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कलंकित इतिहास को गौरवशाली बताने वालों से सीधे सवाल

वामपंथी इतिहासकार इरफान हबीब और रोमिला थापर को लिखे चर्चित पत्र के बाद मध्य प्रदेश के राज्य सूचना आयुक्त विजय मनोहर तिवारी ने एक और वामपंथी इतिहासकार हरबंस मुखिया को निशाने पर लिया है।

मुखिया के एक विवादास्पद लेक्चर की लिंक सोशल मीडिया पर शेयर करते हुए उन्होंने अपनी पोस्ट में कहा कि मुर्दा जानकारियों के कब्रिस्तान में कोई असरदार मुर्दा आकर अपनी एक्सपायरी डेट की तकरीर दे गया है। विभागीय कब्रों में लेटे मुर्दे ताली बजाकर वाह वाह कह रहे हैं। जीवित समाज के ये मरणासन्न लक्षण किस तरह के भविष्य की ओर ले जाएँगे?

उन्होंने इतिहास विभागों के प्रोफेसरों और रिसर्चरों के दृष्टिकोण पर भी सवाल उठाए हैं, जो अब भी घिसी पिटी पुरानी परिपाटी पर कायम हैं और सरकार के नीतिगत निर्णयों के खिलाफ माहौल बना रहे हैं।

विजय मनोहर तिवारी की पूरी पोस्ट यह है –

इतिहास में डिग्री लेकर कॉलेजों और यूनिवर्सिटियों में पदों पर सुशोभित होना एक बात है और इतिहास को महसूस करना और उसे जीना, बिल्कुल ही दूसरी बात है। अलेक्जेंडर कनिंघम अंग्रेज़ था। पढ़ाई से इंजीनियर था। नौकरी फौज में थी, मगर भारत आया तो बरबाद प्राचीन धरोहरों से अपनी आत्मा को जोड़ बैठा।

वह इतिहास को जीने वाला इंसान था। आज उसका स्मरण उसकी इंजीनियरिंग की पढ़ाई या फौज की सेवाओं की बदौलत नहीं है। वह अमर है, क्योंकि उसने भारत के इतिहास पर जमी धूल को जमीन पर जाकर मृत्युपर्यंत साफ किया। वह नालंदा से भरहूत और सारनाथ से साँची तक भटक और मरने से पहले हमारा ही चमचमाता हुआ अतीत हमारे सामने आइने की तरह रखकर गया।

आज के डिग्रीधारी और सातवें वेतनमान के बाद आठवें या कहीं राजधानी में किसी मंत्री के साथ या सचिवालय में डेप्यूटेशन पर जमने की घात में बैठे कितने अध्यापक और प्राध्यापक अपने भीतर अपने आहत इतिहास को जी रहे हैं?

कनिंघम परदेशी था मगर भारत आते ही सोते-जागते उसके भीतर भारत ही धड़का। कनिंघम जैसे बीसियों ब्रिटिश युवा थे, जो जज से लेकर क्लर्क बनकर आए और प्राचीन भारत का ध्वस्त वैभव देखकर भारत में जिनकी आत्मा रम गई। उन्होंने संस्कृत और पाली भाषाएँ सीखीं। शिलालेख और ग्रंथ पढ़े। स्कॉटिश कारोबारी जेम्स फग्युर्सन ने भारत के टेंपल आर्किटेक्चर पर जो किया है, वह महान भारत की किसी स्तुति से कम नहीं है।

मुझे लगता है कि आज संस्थाओं और विभागों में डटे सौ प्रतिशत जन्मजात भारतीय इतिहास के नाम पर ‘इतिहास की मनरेगा’ में काम कर रहे हैं। इतिहास उनके लिए मुर्दा जानकारियों का एक ऐसा कब्रिस्तान है, जिसमें वे तयशुदा पाठ्यक्रम फातिहा की तरह पढ़ने आते हैं। जीवन भर की नाैकरी में वे कुछ नया और मौलिक नहीं कर पाते। किसी आसान और बेजान टॉपिक पर पीएचडी की शक्तिवर्द्धक खुराक उनके करियर में कहीं पदासीन होने लायक उत्तेजना भर ले आती है। उसके बाद वे स्वतंत्र भारत के ‘सेक्युलर स्वर्णकाल’ में वामपंथियों का फैलाया हुआ मलबा ही सरकारी तगारियों में एक से दूसरी क्लास में ढोते हैं। इतिहासकारों की ज्यादातर परिषदें और काउंसिलें भी लकीर की फकीर रही हैं। कुछ अपवाद बेशक होंगे।

