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अंग्रेजों का पाप ढो रही है हमारी संसदीय प्रणाली

भारतीय संसदीय लोकतांत्रिक प्रणाली (Indian Parliamentary Democratic System)
अंग्रेजों का शासन जब पूरी दुनिया में चल रहा था तो अँग्रेज़ों ने गुलाम देशों का तीन तरह का ग्रुप बनाया था । एक ग्रुप था कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलॅंड का, ये कहलाती थी Self Governing Colonies, मतलब ये देश कुछ-कुछ अपने हित के क़ानून भी बना सकते थे, लेकिन ज्यादा कानून अंग्रेज ही बनाते थे, दूसरा ग्रुप था, सिलोन (श्रीलंका), मौरीसस, सूरीनाम, वेस्ट इंडियन देशों, आदि का, ये कहलाती थी, Crown Colonies, और तीसरे ग्रुपमे भारत ( पाकिस्तान और बांग्लादेश ) था, ये कहलाती थी Depending Colonies, ये गुलामी का सबसे खराब सिस्टम था, इसमे ये होता था कि हमको अपने लिए, अपने देश के लिए, अपनी व्यवस्थाओं के लिए कुछ भी करने का अधिकार ही नहीं था, कोई कानून नहीं बना सकते थे हम, सब कुछ अँग्रेज़ों के हाथ मे था, मतलब हम पूरी तरह अँग्रेज़ों के Dependent थे।

अंग्रेजों ने अपनी सरकार 1760 में स्थापित की थी भारत में, लेकिन वो कंपनी की सरकार थी, अंग्रेजों की सरकार नहीं थी वो, लेकिन छोटे-मोटे कानून उन्होंने उसी समय से बनाना शुरू कर दिया था और उस समय से लेकर 1947 तक अंग्रेजों ने जो 34735 कानून बनाये थे । उन्होंने जो व्यवस्था बनाई थी हमें गुलाम बनाने के लिए, हमारे ऊपर शासन करने के लिए, दुर्भाग्य से आज भी हमारे देश में सब के सब कानून, सब की सब व्यवस्थाएं वैसे के वैसे ही चल रहीं हैं जैसे अंग्रेजों के समय चला करती थीं ।

जब हमारे देश में अंग्रेजों का शासन था तो हमारे जितने भी क्रन्तिकारी थे उन सबका मानना था कि भारत की गरीबी, भुखमरी और बेकारी तभी ख़त्म होगी जब अंग्रेज यहाँ से जायेंगे और हम हमारी व्यवस्था लायेंगे, हम उन सब तंत्रों को उखाड़ फेकेंगे जिससे गरीबी, बेकारी, भुखमरी पैदा हो रही है । लेकिन हुआ क्या ? हमारे देश में आज भी वही व्यवस्था चल रही है जो अंग्रेजों ने गरीबी, बेकारी और भुखमरी पैदा करने के लिए चलाया था । क्रांतिकारियों का सपना बस सपना बन के रह गया लगता है।
भारत के लोग व्यवस्था की खामियों के बारे में बात नहीं करते हैं बल्कि अपनी जनसँख्या को गाली देते हैं, जब कि ये कोई समस्या नहीं है, समस्या वहां से शुरू होती जब हम अपने संसाधनों का बटवारा अपने लोगों में न्यायपूर्ण तरीके से नहीं कर पाते हैं । जिस जनसँख्या के लिए समान बटवारा होना चाहिए जैसा कि हमारे संविधान में लिखा हुआ है, वो नहीं हो पाया है हमारे देश में । यूरोप और अमेरिका में संसाधनों का समान बटवारा आप पाएंगे लेकिन हमारे यहाँ नहीं। यूरोप और अमेरिका में भी भारत की ही तरह टैक्स लिया जाता है लेकिन वहां जब टैक्स को खर्च किया जाता है तो वो Per capita Distribution के हिसाब से होता है । Collection अगर per capita के हिसाब से है तो distribution भी per capita के हिसाब से है लेकिन भारत में collection तो per capita के हिसाब से है लेकिन distribution, per capita के हिसाब से नहीं है।
अगर ये distribution, per capita के हिसाब से होता तो छत्तीसगढ़ में, बिहार में, झारखण्ड में, ओड़िसा में इतनी भयंकर गरीबी नहीं होती। तो अपने यहाँ समस्या जनसँख्या से नहीं उस व्यवस्था से है जो ऐसे हालात पैदा करती है और हमारी व्यवस्था कैसी निकम्मी और नकारा है उसका ताजा उदहारण मैं आपको देता हूँ । आप पजाब जाएँ,हरियाणा जाएँ तो आप देखेंगे कि FCI का जो गोदाम होता है वहां अनाज इतना ज्यादा होता है कि उनको रखने की जगह नहीं होती है बोरे के बोरे अनाज खुले में पड़े होते है और उसको या तो चूहे खाते रहते हैं या सड़ रहे होते हैं । आपको याद होगा कि सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि” इन अनाजों को उन गरीबों के बीच क्यों नहीं बाँट दिया जा रहा है जो भूख से मर रहे हैं” लेकिन वो आज तक नहीं हो पाया।

