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मुस्लिम आबादी बढ़ने के खतरे अब सामने आ रहे हैं

गत 30 दिसंबर को पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा में बहुसंख्यक मुसलमानों की भीड़ ने अल्पसंख्यक हिंदुओं के एक प्राचीन मंदिर को ध्वस्त करके जला दिया। इस प्रकार के जमींदोज का यह भारतीय उपमहाद्वीप में कोई पहला मामला नहीं था और यह आखिरी बार था- ऐसा भी कहा नहीं जा सकता। विश्व के इस भूखंड में देवालय विध्वंस की परंपरा सन् 712 में मो.बिन कासिम के सिंध पर आक्रमण के साथ शुरू हुई थी- जो गजनी, गौरी, खिलजी, बाबर, औरंगजेब और टीपू सुल्तान जैसे क्रूर इस्लामी आक्रांताओं के कालखंड से आजतक अविरत जारी है।

जब पाकिस्तान के खैबर में जिहादियों द्वारा प्राचीन हिंदू मंदिर को तोड़ा जा रहा था, तब लगभग उसी समय में भारत के आंध्रप्रदेश में कई हिंदू देवी-देवताओं की मूर्तियां को खंडित कर दिया गया। पहले विजयनगर में भगवान राम की 400 वर्ष पुरानी मूर्ति क्षत-विक्षत किया गया, फिर राजमुंद्री में भगवान सुब्रमण्येश्वर स्वामी और विजयवाड़ा में देवी सीता की प्रतिमाएं क्षतिग्रस्त मिली। अब खैबर पख्तूनख्वा और आंध्रप्रदेश की घटनाओं में अंतर केवल इतना था कि पाकिस्तान में यह सब घोषणा करके खुलेआम हुआ, तो यहां चोरी-छिपे या रात के अंधेरे में किया गया। यह अकाट्य है कि इन दोनों घटनाओं को मूर्त रूप में देने वाली मानसिकता एक ही है।

यदि 1947 के बाद पाकिस्तान का हिंदू, बौद्ध, जैन मंदिरों और प्रतिमाओं के विध्वंस का रिकॉर्ड है, तो खंडित भारत में “काफिर-कुफ्र” दर्शन से प्रेरित मजहबी हिंसा का लंबा इतिहास है। वर्ष 1989-91 के बीच जब कश्मीर जिहादी तूफान की चपेट में था, जिसमें दर्जनों हिंदुओं की हत्या और उनकी महिलाओं के साथ बलात्कार के बाद पांच लाख कश्मीर पंडित पलायन हेतु विवश हुए थे- तब उसी विषाक्त वातावरण में कई ऐतिहासिक मंदिरों को या तो बुरी तरह क्षतिग्रस्त कर दिया गया था या फिर पूर्ण रूप से खंडित। 2012 के सरकारी आंकड़ों के अनुसार, कश्मीर के 208 मंदिर जिहाद का शिकार हुए थे।

पाकिस्तान के खैबर में करक ज़िले स्थित जिस मंदिर को तोड़ा गया है, वह लगभग 100 वर्ष पुराना था, जिसमें हिंदू संत श्री परमहंस महाराज की समाधि थी। 1919 में उनके निधन के बाद से हिंदू यहां पूजा करने आते थे। 1947 से हिंदुओं को इस मंदिर में पूजा करने से रोक दिया गया। 1997 में तोड़फोड़ के बाद मौलवियों ने इसपर कब्जा कर लिया। वर्ष 2015 में पाकिस्तानी सर्वोच्च न्यायालय ने इस मंदिर को दोबारा बनाने का आदेश दिया और किंतु स्थानीय सरकार इसे लागू करवाने में असफल रही। पिछले 5 वर्षों से कट्टरपंथियों के विरोध-प्रदर्शनों के बीच जब मंदिर पुनर्निर्माण ने कुछ गति पकड़ी, तब यह सब मौलवियों के साथ उन्मादी जनता को सहन नहीं हुआ। उन्होंने मंदिर के खिलाफ जिहाद की घोषणा करके पलभर में मंदिर को ध्वस्त कर दिया।