एक बहुत ताजा उदाहरण। इतिहास के कुछ प्रोफेसरों ने पिछले दिनों एक वेबिनार का आयोजन किया। मुख्य वक्ता जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के रिटायर्ड प्रोफेसर हरबंस मुखिया थे। इसमें 20 राज्यों के सवा सौ से ज्यादा प्राध्यापक, शोधार्थी और विद्यार्थी शामिल थे। नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति को जमीन पर लाने वाली टास्क फोर्स में ज्यादातर ऐसे ही लोग हैं।

‘मध्य भारतीय इतिहास’ अनुसंधान प्रतिष्ठान (सीआईएचआरएफ) की पहल पर हुए इस वेबिनार में प्रोफ़ेसर हरबंस मुखिया के विचार किसी ‘मध्य भारत’ पर नहीं, ‘मनगढ़ंत मध्यकाल’ की महिमा पर सुनाई दिए। इस वेबिनार की लिंक मुझे बहुत देर से मिली। मैंने इसे पूरा सुना।

एक ऐसे समय जब हर दिन नए तथ्य और नई जानकारियाँ सामने आ रही हैं और इतिहास की मान्यताओं के पुराने आधार खिसक रहे हैं, तब हरबंस मुखिया की आँखों पर चढ़ा चश्मा मध्य काल को मुगले-आजम के भव्य सेट की तरह ही देखता है। उनकी घड़ी की सुइयाँ हिजरी के कैलेंडर पर अटकी हैं।

मुखिया ने मुग्ध मन से कहा:

“मुस्लिम शासकों का काल भारत में अर्थव्यवस्था और सामाजिक स्तर पर अत्यंत गतिशीलता का काल है, जब जीडीपी में भारत के पास दुनिया का चौथाई हिस्सा था। मुगलों के समय भारत में स्थापत्य, नृत्य, संगीत, चित्रकला और कलाओं का अदभुत विकास हुआ।”

मुगलों के वास्तुकला के योगदान में वे ताजमहल घुमाना नहीं भूले। उनके अनुसार कपड़ा उद्योग अत्यंत विकसित अवस्था में था। ऐसे में मुस्लिम शासन को अंधकार का युग कहना ठीक नहीं है।

“यह इतिहास को देखने की एक गलत दृष्टि है, जिसे अंग्रेजों के समय जेम्स मिल और डाउसन ने शुरू किया।”

मुगलों के एक नमक हलाल वकील की तरह वे बोले:

“मुस्लिम शासनकाल में एक भी हिंदू-मुस्लिम दंगा नहीं हुआ। पहला हिंदू-मुस्लिम दंगा तो औरंगजेब की मौत के सात साल बाद 1714 में अहमदाबाद में हुआ जो दो दिन तक चला था। वह होली के दिन गाय को जिबह करने के कारण शुरू हुआ। पूरी 18 वीं सदी में सिर्फ पाँच दंगे दर्ज हैं। जबकि आज के दौर में इससे कहीं ज्यादा दंगे होते हैं। मुगल तो सबके बीच शांति और सुलह चाहते थे।”

वल्लाह, क्या सेक्युलर अदा है? जबकि यह हकीकत भी दस्तावेजों में सरेआम दर्ज है कि दिल्ली पर तुर्कों का कब्जा जमने के बाद ही देश भर में आग और धुआँ किस तरह फैलाया गया।

मंदिरों की तोड़फोड़, लूटमार, दिल्ली में लूट के माल की नुमाइशें, गुलाम बच्चे-बच्चियों के बाजार, कत्लोगारत, सड़ती हुई लाशों के खलिहान, किले के बुर्जों पर टंगी भुस भरी हुई लाशें, कटे हुए सिरों की मीनारें और चबूतरे, अनगिनत औरतों के लगातार सामूहिक आत्मदाह समकालीन विवरणों में जगह-जगह मौजूद हैं। ऐसे “शांंतिप्रिय और जनकल्याणकारी शासन’ में दंगे न होना मुखिया की नजर में कितनी बड़ी उपलब्धि है, जिस पर मुगलों को सौ में से सौ नंबर मिलने चाहिए!

