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दीपावली पर आत्मा की ज्योति जगाएं

ज्योति पर्व दीपावली संकल्प का पर्व है और सबसे बड़ा संकल्प होना चाहिए मनुष्य स्वयं को बदलने के लिये तत्पर हो। सरल नहीं है मनुष्य को बदलना। बहुत कठिन है नैतिक मूल्यों का विकास। बहुत-बहुत कठिन है आध्यात्मिक चेतना का रूपांतरण। बहुत कठिन है अहिंसा की स्थापना। बहुत कठिन है अंधकार से प्रकाश की ओर प्रस्थान करना। प्रश्न हो सकता है, अंधकार अच्छा है या बुरा? सामान्यतः अंधकार को अच्छा नहीं माना जाता परंतु कभी-कभी अंधकार भी अच्छा लगता है। प्रकाश को प्रायः अच्छा माना जाता है किंतु कभी-कभी प्रकाश भी मन को सुहावना नहीं लगता। जब रात को सोने का समय हो, उस समय ट्यूबलाइट या तेज पावर का बल्ब जला दिया जाए तो वह प्रकाश अच्छा नहीं लगता। यदि किसी को ध्यान की गहराई में पहुँचना है, कोई व्यक्ति तनावग्रस्त है और वह शांति पाना चाहता है, किसी को कुछ गंभीरता से चिंतन करना है तब भी अधिक प्रकाश अच्छा नहीं लगता। हाँ, किसी भयंकर अटवी को पार करना हो, अध्ययन करना हो या दैनन्दिन कार्य संपादित करने हो तो प्रकाश की उपयोगिता होती है। उस समय अंधेरा अच्छा नहीं लगता। मूल्यांकन दोनों का होना चाहिए, अंधकार का भी और प्रकाश का भी। दीपावली अंधकार एवं प्रकाश दोनों के मूल्यांकन का अवसर है।

हमारे भीतरी जगत में भी दोनों का अस्तित्व है अंधकार और प्रकाश। राग, द्वेष, घृणा, क्रोध, भय व अज्ञान जहाँ अंधकार के प्रतीक हैं वहीं क्षमा, मैत्री, करुणा, वीतरागता और ज्ञान प्रकाश के प्रतीक हैं। भीतरी अंधकार कभी भी उपादेय नहीं हो सकता। किसी के लिए भी हितकारी नहीं हो सकता और न ही सुफल होता है। उसका फल हमेशा कटु ही होगा। प्रार्थना की गई-‘तमसो मा ज्योतिर्गमय, असतो मा सद्गमय, मृत्योर्मा अमृतं गमय।’ अंधकार से मुझे प्रकाश की ओर ले जाओ, असत् से मुझे सत् की ओर ले जाओ, मृत्यु से मुझे अमरत्व की ओर ले जाओ। अज्ञान रूपी अंधकार से ज्ञान रूपी प्रकाश की यात्रा में यात्रायित होने वाला व्यक्ति ही अमरत्व को प्राप्त कर सकता है। दीपावली का अवसर हमें मृत्यु से अमरत्व की ओर ले जाने का अवसर है।
दीपावली कार्तिकी अमावस्या को मनायी जाती है, जो भगवान महावीर का परिनिर्वाण दिवस है। श्रमण महावीर लोकोत्तम पुरुष हंै। आमतौर पर अमावस्या को अच्छा नहीं माना जाता है। किन्तु आज की अमावस्या तो उत्सव के रूप में प्रतिष्ठित है। तेजस्वियों का योग मिलने से अमावस्या भी उत्सव बन गई।’ आचार्य तुलसी ने ‘श्रीरामयशोरसायन’ में कहा- ‘दीपावली श्रीरामचंद्रजी से भी जुड़ी हुई है। श्रीराम शक्तिशाली व्यक्तित्व थे। उनके जैसी वीतरागता हमारे भीतर भी प्रादुर्भूत हो।

संत के लिए कहा जाता है- ‘सदा दीवाली संत के आठ प्रहर आनंद।’ जिस संत के पास समता की साधना और प्रज्ञा का आलोक है, उसके तो सदा ही दीवाली है। आचार्यों के लिए कहा जाता है- ‘दीवसमा आयरिया।’ आचार्य दीप के समान होते हैं। वे स्वयं प्रदीप्त होकर कितनों को दीपित करते हैं। हमें आचार्य भिक्षु जैसे गुरु मिले और निकट अतीत में आचार्य तुलसी और आचार्य महाप्रज्ञजी जैसे धर्माचार्य गुरु के रूप में प्राप्त हुए।

