्य जीवन की किसी भी अवस्था में मनुष्य की मन:स्थिति पर दुष्प्रभाव डालता है। ऐसे ही अवसाद,उत्तेजना तथा गंभीर मानसिक रोगों की परिणीति कैंसर, ह्रदय रोग, मधुमेह,गठिया एवं अस्थमा भयानक शारीरिक बीमारियों के रूप में होती है।

मानसिक बीमारियों के बारे में जानकारी देते हुए डॉ.अग्रवाल बताते हैं कि एक साधारण सिर दर्द , उदासी और भ्रम संबंधी परेशानी से भी मानसिक रोग हो सकते हैं जब की लोग इन्हें साधारण समस्या मानकर मानसिक चिकित्सक को दिखाने में गुरेज करते हैं। वे मानते हैं कि उनका इलाज पागलपन की बीमारी जैसा होगा। यह अजीब लगता है कि आज तक भी लोग मानसिक बीमारियों को पागलपन से जोड़ कर देखते हैं जब की यह धारणा एक दम गलत है।

आम आदमी को समझ में आए इस दृष्टि से उन्होंने बताया कि शारीरिक रोगों से शन्निपात, बुद्धि एवं स्मृति का हास एवम मंद बुद्धिता जैसे रोग हो सकते हैं। ये रोग किसी संक्रमण से, चोट या आघात से, जन्मजात, बाहरी विष शराब सेवन से, आंतरिक विष प्रभाव केंसर आदि के कारण से हो सकते हैं। मानसिक कार्यप्रणाली में विकार से विखंडित मानसिकता, अवसाद – उत्तेजना उन्माद या अन्य उन्माद रोग हो सकते हैं। मन: स्पात, सैकोसोमेटिक और व्यक्तित्व संबंधी रोग हो सकते हैं। अन्य प्रकार के मानसिक रोगों में यौन विकार,मादक पदार्थो का व्यसन,अपराध वृति का विकास आदि शामिल हैं।

मानसिक रोगों की पहचान कैसे हो के प्रश्न पर वह बताते हीं कि नींद नहीं आना या कम आना, सिर दर्द बने रहना, तनाव महसूस करना, भूख कम लगना, चिड़चिड़ापन ज्यादा समय तक बने रहना, अकेला रहना, अन्य लोगों के साथ रुचि नहीं होना, अपने आपसे बातें करना, किसी क्रिया को बार – बार दोहराना, बार – बार बेहोश होना, शक या वहम होना, अपने मारे जाने का संदेह महसूस करना, बार – बार हाथ धोना, मन में एक ही विचार बार – बार आना, जरूरत से ज्यादा शराब, अफीम, स्मैक, गुटखा आदि नशीलें पदार्थो का सेवन करना, बच्चों का जिद्दी होना, बिस्तर में पेशाब करना, अंगूठा चूसना और डरना आदि लक्षणों से मानसिक रोगी की पहचान की जा सकती है।

मानसिक रोगों के उपचार के प्रश्न का उत्तर देते हुए वह बताते हैं कि उपरोक्त प्रकार का कोई भी लक्षण होने पर मनोरोग विशेषज्ञ से संपर्क करना चाहिए। चिकित्सक की सलाह से दवाइयां ले और उनके परामर्श के बिना बंद नहीं करें। गंभीर रोग में बिजली का इलाज अच्छा और लाभदायक इलाज है। इसमें रोगी को किसी तरह का कोई नुकसान नहीं होता है। उन्होंने इस धारणा को एक दम गलत बताया कि एक बार शुरू होने पर बिजली का ही इलाज चलता है और दवाइयां असर नहीं करती हैं। बिजली का इलाज 5 से 10 बार तक होता है। बाद में जरूर के मुताबिक दवाएं ही चलती हैं।

जब मानसिक रोग घरेलू या सामाजिक परिस्थिति वश होता है तो उसकी वजह जान कर उसके रिश्तेदारों से बात करके समस्या का हल निकाला जाता है। कई बार केवल व्यवहार चिकित्सा से ही उपचार किया जाता है, इसमें रोगी से चर्चा कर उसे ठीक होने का प्रशिक्षण दिया जाता है।

डॉ.अग्रवाल का मानना है कि कुछ उपायों को अपना कर बहुत हद तक मानसिक रोगों से बचा जा सकता है। अच्छी खुराक और निरंतर परिश्रम, काम ही नहीं वरन मनोरंजन भी, नशीले पदार्थो के सेवन से दूर, अच्छे लोगों से मित्रता, किसी चीज के पीछे न भाग कर संतोष करना, नियमित व्यायाम, योग की आदत, बच्चों को अच्छे संस्कार देने, उन्हें पूरा प्यार देकर उनकी बात को ध्यानपूर्वक सुने तथा स्वयं भी जाने और बच्चे को भी मानसिक स्वास्थ्य के बारे में शिक्षित करने जैसे कुछ उपाय अपना कर मानसिक रोगों को दूर रख सकते हैं। यह बात खासतौर पर समझने की है की बीमारी का कोई भी लक्षण पाए जाने पर चिकित्सक से संपर्क कर इलाज शुरू करने में देर नहीं करें। एक महत्वपूर्ण बात वह बताते हैं कि रोगियों को कभी भी झाड़ फूंक करने वालों, नीम हकीमों, तांत्रिकों, जादू टोना उतारने वालों के चक्कर में नहीं उलझना चाहिए। इनके चक्कर में उलझ कर रोग ठीक होने की जगह गंभीर रूप धारण कर लेता है, और जब गंभीर स्थिति में रोगी चिकित्सक के पास आता है तो स्थिति विकट हो जाती है। इलाज भी लबें समय तक चलता है। मानसिक रोग किसी देवी देवता का शाप या छुआछूत का रोग नहीं है वरन शारीरिक और मानसिक वजह से होता है। कई रोगियों को मनोवैज्ञानिक प्रशिक्षण से ही काफी हद तक सुधार हो जाता है।

समाज को उनका यही संदेश है कि हर व्यक्ति अपने मानसिक स्वस्थ को अच्छा रखते हुए अपनी,अपने परिवार, समाज और देश की उन्नति और प्रगति में भागीदार बने। अपना आत्म सम्मान बढ़ाने के लिए एक कदम बढ़ाएं। इससे आपको खुद पर विश्वास होगा और खुद का सामना भी भली प्रकार कर पाएंगे।

(लेखक एवं राज्य स्तरीय अधिस्वीकृत स्वतंत्र पत्रकार हैं , कोटा में रहते हैं)
मो. 9928076040
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फोटो – डॉ.एम.एल.अग्रवाल एवं डॉ.प्रभात कुमार सिंघल।

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