लालच और छल बल से हुए धर्मांतरण पर ‘मासूम’ प्रोफ़ेसर मुखिया ने कहा:

“इसका कोई डेटा उपलब्ध नहीं है। न ही कोई किताब है। केवल फुटकर विवरण हैं। ऐसा क्यों है कि धर्मांतरण पर कोई डेटा नहीं है? ऐसा इसलिए है कि किसी एक एजेंसी धर्मांतरण के लिए जिम्मेदार नहीं है। न राज्य और न ही सूफियों के स्तर पर किसी विशेष कालखंड में धर्मांतरण किया गया। यह धीमी गति की एक प्रक्रिया थी, जिसमें शासकों का कोई मतलब नहीं था। औरंगजेब के समय केवल दो सौ लोग मुस्लिम बने।”

लगता है मुखिया को डेटा देखने के लिए पुरातात्विक खुदाई में निकले खिलजी, तुगलक, लोदी और मुगल ब्रांड के उच्च तकनीक से बने लैपटॉप, हार्ड डिस्क, सीडी, चिप या पैन ड्राइव चाहिए। जबकि सारे समकालीन इतिहासकारों ने पराजित हिंदू राज्यों में धर्मांतरण के घृणित ब्यौरे हर सदी में लिख छोड़े हैं।

जियाउद्दीन बरनी और फखरे मुदब्बिर जैसे महानुभावों ने तो पूरी संहिताएँ रचीं कि इस्लाम का कब्जा होने के बाद स्थानीय काफिरों के साथ कैसा व्यवहार किया जाए। उन्हें सिर्फ जज़िया लेकर न छोड़ा जाए। उनके साथ दोयम दरजे के कैसे सुलूक किए जाएँ, उन्हें कैसे गरीब बनाया जाए, इस्लामी विधि विधान से यह कार्य संपन्न करने संबंधी ड्राफ्ट उन्होंने बहुत मेहनत से तैयार किए और दरबारों में लंबी बहसें कीं हैं। शायद मुखिया ने सुनी नहीं!

धर्मांतरित हिंदुओं के अपमान का सिलसिला यहीं खत्म नहीं हुआ। उन बेरहम सुल्तानों की नजर में अपना धर्म छोड़ने वाले ये आखिर तक ‘नीच’ ही थे। ऐसे काफिरों के लिए वे खुलेआम यही शब्द इस्तेमाल करते थे- ‘नीच।’

क्या मजाक है कि अनगिनत लोग आज भी उन क्रूर हमलावरों से अपनी बल्दियतें जोड़कर फ़ख़्र महसूस करते हैं। औरंगाबाद में औरंगजेब और भोपाल में दोस्त मोहम्मद खान के बैनर टाँगते हुए ऐसे कई चेहरे दिखाई दे जाएँगे। यह ऐसा ही है जैसे कोई खुद को खुद गाली देकर खुद ही खुश हो जाए!

सरकार, यूजीसी और मीडिया पर निशाना

मुखिया ने आखिर में केंद्र सरकार को कठघरे में खड़ा किया। वे बोले कि सरकार, यूजीसी, सोशल मीडिया और टीवी चैनलों के जरिए हमें फिर से जेम्स मिल के नजरिए की तरफ धकेला जा रहा है। हमने मध्यकाल 8वीं सदी से 18वीं सदी तक माना था लेकिन अब यूजीसी 1206 से शुरू मान रही है। हमने साठ साल पहले इतिहास को देखने का ढंग बदला था। लेकिन अब हमें फिर से वापस वहीं ले जाने की कोशिश की जा रही है। “ऐसा क्यों हो रहा है, आप हिंदू और मुस्लिम के बीच दंगे और विवाद करके समाज को बनाना चाहते हैं?” मुखिया के मन की बात सबने सुनी।

उनका पूरा व्याख्यान उसी पुरानी घिसी-पिटी परिपाटी पर आधारित था, जिसमें दिल्ली पर कब्जा जमाने वाले बाहरी तुर्कों और मुगलों को हर हाल में एक आदर्श शासक के रूप में देखा जाता रहा है।

मुखिया ने वर्तमान केंद्र सरकार की इतिहास को समझने की दृष्टि पर सवाल खड़े किए और पाठ्यक्रमों में बदलाव का विरोध किया। अखंड भारत के संदर्भ में उन्होंने कहा कि उनका आशय 1947 के पहले के उस अखंड भारत का नहीं है, जैसा आरएसएस वाले बनाना चाहते हैं।

मध्यकाल की असलियत से बेखबर

मुझे आश्चर्य है कि किसी प्रोफ़ेसर ने मुखिया के कथन पर कोई चूँ तक नहीं की। किसी ने उन दसियों समकालीन लेखकों की किताबों का एक भी ब्यौरा नहीं बताया, जो सल्तनत और मुगलकाल की सारी थ्योरी को उलटने में सक्षम है।