अब पाकिस्तान में चंद बचे हुए हिंदू, जो इस्लामी निजाम में अपनी बहू-बेटियों की रक्षा करने में असमर्थ है, वह भला कैसे जिहादियों से अपने तीर्थस्थलों की रक्षा कर सकते है? सच तो यह है कि पाकिस्तान में खैबर प्रांतीय सरकार की मंदिर पुनर्निर्माण की घोषणा, उसके सर्वोच्च न्यायालय का संज्ञान, स्थानीय पुलिस द्वारा दर्जनों लोगों की गिरफ्तारी और दर्ज प्राथमिकियां विशुद्ध खानापूर्ति और आंखों में धूल झोंकने जैसा है। क्या यह सत्य नहीं कि पाकिस्तान में हिंदू, सिख आदि अल्पसंख्यक नागरिक दोयम दर्जे का जीवन जीने को विवश है? विभाजन के समय पाकिस्तान की कुल जनसंख्या में 15-16 प्रतिशत आबादी हिंदू, सिख और जैन आदि अनुयायियों की थी, वह 73 वर्ष बाद लगभग नगण्य हो गए है। सैंकड़ों मंदिरों-गुरुद्वारों को या तो तोड़ दिया गया है या फिर उन्हे मस्जिद/दरगाह में परिवर्तित कर दिया गया। इस हृदय-विदारक तस्वीर को मैंने स्वयं बतौर राज्यसभा सांसद अपने पाकिस्तान दौरे में देखा है।

इस पृष्ठभूमि में खंडित भारत में अल्पसंख्यकों- विशेषकर मुस्लिमों की स्थिति क्या है? स्वतंत्रता के समय भारत की कुल जनसंख्या में मुस्लिम आबादी 9-10 प्रतिशत थी, जो 2011 में बढ़कर 14.2 प्रतिशत और अब उनके 17-18 प्रतिशत होने की संभावना जताई जा रही है। विश्व की दूसरी सर्वाधिक मुस्लिम आबादी भारत में बसती है। देश में छोटी-बड़ी तीन लाख मस्जिदें है, जिसमें पैगंबर साहब के जीवनकाल में अरब के बाहर सन् 629 में बनी पहली मस्जिद (चेरामन जुमा मस्जिद) भी शामिल है। देश के सभी संवैधानिक पद मुस्लिम सहित सभी अल्पसंख्यकों के लिए उपलब्ध है। इसी कारण देश के राष्ट्रपति (जाकिर हुसैन), उप-राष्ट्रपति (मो.हामिद अंसारी), मुख्यमंत्री (सैयदा अनवरा तैमूर- असम, अब्दुल गफूर- बिहार, सी.एच.मो. कोया- केरल, अब्दुल रहमान अंतुले- महाराष्ट्र, एम.ओ.एच.फारुख- पुड्डुचेरी, बरकतुल्लाह खान- राजस्थान) राज्यपाल (आरिफ मो.खान, नजमा हेप्तुल्ला सहित) और कई मंत्री (केंद्रीय सहित) पदों पर मुस्लिम सुशोभित हुए है। इसके अतिरिक्त, पूर्व प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह ने अल्पसंख्यक सिख के रूप में 10 वर्ष देश का नेतृत्व किया है, जबकि उसी कालखंड में “राष्ट्रीय सलाहकार परिषद” रूपी असंवैधानिक संस्था का गठन करके विदेशी मूल की अल्पसंख्यक ईसाई सोनिया गांधी समांतर सत्ता का केंद्र चला रही थीं।