ऐसा क्यों हुआ ? क्योंकि हमारे पास वैसा कोई distribution system नहीं है और साथ ही साथ हमारे देश के नेता नहीं चाहते कि गरीबी ख़त्म हो क्योंकि गरीबी और गरीब ख़त्म हो जायेंगे तो इन नेताओं का झंडा कौन ढोयेगा, नारे कौन लगाएगा, उनकी सभाओं में कौन जायेगा ? इसलिए इन नेताओं के लिए सुप्रीम कोर्ट का आदेश भी कोई मायने नहीं रखता ।
भारत सरकार की विफलता का एक दूसरा उदहारण देता हूँ, भारत की सरकार ने 1952 से एक पंचवार्षिक योजना शुरू की जो औसतन 10 लाख करोड़ का होता है। अभी तक हमारे देश में ग्यारह पंचवार्षिक योजनायें लागू हो चूकी हैं, मतलब अभी तक हमारी सरकार 110 लाख करोड़ रूपये खर्च कर चूकी है और गरीबी, बेकारी, भुखमरी रुकने का नाम ही नहीं ले रही है । अंग्रेज जब थे तो ऐसी कोई योजना नहीं थी इस देश में क्योंकि वो विकास पर कुछ भी खर्च नहीं करते थे और तब हमारी गरीबी नियंत्रण में थी लेकिन जब से हमने पंचवार्षिक योजना शुरू की हमारी गरीबी भयंकर रूप से बढ़ने लगी और बढती ही जा रही है कहीं रुकने का नाम ही नहीं ले रही है । अगर भारत सरकार उन पैसों को (जिसे उसने इन पंचवार्षिक योजनायों पर खर्च किया) सीधा हमारे लोगों को बाँट देती तो आज एक-एक भारतीय के पास नौ-साढ़े नौ लाख रूपये तो होते ही (मैं एक आदमी की बात कर रहा हूँ एक परिवार की नहीं) और सभी भारतीय कम से कम लखपति तो होते ही।

भारत की समस्या यहाँ की जनसँख्या नहीं है, यहाँ के लोग नहीं हैं, यहाँ की जातियां नहीं हैं, यहाँ के धर्म नहीं हैं बल्कि हमारा तंत्र है जिसको हम सही से नहीं चला पाते या कहे कि हमको चलाना नहीं आता । हमने जो व्यवस्था अपनाई है वो दुर्भाग्य से अंग्रेजों का है और अंग्रेजों ने ये व्यवस्था अपनाई थी भारत में गरीबी, बेकारी, भुखमरी पैदा करने के लिए । आप कहेंगे कि अंग्रेजों ने कौन सी व्यवस्था हमको दी । जिसको हम संसदीय लोकतांत्रिक प्रणाली (Parliamentary Democratic System) कहते हैं वो अंग्रेजों की देन हैं हमें । इसी तंत्र को इंग्लैंड में वेस्टमिन्स्टर सिस्टम कहते हैं, इसी तंत्र को गाँधी जी बाँझ और वैश्या कहा करते थे (इसका अर्थ तो आप समझ गए होंगे) । और यूरोप का ये लोकतंत्र निकला कहाँ से है ? तो वो निकला है डाइनिंग टेबल से, जी हाँ खाने के मेज से यूरोप का लोकतंत्र निकला है ।

राजनीति शास्त्र के विद्यार्थी अगर इस पत्र को पढ़ रहे होंगे तो तुरत समझ जायेंगे, क्योंकि हमारे यहाँ राजनीति शास्त्र में ये पढाया जाता है और 100 नंबर के प्रश्नपत्र में इस पर बीस नंबर का सवाल आता है कि “बताइए कि यूरोप का प्रजातंत्र कहाँ से निकला? विस्तार से वर्णन कीजिये ” । तो उसका उत्तर है —-यूरोप का प्रजातंत्र डाइनिंग टेबल से निकला है, खाने के मेज से यूरोप के प्रजातंत्र की शुरुआत हुई है । अब खाने की मेज तो निजी जीवन का हिस्सा है और लोकतंत्र सार्वजानिक जीवन का हिस्सा है, तो निजी जीवन में जो कुछ आप डाइनिंग टेबल पर करते हैं, वही आप सार्वजानिक जीवन में करने लगे तो उसी को संसदीय लोकतांत्रिक प्रणाली कहते हैं, दुर्भाग्य से इसी संसदीय लोकतांत्रिक प्रणाली को हमने अपना लिया है, हमने इसका आविष्कार अपने देश में नहीं किया और अंग्रेजों ने ये जो संसदीय लोकतांत्रिक प्रणाली हमें दी है वो कहीं से भी न संसदीय है और न लोकतांत्रिक है बल्कि वो 101% Aristocratic System है । आप कहेंगे कि वो कैसे ? मैं बताता हूँ ।

