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बौनी कुंठा से उबर आसमान के तारे तोड़ने को बेताब ‘ज़ीरो’

गणित में शून्य का महत्त्व बाकी अंकों पर भारी है. आगे लग जाए तो मान घट जाए और पीछे लग जाए तो संख्या का मान बढ़ता चला जाए. गुरुत्वाकर्षण के शून्य होते ही भारहीनता में मनुष्य सीधा खड़ा रहना तो दूर उल्टा पुल्टा होने लगता है. यही शून्यकाल संसद और विधानसभा में विपक्षी भूचाल ला सकता है इसलिए सरकार ज़ीरो अवर में सबसे ज्यादा चौकस रहती है. गोया कि शामत आने के लिये शून्य से बड़ा कोई रिजल्ट नहीं. बहरहाल इस शुक्रवार प्रदर्शित शाहरुख़ खान की आनंद एल राय निर्देशित ‘ज़ीरो’ बॉक्स ऑफिस पर भी ज़ीरो साबित हुई है.

क्रिसमस के उल्लास पर्व पर वर्षांत की छुट्टियों का लाभ उठाने की गरज से चार हज़ार तीन सौ से अधिक स्क्रीन्स पर मेगा रिलीज़ और ऊँची टिकट दरों के बावजूद किंग खान की यह फिल्म पहले दिन बीस करोड़ से अधिक न कमा सकी. लगता है ठग्स ऑफ़ हिन्दोस्तान वाली गलती ‘ज़ीरो’ के सृजनात्मक पक्ष में भी दोहराई गई है. महंगे वीएफएक्स के चक्कर में फिल्म का कंटेंट और ट्रीटमेंट दोनों के साथ ज़ीरो लग गए. विश्वास नहीं होता कि यह ‘तनु वेड्स मनु’ जैसी रोचक श्रंखला के फिल्मकार की कृति है. यदि कहानी और पटकथा दुरुस्त होती तो ‘ज़ीरो’ बौने कद में सिमटे बड़े इंसान की खूबियों और मानवीय संवेदनाओं को सलीके से उभारती.

फिल्म की कहानी दिल्ली के पास मेरठ में रहने वाले 38 वर्षीय नाटे कद के बउआसिंह (शाहरुख़ खान) के इर्द गिर्द घुमती है. अपने बौने होने के अहसास की कुंठा वह पिता अशोक सिंह (तिग्मांशु धूलिया) के साथ हिकारत व आक्रोशभरी हरकतों से निकालता है. जिगरी दोस्त गुड्डू (जीशान अयूब) की संगत में वह फिल्म एक्ट्रेस बबीता कुमारी (कैटरीना कैफ) का जबरदस्त फैन बन जाता है.

मैरेज ब्यूरो संचालक पांडे (ब्रिजेन्द्र काला) की सहायता से वह शादी के लिये लड़की ढूंढते हुए आफिया युसुफजई भिंडर (अनुष्का शर्मा) की तस्वीर पर फ़िदा हो जाता है. अमेरिका में नासा जैसी किसी संस्था में कार्यरत अंतरिक्ष विज्ञानी आफिया को व्हील चेयर पर बैठे देखकर वह शुरू में हताश निराश हो जाता है. बाद की मुलाकातें उन्हें निकट ले आती हैं और आफिया स्वयं विवाह प्रस्ताव लेकर बउआसिंह के घर पहुँच जाती है.

शादी की तैयारियों और बारात लगने के बाद जब बउआ को एक मेगा डांस इवेंट में भाग लेकर बबिता कुमारी समेत अन्य फ़िल्मी सितारों से मिलने का अवसर सामने दिखाई देता है तो वह विवाह स्थल से सेहरा फेंककर गायब हो जाता है. आगे की कहानी बउआसिंह के जीवन में बबिता कुमारी से मिली रुसवाई, तिरस्कार और अपमान की पराकाष्ठा तथा अमेरिका जाकर आफिया से मिलकर प्रायश्चित करने की पहल पर केन्द्रित है.

