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बेरोजगारी के रहते आज़ादी दिवास्वप्न

पन्द्रह अगस्त याने भारत की आजादी का पर्व, भारत में लोकतंत्र की स्थापना का पर्व, सैकड़ों वर्षों की राजनायिक और आर्थिक गुलामी की जंजीरे तोड़कर पराधीनता से स्वतंत्र होने का पर्व, हमारा स्वाधीनता दिवस। 1947 में इसी दिन भारत लंबे संघर्ष के बाद स्वतंत्र हुआ और स्वाधीन होने की ओर अग्रसर हुआ। लेकिन वर्तमान के हालात देखते हुए लगता है कि स्वतंत्रता बदल सी गई हैं और हम स्वाधीन होने की बजाए विदेशी व्यवस्था के आधीन होते जा रहे हैं। तकनीकी श्रेत्र में विदेशी सहयोग से निःसंदेह विकास की नई गाथाएँ रची गई और विश्व में हमारे भारत ने कई कीर्तिमान स्थापित किए हैं। ग्रामीण हो या शहरी, महिला हो या पुरुष सभी का शिक्षा का स्तर बढ़ा हैं। आज हर कोई शिक्षा के श्रेत्र में आगे हैं, लेकिन जो पीढ़ी शिक्षित होकर आ रही हैं उसके सामने रोजगार का अभाव सबसे बड़ी समस्या के रूप में सामने आ रहा हैं। भारत में रोजगार के अवसर नहीं दिखाई दे रहे हैं। सरकारी नौकरी और अच्छी तनख्वा के चक्कर में आज युवा भटक रहा हैं। और सरकारी कार्यालयों में कर्मचारी नहीं होने के कारण कितने काम रुके पड़े हैं। सरकारी कार्यालयों में काम की गति पर जब प्रश्न उठाया जाता है तो एक ही जवाब आता है स्टॉफ नहीं होने से काम की गति मंद हैं। कार्यालयों में कर्मचारी का आभाव और जो युवा काम चाहता है उसे काम नहीं है। जो कि विचारणीय है।

देश में हर तरह का विकास हुआ करोड़ो लोगों को काम भी मिला लेकिन रोजगार के मामले में 72 साल में भी स्थिती जस की तस बनी हुई हैं। स्थिती ठीक वैसी है कि एक अनार सौ बीमार के समान है। सरकारी नौकरी को दरकिनार भी करे तो निजी कंपनियों और विदेशी कंपनियों की भी बड़ी लम्बी लिस्ट हैं। माल कमाने को ढ़ेरों विदेशी कंपनियाँ भारत आ गई है,बड़े उद्योग खुल रहे है। लेकिन बेरोजगारी कम हो ही नहीं रहे हैं। कारण जितनी भी विदेशी कंपनियाँ भारत आयी वे भारत को रोजगार का सुनहरा सपना तो दिखा रही हैं लेकिन उनका उद्देश्य तगड़ा मुनाफा बटोर कर बिना टेक्स दिए अपने देश ले जाना हैं। भारत में वे सिर्फ पैसा कमाने आए हैं। भारतीय अर्थ व्यवस्था में उनका कर के रूप में योगदान इतना अल्प हैं कि उनको उपलब्ध करवाए गये संसाधन, जमीन और पानी भी उससे ज्यादा के हैं। याने भारत की अर्थव्यवस्था में एक रुपया दे कर हजारों का लाभ उनके हिस्से में जा रहा हैं। ऐसी कईं विदेशी कंपनियाँ हैं जो दशकों से भारत को आर्थिक गुलामी की ओर ले जा रही हैं। ये कंपनियाँ भारत को रोजगार देने के नाम पर छलावे के अलावा कुछ नहीं कर रहीं हैं। भारत में विस्तार कर रही ज्यादातर विदेशी कंपनियों का कहना है कि भारत में विस्तार की मुख्य वजह यहाँ के तेजी से बढ़ते बाजार का लाभ उठाना है न कि यहॉ रोजगार देना।

2024 तक पीएम मोदी ने पाँच ट्रिलियन (पचास खरब) डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने का जो लक्ष्य रखा है उसे वर्तमान हालातों को देखते हुए हासिल करना काफ़ी मुश्किल लगता है। भारत की आर्थिक वृद्धि दर की समस्या यह है कि उसके साथ नौकरियां नहीं बढ़ रही हैं। इसीलिए भारतीय अर्थव्यवस्था की ग्रोथ को जॉबलेस ग्रोथ कहा जाता है। प्रधानमंत्री मोदी चाहते हैं कि भारत विश्व मंच पर एक बड़े खिलाड़ी के तौर पर उभरे लेकिन इसके लिए केवल आर्थिक वृद्धि दर ही काफ़ी नहीं है बल्कि इसके लिए ग़रीबी कम करने के साथ रोज़गार के मौक़े भी बढ़ाने होंगे। भारत में बेरोज़गारी का अंदाज़ा इसी तथ्य से भी लगाया जा सकता है कि भारतीय रेलवे ने 63 हज़ार नौकरियां निकालीं तो एक करोड़ 90 लाख लोगों ने आवेदन किए।एक पद सौ उम्मीदवार जो की ऊँट के मुँह में जीरे जैसे हालात हैं रोजगार के मामले में हमारे यहॉ पर।

इस समय भारत दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शुमार है लेकिन ग़रीबी और बेरोजगारी की चुनौती अब भी बरक़रार है। देश जब तक विदेशी निवेश पर निर्भर है तब तक आर्थिक रूप से स्वतंत्र नहीं माना जा सकता हैं। मेहनत भारतीय कर रहें हैं और लाभ विदेशी कंपनियों की तिजोरियों में जा रहा हैं, आने वाली पीढ़ी फिर रोजगार के लिए भटकती फिरेगी। देश का पैसा देश में रहेगा तो ही सरकार आर्थिक आजादी आ पाएगी तथा देश वासियों को रोजगार और सम्मान जनक स्थिती का जीवन सुविधा उपलब्ध हो सकेगी। जब तक देश का युवा बेरोजगार है आर्थिक आजादी केवल दिवास्वप्न ही बनी रहेगी।

– संदीप सृजन
संपादक-शाश्वत सृजन
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