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धर्म पर जीवन बलिदान करने वाले धर्मवीर महादेव जी

स्वामी दयानंद सरस्वती वेद के सच्चे अनुगामी थे| वेद की प्रत्येक उक्ति को अपने जीवन में उतार कर लोगों को बताया कि वेद का मार्ग ही एकमात्र ऐसा मार्ग है जिससे देश, जाति,धर्म,संस्कृति तथा भाषा की रक्षा की जा सकती है| इसी की ही रक्षा, प्रचार तथा प्रसार करते हुए उन्होंने अपना बलिदान देकर जो बलिदान का मार्ग खोला, उस मार्ग पर आर्य समाज के वेद धर्म के अनुगामियों ने अपने सिर देकर ऋषि के बताये मार्ग का अनुगमन किया| इस प्रकार के ही ऋषि पथ के एक अन्य पथिक थे, जिनका अनुगमन करने वाले धर्म पर शहीद होने वाले महादेव जी भी एक थे |

हैदराबाद निजाम की रियासत में एक छोटी सी जागीर “अकोलगा सैयदां के गाँव एबलगा में सन्” 1913 maoM janmaoM baalak mahadova jaI Aaya- samaaja saak aola ko saaptaaihk satsaMgaaoM mao inayaimata रूप से भाग लेने लगे| इस कारण उन पार स्वामी दयानंद सरस्वती जी के विचारों का गहरा रंग चढ़ गया| परिणाम स्वरूप महादेव जी धर्म, जाति, देश, भारतीय संस्कृति तथा भारतीय भाषा की रक्षा के लिए कुछ करने की योजनायें मन में संजोने लगे| इस कारण अपने आस पास के गाँवों में घूम घूम कर लोगों को वैदिक विचार देने का कार्य करने लगे| इसके साथ ही साथ वह इन क्षेत्रों में आर्य समाज संबंधी पुस्तकों तथा सत्यार्थ प्रकाश की कथा (जो उस मुस्लिम क्षेत्र में अपराध की श्रेणी में आता था) आप नियमित रूप से करते थे| इस कारण क्षेत्र भर के मुसलमान महादेव जी के शत्रु बन गए क्योंकि आप आर्य समाज का प्रचार करने के कारण उनके मत की हानि कर रहे थे| इन्हीं संकुचित विचारों के कारण अनेक अवसर इस प्रकार के आए मुसलामानों ने आप पर जानलेवा आक्रमण किये, किन्तु आप इन सब की चिंता किये बिना निरंतर वैदिक धर्म के प्रचार और प्रसार के कार्यों में जुटे रहे|

एक क्षण तो ऐसा भी आया कि जब मुसलमानों ने इनसे सत्यार्थ प्रकास अथा अन्य वैदिक साहित्य छीन कर पुलिस को सॉंप दिया| जब इस घटना की सूचना आर्य प्रतिनिधि सभा को मिली तो तो सभा के अधिकारियों ने पुलिस को सब घटना का विवरण दिया| इस पार पुलिस ने मात्र पुस्तकें लोताते हुए मामला रफा दफा कर दिया किन्तु उत्पाती मुसलमानों को ना तो मौखिक रूप से हि कुछ कहा और न ही कुछ दंड ही दिया गया| मुसलमानों को कुछ कहते भी कैसे क्योंकि यह तो निजाम की पुलिस थी, जिसने मुसलमानों को हिन्दुओं पर अत्याचार करने की खुली छूट दे राखी थी| हाँ! इस पुलिस कार्यवाही के कारण मुसलाम्म्नों का उत्साह पहले से भी बढ़ गया और अब प्रतिदिन महादेव जी को जानसे मारने की धमकियां पहले से भी अधिक बढ़ गईं|