शाहरुख़ ने बउआसिंह के किरदार में समाने के लिये सराहनीय मेहनत की है. अनुष्का ने सुई धागा के बाद पुनः अपनी सामर्थ्य दिखाई है. ग्लैमरस कैटरीना ने भी कुछ दृश्यों में कमाल का अभिनय किया है. तिग्मांशु धूलिया, जीशान अयूब, अभय देओल, आर माधवन सहित अन्य कलाकार सहायक भूमिकाओं में ठीकठाक हैं.

मेहमान कलाकारों में जूही चावला, करिश्मा कपूर, काजोल, दीपिका पादुकोण, अलिया भट्ट के साथ दिवंगत श्रीदेवी को देखना सुखद अनुभूति है. इरशाद कामिल के लिखे और अजय अतुल के संगीतबद्ध किये ‘मेरे नाम तू’ गीत में धड़क के संगीत का असर आसानी से महसूस किया जा सकता है. तनिष्क बागची अतिथि संगीतकार भर हैं.

इस फिल्म का दर्शकों को बड़ी बेसब्री से इंतज़ार था. निर्माण के समय से ही लोगों में इस बात की उत्सुकता बनी रही कि जब तीस साल पहले बौने का किरदार निभाने वाले कमल हासन की अप्पू राजा बॉक्स ऑफिस पर कोई ख़ास कमाल नहीं दिखा सकी थी तब शाहरुख़ सृदश शीर्ष सितारे को नाटे कद में सिमटने की क्या सूझी. बौने कद के लोग समाज में एक उपहास भरी जिंदगी बिताने को अभिशप्त होते हैं. कभी जोकर के साथ मसखरी कर हंसाते बौनों की प्रजाति अब सर्कस के साथ ही विलुप्तप्राय हो चुकी है. ऐसे में ‘ज़ीरो’ की कहानी और उसके फिल्मांकन की आधुनिक महँगी तकनीक को लेकर खूब चर्चा होती रही. तनु वेड्स मनु और राँझना जैसी फिल्मों के लेखक हिमांशु शर्मा यहाँ चूक गए. फिल्म का पूर्वार्ध तो मनोरंजक है लेकिन मध्यांतर के बाद फिल्म अपना असर खो देती है.

ट्रेलर से दर्शकों को आकर्षित कर चुके संवादों के अलावा भी फिल्म में कई मजेदार संवाद हैं- खबर सुनोगे तो दिल अनूप जलोटा हो जाएगा.. इनकी टाँगे तो जमीन तक पहुंचती नहीं पर चाहिए ऐश्वर्या राय.. बौने को तो लोग सर्कस में पैसे खर्चकर देखने आते हैं, उसने मुझे देखा तक नहीं.. सपने इंसान की साइज़ देखकर नहीं आते.. किस्मत वाला है तू लड़की मिल रही है शादी के लिये वर्ना तुम्हे लड़का न मिले.. कौन सा यूपीएससी में सिलेक्शन हुआ है तेरा.. असल में आदमी चार फुट छह इंच का ही होता है बाकी तो उसकी अकड़ होती है.. हम तो फाइनेंस मिनिस्टर का मुँह देख के बजट बना देते हैं.. सोचा लड़की तो मिली नहीं देश का नाम ही रोशन कर देते हैं..

लगता है तीनो बड़े खान सितारों का समय अब हाथ से निकल रहा है. पिछले छह महीनो में सलमान की रेस-3 और आमिर की ठग्स ऑफ़ हिन्दोस्तान के बाद अब शाहरुख़ की ज़ीरो का हश्र यही साबित करता है कि कंटेंट के अभाव में ट्रीटमेंट का कोई मोल नहीं. दिलचस्प कहानी और सुगठित पटकथा ही फिल्म की जान होती है. रोल चुनने में जरा सी लापरवाही सितारों को धूल चटा सकती है.

 

 

 

 

 

 

 

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं फिल्म समीक्षक हैं)



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