दीपावली का अवसर मनुष्य को बदलने के संकल्प का अवसर भी है। हमें यह मानकर चलना होगा -इस दुनिया में अच्छाई और बुराई, चेतना का कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष-ये दोनों पंक्तियां समय के पृष्ठ पर अंकित रहने वाली हैं। हजारों वर्ष पहले भी मनुष्य ने प्रयत्न किया-सब लोग अच्छे हों, कोई बुरा न हो, सब सदाचार में निष्णात रहें, कोई अपराधी न हो। आज भी वही प्रयत्न चालू है और ऐसा प्रयत्न निरन्तर होना चाहिए। यदि बुराई मिट नहीं सकती तो फिर उसे मिटाने का प्रयत्न क्यों? ‘अज्ञानं खलु कष्टं’ अज्ञान को बहुत बड़ा कष्ट माना गया। जितने भी दुःख हैं उन सबका कारण अज्ञान को बताया गया। जब तक व्यक्ति में ज्ञान का विकास नहीं होता तब तक वह नश्वर को अनश्वर, यथार्थ को अयथार्थ और पराए को अपना मान लेता है।

 

 

एक बार किसी छोटे से गाँव में एक व्यक्ति बीमार हो गया। गाँव में चिकित्सा की समुचित सुविधा नहीं थी। वह व्यक्ति डाॅक्टरी जाँच के लिए पास के किसी कस्बे में पहुँचा। डाॅक्टर ने कई दिनों तक इंजेक्शन लेने का परामर्श दिया। बीमार व्यक्ति ने सोचा-दवा पेट में ही तो पहुँचानी है। इंजेक्शन के माध्यम से पहुँचाऊँ या मुँह से, क्या फर्क पड़ता है? उसने तत्काल दवा को पात्र में निकाला और पी गया। परिणाम यह आया कि कुछ समय बाद उस आदमी की मृत्यु हो गई। जब यह व्यावहारिक अज्ञान भी जीवन को नष्ट करने वाला बन सकता है तो आत्मिक अज्ञान तो न जाने कितने जन्मों तक हमें भव भ्रमण कराता रहेगा। जब तक व्यक्ति को अज्ञानता की अनुभूति नहीं होगी, हेय और उपादेय का विवेक नहीं होगा, शरीर की नश्वरता और आत्मा की अमरता को नहीं समझेगा तब तक व्यक्ति ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकता।

अंधकार न कभी मिटा और आज भी नहीं मिट रहा है। सूर्य की रश्मियां अंधकार को प्रकाश में बदल देती हैं। यही काम दीया करता है और बिजली भी करती है। यदि अंधकार से मुक्ति पाने का प्रयत्न न चलता तो उसका प्रभुत्व एकाकार हो जाता। मनुष्य की क्या दशा होती? प्राणी जगत् के सामने जीने का कोई विकल्प शेष नहीं रहता। प्रकाश का अस्तित्व जीवन-यात्रा को बनाए हुए है और उसने विकास की गति को तेज किया है। यदि मनुष्य को बदलने का प्रयत्न नहीं होता तो हिंसा का एकछत्र साम्राज्य हो जाता। इस अवस्था में न समाज की कल्पना की जाती और न विकास के द्वार को खटखटाया जाता।

हालाँकि दीपावली एक लौकिक पर्व है। फिर भी यह केवल बाहरी अंधकार को ही नहीं, बल्कि भीतरी अंधकार एवं अज्ञानता को मिटाने का पर्व भी बने। हम भीतर में धर्म का दीप जलाकर मोह और मूच्र्छा के अंधकार को दूर कर सकते हैं। दीपावली के मौके पर सभी आमतौर से अपने घरों की साफ-सफाई, साज-सज्जा और उसे संवारने-निखारने का प्रयास करते हैं। उसी प्रकार अगर भीतर चेतना के आँगन पर जमे कर्म के कचरे को बुहारकर साफ किया जाए, उसे संयम से सजाने-संवारने का प्रयास किया जाए और उसमें आत्मा रूपी दीपक की अखंड ज्योति को प्रज्वलित कर दिया जाए तो मनुष्य शाश्वत सुख, शांति एवं आनंद को प्राप्त हो सकता है।