खंडित भारत में एक वर्ग ऐसा है, जो हीन-भावना के शिकार है। वास्तव में, ऐसे लोगों को भारत पर विश्वास ही नहीं है। जब 2016 और 2019 में देश ने पाकिस्तान के आतंकी ठिकानों पर सर्जिकल स्ट्राइक करके कई आतंकियों को मौत के घाट उतारा, तो उसी जमात ने भारतीय सेना पर संदेह जताकर साक्ष्य मांग लिया। जनस्वीकार्यता नहीं मिलने पर ईवीएम को कलंकित करके चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर उंगली उठा दी। अयोध्या रामजन्मभूमि मामले में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय पर प्रश्न उठाकर न्यायापालिका को ही कटघरे में खड़ा कर दिया। जब जांच एजेंसियां देशविरोधी कृत्य लिप्त लोगों पर कार्रवाई कर रही है, तो यह लोग अपराधियों के साथ खड़े नजर आते है और जो मीडिया समूह इसका खुलासा करती है, उसे बिकाऊ बता दिया जाता है। अभी वैश्विक महामारी कोविड-19 के खिलाफ लड़ाई में भारत ने कोरोनावायरस-रोधी वैक्सीन बनाने में ऐतिहासिक सफलता अर्जित की है, तो वही लोग इसका विरोध और उपहास कर रहे है। सच में इस वर्ग को न तो भारतीय होने पर गर्व है और न ही देश के इतिहास व क्षमता पर। यह लोग अपनी पहचान से घृणा करते है।

वही कुनबे अब यह कहने में संकोच नहीं करता कि पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की स्थिति भारत से कहीं अधिक अच्छी है और वहां का सत्ता-अधिष्ठान उनके अधिकारों की रक्षा हेतु यहां से अधिक कटिबद्ध है। पाकिस्तान में मंदिर जमींदोज के मामले में स्वयंभू उदारवादी, सेकुलरिस्ट और वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण का विचार- इसका जीवंत प्रमाण है। अपने ट्वीट से उन्होंने संदेश देने का प्रयास किया है कि पाकिस्तान में जब मंदिर पर हमला हुआ, तो स्थानीय पुलिस ने तुरंत कार्रवाई करते हुए 26 लोगों को गिरफ्तार कर लिया। मीडिया और उसके सर्वोच्च न्यायालय ने इसका संज्ञान लिया। किंतु जब मध्यप्रदेश की मस्जिदों में कथित रूप से तोड़फोड़ की गई, तब मुसलमानों पर ही राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (रा.सु.का.) लगा दिया गया। मीडिया और सर्वोच्च न्यायालय चुप रहा। सच तो यह है कि न तो मध्यप्रदेश की किसी मस्जिद को तोड़ा गया है और न ही मुसलमानों के खिलाफ मस्जिदों पर हुए हमले के लिए रा.सु.का. लगा है। क्या यह सत्य नहीं कि राम मंदिर पुनर्निर्माण हेतु चंदा एकत्र करने के लिए सनातनी संगठनों द्वारा मध्यप्रदेश में निकाले जा रहे जुलूसों पर बीते दिनों मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में पथराव हुआ है?

जिहादियों और वामपंथियों का दर्शन- उनके भारतीय बहुलतावाद, लोकतंत्र और पंथनिरपेक्षता से घृणा को स्वाभाविक बनाता है। परंतु प्रशांत भूषण और उनके जैसे बहुतेरे मानसबंधुओं में बौद्धिक पंगुता का कारण क्या है? वास्तव में, इन लोगों के चिंतन को अंग्रेजी शब्दावली- Self-Flagellation (आत्म-समालोचना) से परिभाषित किया जा सकता है। सरल भाषा में कहें, तो इन्हें अपनी जन्मभूमि और स्वयं की मूल पहचान से घृणा होती है। इस रूग्ण मानसिकता से ग्रस्त कई हिंदुओं के लिए कश्मीर में सुरक्षा कारणों से इंटरनेट का बंद होना- मानवाधिकारों के हनन का पर्याय तो बन जाता है, किंतु उसी भूखंड पर वहां के मूल निवासियों के सांस्कृतिक नरसंहार और विस्थापन पर मुंह बंद रहता है। शायद इसका उत्तर उनकी अपनी भारतीय पहचान से घृणा और उसके प्रति निंदाभाव में छिपा है।

साभार- https://www.nayaindia.com/ से

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