उल्टा सारे श्रोता प्रोफ़ेसर उन्हें रोबोट की तरह सुनते रहे। किसी ने यह तक नहीं कहा कि हम मध्य भारत पर काम करने वाली परिषद से हैं, आप कहाँ मध्य काल में घसीटे जा रहे हैं, जबकि पूरा मध्य काल बाहरी हमलावर हत्यारों और लुटेरों की छीना-झपटी में हुई भारत की बेरहम पिसाई का कलंकित कालखंड है। पृथ्वीराज चौहान के बाद दिल्ली इन्हीं लुटेरों का एक अड्डा बन गई थी, जिस पर एक के बाद दूसरे लुटेरों के झुंड झपटते रहे।

सारी सेक्युलर कलई खुलने के बावजूद अब भी मुखियाओं, थापरों और हबीबों को सुना जाना इस बात का प्रमाण है कि इतिहास के सरकारी कामगारों के दृष्टिकोण कितने खोखले हैं। जब खाली दिमाग सेक्युलर खूँटियों से बँधे हों और समस्त बुद्धि एक डिग्री हासिल करने में ही खर्च हो गई हो तो मुखिया को सुनना एक प्रोफ़ेसर या रिसर्चर के जीवन की धन्यता ही होगी।

उनसे कहीं ज्यादा कीमती और मौलिक काम ताे यूट्यूब पर कई शौकिया लोग कर रहे हैं। वे इतिहास को जी रहे हैं। वे नए तथ्यों को सामने ला रहे हैं। नया खोज रहे हैं। इस दृष्टि के लिए मुखिया जैसे किसी मार्गदर्शक के निकट बैठकर की गई एक अदद पीएचडी अनिवार्य नहीं है!

एक विहंगम दृष्टि से भी दिल्ली-आगरा के सात सौ सालों का नजारा देखेंगे तो लगेगा कि एनिमल प्लेनेट का कोई ऐसा शो देख रहे हैं, जिसमें लार टपकाते भूखे लकड़बग्घों के झुंड अपने शिकार की घात में चारों तरफ मंडरा रहे हैं। किसी के मुँह में माँस के लोथड़े हैं। कोई हड्‌डी खींचकर भाग रहा है। कोई मुर्दों की चमड़ी खींच रहा है। वे आपस में एक दूसरे पर भी काट, गुर्रा और छीन-झपट रहे हैं।

मुखिया की नजर में यही ‘महान साम्राज्य स्थापना के मध्यकालीन मनोरम दृश्य’ हैं, और उनका मध्यकाल इतना महान है कि हम उत्तर भारत में मौर्य, गुप्त, पाल, गहड़वाल, गुर्जर प्रतिहार, परमार, कलचुरि, चंदेल गोंड और दक्षिण भारत में चोल, होयसला, पल्लव, पांड्य, काकातीया साम्राज्यों को हमेशा के लिए हाशिए पर डाल सकते हैं। सेक्युलर गर्भगृह में मुगले-आजम की प्राण प्रतिष्ठा के लिए दिल्ली को केंद्र बनाकर सल्तनत और मुगल काल के लकड़बग्घों को सुलतान और बादशाह के मुकुट पहना दिए गए।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता अबाध है

मीडिया के जिन महानुभावों को लगता है 2014 के बाद अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता खतरे में है, कहने-करने की आजादी नहीं है, उन्हें ध्यान रहे कि हरबंस मुखिया के प्रशंसक श्रोताओं और आयोजकों में मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और गुजरात के विश्वविद्यालयों के कामगार अग्रणी रूप से शामिल हैं। लेकिन उन पर उच्च शिक्षा विभागों ने कोई एक्शन नहीं लिया है।

मंत्रियों और नौकरशाहों को खबर भी नहीं होगी। हो सकता है कि ये विभाग अगला वेबिनार इरफान हबीब या रोमिला थापर का प्लान कर रहे हों। क्या पिछली सरकारों में यही गणमान्य इतिहासविद् सरकार के नीतिगत निर्णयों के प्रतिकूल ऐसे व्याख्यान करते थे? मुखिया तो संघ का मजाक उड़ा गए और सरकार पर सवाल खड़े कर गए। क्या पिछली सरकारों में कोई जनपथ के दस नंबरियों पर उंगली उठाने की जुर्रत कर सकता था?

मुर्दा जानकारियों के कब्रिस्तान में कोई असरदार मुर्दा आकर अपनी एक्सपायरी डेट की तकरीर दे गया है। विभागीय कब्रों में लेटे मुर्दे ताली बजाकर वाह वाह कह रहे हैं। जीवित समाज के ये मरणासन्न लक्षण किस तरह के भविष्य की ओर ले जाएँगे?

साभार- https://dopolitics.in/ से

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