दीपावली का एक संकल्प हो ही हमारी अज्ञानता मिटे। क्योंकि हमारे भीतर अज्ञान का तमस छाया हुआ है। वह ज्ञान के प्रकाश से ही मिट सकता है। ज्ञान दुनिया का सबसे बड़ा प्रकाश दीप है। जब ज्ञान का दीप जलता है तब भीतर और बाहर दोनों आलोकित हो जाते हैं। अंधकार का साम्राज्य स्वतः समाप्त हो जाता है। ज्ञान के प्रकाश की आवश्यकता केवल भीतर के अंधकार मोह-मूच्र्छा को मिटाने के लिए ही नहीं, अपितु लोभ और आसक्ति के परिणामस्वरूप खड़ी हुई पर्यावरण प्रदूषण और अनैतिकता जैसी बाहरी समस्याओं को सुलझाने के लिए भी जरूरी है।
एक बार आकाशवाणी हुई-‘सुकरात से बड़ा कोई ज्ञानी नहीं है।’ जनता सुकरात को धन्यवाद देने उमड़ पड़ी। सुकरात ने कहा-किसी ने गलत भविष्यवाणी कर दी, मैं ज्ञानी नहीं हूँ। जनता ने सुकरात से कहा-हमारी देवी झूठ नहीं बोलती। आप इस घोषणा को स्वीकार करें। सुकरात बोला-मैं अपने अज्ञान को जानता हूँ फिर सबसे बड़ा ज्ञानी कैसे हो सकता हूँ? जनता ने देवी के समक्ष सुकरात का कथन प्रस्तुत किया। देवी बोली-‘दुनिया में सबसे बड़ा ज्ञानी वह होता है जो अपने अज्ञान को जानता है।’ सचमुच, अज्ञान को जानने वाला ही ज्ञान की दिशा में प्रस्थान कर सकता है। व्यावहारिक जीवन में ज्ञान का जितना महत्त्व होता है, आध्यात्मिक जीवन में उससे कहीं अधिक महत्त्व होता है। कहा गया-‘नाणं पयासयरं’ ज्ञान प्रकाश करता है। जीवन के प्रत्येक पहलु को आलोकित करने के लिए ज्ञान ही सर्वोत्कृष्ट है। ज्ञान, चेतना का अभिन्न मित्र है। जहाँ-जहाँ चेतना का प्रकाश है वहाँ-वहाँ ज्ञान की सत्ता को अस्वीकार नहीं किया जा सकता। हाँ, ज्ञान में तरतमता हो सकती है। किसी के पास बहुत कम ज्ञान होता है तो किसी के पास केवलज्ञान भी हो सकता है। ज्ञान, जीव की समस्त अवस्थाओं सिद्ध-संसारी, सुप्त-जागृत, विकसित-अविकसित आदि सभी में विद्यमान रहता है।

दीपावली का अवसर हमें अज्ञानता से ज्ञान की ले जाने का भी अवसर है। दीपावली से जुडे़ अनेक महापुरुष हैं, जिनमें श्रीराम, भगवान महावीर, दयानन्द सरस्वती हैं जिन्होंने ज्ञान के बल पर अनेक महत्त्वपूर्ण कार्य किए हैं। मानव एवं महामानव व्यक्ति में यही अंतर होता है-एक बाहरी आकर्षणों में खोया रहता है, दूसरा आंतरिक यथार्थ में। एक भोग-विलास में प्रवृत्त रहता है, दूसरा ज्ञान-आराधना में। एक पदार्थों पर आश्रित रहता है, दूसरा आत्मा पर। आत्म-दर्शन ही सबसे बड़ी गहराई है और आत्मदर्शन ही सबसे बड़ी ऊँचाई है। अपेक्षा है व्यक्ति अपनी शक्ति को पहचानें और उसका सदुपयोग करें। ऐसा नहीं हो पाता है, इसके कारणों को खोजना होगा। किसी को जिम्मेवार ठहराना और किसी को उस जिम्मेवारी से मुक्त कर देना हमारी सामान्य प्रकृति है।

विश्लेषण करने पर निष्कर्ष दूसरा ही निकलता है। कोई भी नेता किसी मुद्दे पर जनता को इकट्ठा कर सकता है। महात्मा गांधी के साथ भी वैसा ही हुआ। चारों ओर भीड़ इकट्ठी हो गई। स्वतंत्रता के आंदोलन का आकर्षण बढ़ता गया और विजयश्री ने गांधी का वरण कर लिया। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् उनका जादुई प्रभाव कम होने लगा। उनके सहकर्मियों का ध्यान सत्ता की कुर्सी पर टिक गया। गांधी ने नए समाज की रचना के लिए अनेक विचार दिए पर सत्ता के सामने उनका मूल्य गौण हो गया। माक्र्स और गाँधी ने नए समाज की रचना का शंख फूँका पर उसके लिए वे जनता की चेतना को जागृत नहीं कर सके, स्वल्प अंशों में जागृत चेतना को विस्तार और स्थायित्व नहीं दे सके। मेरा मानना है कि नए समाज की रचना की चेतना को जागृत किए बिना नए समाज की रचना कभी संभव नहीं होगी। कुछ समय के लिए संभव हो भी जाए तो वह चिरकाल तक टिक नहीं पाएगी। अपेक्षा है चेतना को जागृत करने की प्रक्रिया चले और यही इस वर्ष दीपावली का मुख्य संकल्प होना चाहिए। प्रस्तुतिः ललित गर्ग

प्रेषकः
(ललित गर्ग)
बी-380, प्रथम तल, निर्माण विहार, दिल्ली-110092
9811051133



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