भारत के 121 करोड़ लोगों का फैसला एक आदमी करे तो वो संसदीय होगा या लोकतांत्रिक होगा ? 121 करोड़ लोगों का फैसला एक आदमी करे, जिसे हम वित्तमंत्री कहते हैं तो वो व्यवस्था लोकतांत्रिक होगा क्या ? और गलती से वो बिका हुआ हो या मीरजाफर हो तो वो लोकतांत्रिक होगा क्या ? 121 करोड़ लोगों का फैसला 121 करोड़ लोग करें तो वो आदर्श होगा, नहीं कर सकते तो 60 करोड़ लोग करें, नहीं तो 30 करोड़ लोग करें और कुछ नहीं तो एक प्रतिशत लोग तो करें । यहाँ तो वो भी नहीं है । एक व्यक्ति भारत में तय करता है कि कहाँ टैक्स लगना चाहिए, कहाँ नहीं लगना चाहिए और वो चीज संसद में पेश हो जाती है और बाकी 545 लोग जो लोकसभा में बैठे हैं और 250 लोग जो राज्य सभा में बैठे हैं वो सिर्फ बहस इस बात पर करते हैं कि कहाँ कटौती होनी चाहिए, कहाँ बढ़नी चाहिए, ये नहीं कहते कि इसको पूरा वापस ले लो क्योंकि इनको ये अधिकार नहीं है, तो ये व्यवस्था लोकतांत्रिक है क्या ?
एक दूसरा उदहारण देता हूँ आपको । आप अपने संसदीय क्षेत्र या विधानसभा क्षेत्र को लीजिये, मान लीजिये कि वहाँ पाँच लाख मतदाता हैं और चुनाव में खड़े होने वाले प्रत्याशियों की संख्या दस है और हमारे देश में औसत रूप से मतदान का प्रतिशत 50 (%) ही रहता है, मतलब ढाई लाख लोगों ने अपने मताधिकार का प्रयोग कर मतदान किया । अब ये ढाई लाख मत इन दस प्रत्याशियों में बटा तो किसी को 75 हजार वोट तो किसी को 65 हजार वोट तो किसी को 50 हजार वोट और किसी को कुछ, किसी को कुछ वोट मिला । और जब परिणाम आया तो 75 हजार वोट पाने वाला चुनाव जीत जाता है, उस क्षेत्र में, जहाँ मतदाताओं की संख्या पाँच लाख है।

मतलब कि जीतने वाला प्रत्याशी पाँच लाख मतदाताओं के क्षेत्र में 15 प्रतिशत वोट पाकर उस संसद या विधानसभा में पहुँच जाता है जहाँ बहुमत 51 % पर तय होता है । आप समझ रहे हैं न, मैं क्या कह रहा हूँ ? 15 प्रतिशत वोट पाकर कोई प्रत्याशी उस संसद या विधानसभा में पहुँच जाता है जहाँ बहुमत 51 % पर तय होती है, मतलब ये चुनाव पूरा का पूरा गैरकानूनी हुआ कि नहीं ?

