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सरकारी दस्तावेजों से मिटा दिया, मगर दिलों में ज़िंदा हैं बंधु सिंह

देश, 69 वें गणतंत्र दिवस समारोह की तैयारियों में जुटा है। यह मौका राष्ट्रहित के लिए अपना सर्वस्व न्यौच्छावर कर देने वाले क्रांतिकारियों को याद करने का है। लेकिन ऐसे वीर सेनानियों की संख्या भी कम नहीं जिनके योगदान को लम्बे अर्से तक भुलाए रखा गया। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान पूर्वांचल में क्रांति के अग्रदूत रहे बंधू सिंह ऐसे ही वीर सेनानियों में से एक हैं। जिनकी विरासत को सम्भालने की शुरुआत ही डेढ़ सदी बाद हुई।

इतने वर्षों तक उनके इतिहास को समेटने की कोशिशें न के बराबर हुईं। आधुनिक इतिहासकार इसके पीछे भी ब्रितानी हुकूमत की उन कुत्सित चालों को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं जिनके तहत जानबूझकर बंधू सिंह के राष्ट्रप्रेम को सरकारी दस्तावेजों में दर्ज नहीं होने दिया गया। दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग के वरिष्ठ शिक्षक प्रो.चंद्रभूषण अंकुर के मुताबिक, ‘इतिहासकारों को दस्तावेजों में बहुत कुछ नहीं मिला। अंग्रेजों ने उनके कारनामों को सम्भवत: गुप्त रिपोर्टों में ही दर्ज किया और उसे भी नष्ट करते रहे। यदि आज कोई बंधू सिंह के इतिहास पर शोध करे तो उसे लंदन स्थित ‘इंडियन ऑफिस लाइब्रेरी’ को खंगालना होगा।’

भारतीय इतिहास कांग्रेस के कार्यकारिणी सदस्य और गोरखपुर विश्वविद्यालय इतिहास विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो.एस.एन.आर.रिजवी ने कहा कि बंधु सिंह बहुत बड़े स्वतंत्रता सेनानी थे। दुर्भाग्य से उनका योगदान दर्ज नहीं किया जा सका। इस पर काम करने की आवश्यकता है।

बंधु सिंह की ये है कहानी –
1857 में ब्रितानी हुकूमत के खिलाफ भड़के जनविद्रोह की अगुवाई पूर्वांचल में डुमरी रियासत के बाबू बंधू सिंह ने की। उस समय वह 24 वर्ष के थे। उस समय यह इलाका अकाल की गिरफ्त में था लेकिन अंग्रेज अपने ऐशो-आराम में व्यस्त था। बंधू सिंह ने अपने साथियों के साथ बिहार से आ रहा सरकारी खजाना लूटकर अकाल पीड़ितों में बांट दिया। उनके एक हमले में उस समय गोरखपुर के कलेक्टर मारे गए। बंधू सिंह ने घाघरा और गंडक नदियों पर कब्जा कर अंग्रेजों की सप्लाई लाइन तोड़ दी। तब अंग्रेजों ने नेपाल के राजा से मदद मांगी। नेपाल के राजा ने अपने प्रधान सेनापति पहलवान सिंह को फौज के साथ भेजा। पहलवान सिंह लड़ाई में मारा गया लेकिन बंधू सिंह को जंगलों में शरण लेनी पड़ी। अंग्रेजों ने डुमरी रियासत पर तीन तरफ से हमला किया। मोतीराम के पूरब दुबियारी पुल के पास बंधू सिंह के भाइयों करिया सिंह, हम्मन सिंह, तेजई सिंह और फतेह सिंह ने अंग्रेजों से कड़ा मुकाबला किया लेकिन अंत में वीर गति को प्राप्त हुए। अंग्रेजों ने बंधू सिंह की हवेली को आग के हवाले कर दिया। उनकी रियासत को तोहफे के तौर पर मुखबिरों में बांट दिया।

तरकुलहा में लगता है मेला
कहते हैं कि बंधु सिंह जंगलों में रहते और अंग्रेज सिपाहियों को मौत के घाट उतार देते थे। तरकुलहा देवी मंदिर के पास तरकुल के पेड़ के नीचे मिट्टी की पिंडी बनाकर देवी की उपासना करते थे। यहीं पर मां के चरणों में अंग्रेजों के सिर चढ़ाते और अंग्रेजों से लड़ने की शक्ति मांगते थे। इससे घबड़ाकर अंग्रेजों ने अपने मुखबिरों के तंत्र को सक्रिय कर दिया। अंतत: बंधू सिंह पकड़े गए। 12 अगस्त 1858 को अलीनगर चौराहे पर स्थित बरगद के पेड़ पर उन्हें सरेआम फांसी दी गई। जनश्रुतियों के मुताबिक बंधू सिंह के गले का फंदा छह बार टूटा। सातवीं बार जब फंदा उनके गले में डाला गया तो उन्होंने अपनी आराध्य तरकुलहा देवी से प्रार्थना की कि वह उन्हें मुक्त करें। इसके बाद अंग्रेज उन्हें फांसी देने में सफल रहे।

बिरहा में गाई गई है बंधु सिंह की वीर गाथा
बंधु सिंह की वीरगाथा जन-जन में प्रसिद्ध है। उनकी गाथा को बिरहा और नाटक-नौटंकियों में ढालकर आज भी गांवों में पूरे उत्साह से गाया जाता है। उनकी कहानी जुल्म और दासता के खिलाफ विद्रोह की भावना जगाती और मन को राष्ट्रभक्ति से भर देती है।

गांववालों को फख़्र है-
बंधू सिंह का ताल्लुक जिस डुमरी रियासत से है वहां गांववालों को उनके नाम पर फख़्र है। डुमरी निवासी रामनक्षत्र पासवान ने कहा कि अंग्रेज उनके नाम से थर-थर कांपते थे। गामा गौड़ ने कहा कि कभी यहां उनकी अपनी अदालत लगती थी। उनकी हवेली के आंगन के बीच बना कुआं आज भी मौजूद है।

वंशज ने सम्‍भाल कर रखीं निशानियां
बंधु सिंह के वंशज विनय कुमार सिंह बिन्नू की कोशिशों से बंधु सिंह स्मारक समिति का गठन हुआ। उत्तर प्रदेश सरकार ने तरकुलहा देवी स्थान को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने का निर्णय लिया। वहां शहीद स्मारक, विश्रामालय, धर्मशाला, तालाब, मंदिर आदि के सौन्दर्यीकरण के साथ मंदिर के मुख्य मार्ग का नामकरण बंधू सिंह मार्ग के रूप में किया। शहर के हाल्सीगंज और मोहद्दीपुर में नगर निगम ने बंधू सिंह सिंह पार्क का निर्माण कराया। 150 वें बलिदान दिवस के मौके पर 12 अगस्त 2008 को बतौर सांसद योगी आदित्यनाथ (वर्तमान मुख्यमंत्री) ने अलीनगर चौराहे पर बंधू सिंह की प्रतिमा का अनावरण किया। 18 नवम्बर 2016 को बिन्नू सिंह के निधन के बाद उनके भाई अजय कुमार सिंह टप्पू इस कवायद से जुड़े हैं। इन दिनों वह सरदारनगर के करमहां गांव में बंधू सिंह के नाम पर डिग्री कालेज को मूर्त रूप दिए जाने में जुटे हैं। इस साल शहादत दिवस पर इस कालेज का शुभारंभ कराने की तैयारी है।

साभार- https://www.livehindustan.com से



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