महादेव जी तो थे ही निर्भीक| ऋषि मिशन के सच्चे पथिक थे| इस कारण इस तेजस्वी युवक पर इन धमकियों से कुछ भी भय होने के सथान पर उनकी धमकियों ने महादेव जी में नए रक्त का संचार किया, उत्साह को द्विगुणित कर दिया| अब वह पहले से भी अधिक लगन के साथ वैदिक धर्म का सन्देश खुल कर लोगों को देने लगे| मुसलमान तो पहले से ही उनकी जान के सौदागर बने हुए थे| अत: एक दिन जब महादेव जी ऋषि मिशन तथ वेद प्रचार के लिए पुस्तकें बगल में दबाये जा रहे थे कि मार्ग में छुपे मेहर अली नामक मुस्लिम हत्यारे ने चोरों के समान छुपकर इस आर्य वीर को पीछे से पीठ पर छुरा घोंप दिया|इस प्रकार केवल २५ वर्ष का यह आर्य वीर भी अन्य पूर्ववर्ती आर्यों की भाँति हंसते हंसते दिनांक १७ जुलाई सन् १९३८ ईस्वी को धर्म की बलिवेदी पर अपना शीश भेंट कर हम से सदा सदा के लिए विदा हुए|जुलाई को शहीद हो गया|जुलाई को हँसते हँसते शहीद हो गया|को शहीद हुआ|जुलाई को शैड हुआ |जुलाई को शहीद हुआ ,जुलाई सन १९३८ को शहीद हुआ यहाँ एक बात बताने की आवश्यकता है कि धर्मवीर महादेव जी के देहांत की तिथि आर्य समाज के महाधन नामक पुस्तक में तथा आर्य समाज के बलिदान पुस्तक में क्रमश: स्वामी स्वतान्त्रानंद जी तथा स्वामी ओमानंद जी ने १४ जुलाई लिखा है जबकि प्रा. राजेन्द्र जिज्ञासु जी ने “रक्त रंजित है कहानी” पुस्तक में यह तिथि १७ जुलाई १९३८ दी है| प्रो. राजेन्द्र जिज्ञासु जी स्वयं इस बलिदानी क्षेत्र में रहे हैं तथा खोज भी खूब की है, इस कारण हम उनकी बताई तिथि को ही ठीक मानते हैं|अपनी पुस्तक रक्त रंजित है कहानी में इसे १७ जुलाई लिखते हैं क्योंकि प्र. राजेन्द्र जिज्ञासु जी इस क्षेत्र में कार्य करते रहे हैं तथा खोज भी करते रहे हैं इसलिए हम उनकी बताई तिथि को ही ठीक मानते हैं

महादेव जी के अभूतपूर्व उत्साह, वेद प्रचार की उत्कट इच्छा, बलिदान की तीव्र भावना के कारण आर्य समाज को एक नई चेतना, नै स्फूर्ति प्रदान की| वह अपने जीवन को प्रोपकारार्थ-जनकल्याण के कार्य करते हुए एक लक्ष्य को लेकर चले तथा अपने उस निर्धारित लक्ष्य को प्राप्त जीवन पर्यंत उस लक्ष्य को पाने के इए पुरुषार्थ करते रहे| इस लक्ष्य को पाने के इए अपने जीवन की आहुति देने देने में भी महादेव जी सुपथ से गिरे नहीं| आज यद्यपि धर्मवीर महादेव जी हमारे मध्य नहीन हैं किन्तु उनके वह ओजस्वी विचार, वह कथाएं,वह प्रेरक संगठन की दिशा तथा ऋषि दयानंद जी के विचारों के अनुसार समाज को चलाने की प्रबल इच्छा शक्ति रखते थे उनके जीवन के स्मरण से हम उत्साह प्राप्त कर वैदिक मिशन को आगे बढ़ाएंगे तो मानो हम सच्चे अर्थों में धर्मवीर महादेव जी का सच्चे अर्थों मेन स्मारक बनाने में हम सफल होंगे|

वास्तव में शहीदों के स्मारक बनाकर, उनकी पूजा अर्चना करने की आज एक परम्परा आरम्भ हो गई है| यह भी मूरित पूजा होने के के कारण वैदिक आर्य सिधान्तों के विरुद्ध है| यह पद्धति शहीदों को स्मरण करने का सही मारग नहिन्न्न है| हमारे वीरों ने अपना बलिदान इसलिए तो नहीं दिया कि उनके स्मारक बनाकर उनकी पूजा की जावे | वह तोचाहते थे कि उनके बलिदान से प्रेरणा लेकर उनके अनुगामी , उनके जीवन से प्रेरणा ले कर तदनुरूप कार्य करें| भावी पीढ़ी के लोग उनके बलिदान से प्रेरित होकर देश,जाति तथा धर्म के उत्थान के लिए स्वयं को उस प्रकार ही तैयार करें तथा निरंतर बलिदानी परम्परा को आगे बढाते रहेंगे आगे बढाते रहें और उस प्रकार ही समाज सुधार तथा वेद प्रचार कका कार्य करते रहें,जिस प्रकार हमारे पूर्वजों बलिदान का मार्ग चुनते हुए समाज की रक्षा के लिए अपने आप को बलि के मारग पर चलाया था|मारग पर चलाया आज यदि हम अपने पूर्वजों की थाती को संभालने की क्षमता अपने में पैदा करें तथा इसकी रक्षा के लिए आवश्यकता पड़ने पर बड़े से बड़ा बलिदान देने को भी तैयार रहेंगे, बढाए गए कदम को किसी भी अवस्था में पीछे नाहिंन हतावेंगे| चाहे इसके लिए अपने प्राण तक ही क्यों न उत्सर्ग करने पड़ें तो भी कभी भय का अनुभव नहीं करेंगे| यदि हम ऐसा कर पाए तो निश्चय ही हम एक दिन “ कृण्वन्तो विश्वार्यम् के स्वप्न को साकार करने में सफल होंगे।

डॉ.अशोक आर्य
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