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प्रिय तुम और मैं

तुम्हें देखा, तुम्हें चाहा
तुम्हें पाया मैंने …
बना सिंधूर तुम्हें अपनी
माँग में सजाया मैंने …

मेरे गहनों में नगों से
जड़े हो तुम…
तुम्हें गजरे में खुशबू सा
बसाया मैंने …

खामोश हसरतें
जब भी मचलीं
अँगड़ाईयाँ लेकर
तुम्हें सदा अपने करीब
पाया मैंने …

जब जब गिरी ठोकरें खाकर
तुम्हारी सबल बाँहों का
सहारा पाया मैंने …
बोझिल मन जब
दुःख के साए में था खड़ा
तुम्हारे काँधे पर सकून
पाया मैंने …

कायनात में प्यार की
सीमा को जब नापा
हर सीमा लाँघता
तुम्हारा प्यार पाया मैंने
हर नई राह पर लाने का
हौसला तुम हो…
संग तुम्हारे कठिन राहों पर
पाँव बढ़ाया मैंने…

पत्थरों की तपिश से
जब भी पाँव जले मेरे
ठंडी हरी घास बिछाई तुमने
शबनम की बूंदों में भीगा तन
मन में शमा जलाई मैंने
तुम संबल बन चलते रहे
मेरा हर ख्व़ाब साकार करने को
प्यार की लौ जलती रहे सदा
इसी विश्वास का दीपक जलाया मैंने

क़दम मिला कर चलें सदा ही
उम्र की हर एक सीढ़ी पर
ठिठक कर रुक न जाएँ कभी हम

दुविधाओं की देहरी पर…
बने रहें हम यूँ ही साथी
हर एक जन्म और जीवन में
ज्योति प्यार की सदा जलाएं
एक दूजे के अंतर्मन मे…

( सविता अग्रवाल ‘सवि’, साहित्यकार हैं और कैनाडा में रहती हैं )
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