और उस संसद और विधानसभा के अन्दर का हाल भी जान लीजिये । संसद में क्या होता है कि कोई विधेयक अगर पारित करना हो तो एक नियम है जिसको ” कोरम पूरा होना कहते हैं ” मतलब कुल सदस्यों का कम से कम 10 प्रतिशत सदन में उपस्थित होना चाहिए यानि 54 सदस्य कम से कम होने चाहिए एक विधयक को पास करने के लिए लेकिन कई बार होता क्या है कि सदन में 20 -25 सदस्य ही उपस्थित होते हैं तो इससे तो कोरम भी पूरा नहीं होता तो इस स्थिति के लिए भी एक नियम है, इसको Emergency Rule कहा जाता है, इसमें होता ये है कि उस समय-विशेष में जितने सदस्य सदन में उपस्थित हैं उनका आधा अगर उस विधेयक के पक्ष में मतदान कर दे तो कानून बन जायेगा।
आप इसी को लोकतंत्र कहेंगे क्या ? मैं कोरम को ही लेता हूँ और आपसे पूछता हूँ कि अगर 27 -28 लोग मिलकर कोई विधेयक पास करा लेते हैं और 121 करोड़ लोगों के लिए कानून बन जाता है तो वो कहीं से भी लोकतांत्रिक होगा क्या ? तो हम हमारे देश में जो लोकतांत्रिक व्यवस्था चला रहे हैं वो कहीं से भी लोकतांत्रिक नहीं है और लोकतांत्रिक कैसे नहीं है उसका एक उदहारण और देता हूँ । जब चुनाव होते हैं तो हम लोग मतदान करते हैं जिसमे किसी पार्टी के प्रत्याशी को चुनते हैं यानि दुसरे को हराते हैं और जब ये लोग संसद में पहुँचते हैं तो ऐसे लोगों से गठबंधन कर लेते हैं जिसको हमने नकार दिया है । पिछले संसद में आपने देखा होगा कि कम्युनिस्ट पार्टी ने उस कांग्रेस को समर्थन देकर सरकार बनाया जिसका विरोध करके उसने लोगों का समर्थन पाया था, चाहे वो बंगाल हो, केरल हो या पूर्वोत्तर के विभिन्न राज्य । ये उस राज्य/क्षेत्र की जनता का अपमान हुआ कि नहीं?। ऐसा ही अटल बिहारी वाजपेयी के सरकार के समय हुआ था । इसी को आप लोकतंत्र कहेंगे क्या ? ये तो मजाक हो रहा है इस देश में, लोकतंत्र के नाम पर ।
ये व्यवस्था कहीं से भी लोकतांत्रिक नहीं है ये दरअसल अंग्रेजों का बनाया हुआ गुलामगिरी वाला Aristocratic System है जिसमे 4 -5 लोगों को निर्णय लेने का अधिकार है बाकी तो उसे सिर्फ follow करते हैं । उनको प्रश्न पूछने का भी अधिकार नहीं है। प्रधानमंत्री ने कोई फैसला कर लिया तो उसे पूरे मंत्रिमंडल को मानना ही पड़ेगा, चाहे वो कितना ही गलत क्यों ना हो, क्योंकि system में लिखा हुआ है कि “प्रधानमंत्री कभी गलत नहीं होता, जो फैसला वो करेंगे उसको कैबिनेट को मानना ही पड़ेगा”, अगर आप नहीं मान सकते तो कैबिनेट से इस्तीफा दीजिये और बाहर जाइये । यही लोकतंत्र है क्या? अभी आपने देखा कि कैसे वालमार्ट को बुलाने के लिए इन्होने कमर कस लिया है, इस पर ना राज्यों से चर्चा, न विपक्ष से सलाह और आम आदमी की इस देश में इज्ज़त क्या है वो तो इसी तरह मरने के लिए हीपैदा हुए है, वो तो इससे बाहर होते ही है,हमेशा की तरह, इसी को लोकतंत्र कहेंगे क्या ?
अपने संसद में जब बहस होती है तो आप जरा ध्यान दीजियेगा । हमारे जो सांसद हैं वो किसी ड्राफ्ट पर बहस करते हैं, वो ड्राफ्ट बिल कहलाता है उसे हिंदी में विधेयक कहते हैं । तो वो जिस बिल पर बहस करते हैं उसकी ड्राफ्टिंग सेक्रेटरी करता है । संसद में सेक्रेटरी होता है वो बिल की ड्राफ्टिंग करता है, इसके पास सेक्रेटरी की एक टीम होती है । जेनरल सेक्रेटरी जो होता है उसके पास ज्वाइंट सेक्रेटरी स्तर के कई अधिकारी होते हैं, उनसे वो बिल की ड्राफ्टिंग करवाता है और ये सभी के सभी IAS ऑफिसर होते हैं ।

एक बार मैंने एक सांसद महोदय से पूछा कि आप मेरे सांसद हैं, मेरे प्रतिनिधि हैं, आप बहस करते हैं, तो जिस बात पर आप बहस करते हैं उसकी ड्राफ्टिंग खुद क्यों नहीं करते ? क्या आप जानते हैं कि हमारे सांसद जिस बिल पर बहस करते हैं उसकी ड्राफ्टिंग वो खुद नहीं कर सकते, वो सिर्फ बहस करते हैं और बहस के दौरान उन्हें लगे कि xyz point गलत है या यहाँ कौमा छुटा है तो फिर उन्हें (सांसद/मंत्री को) एक आवेदन देना पड़ेगा, फिर बिल सेक्रेटरी के पास वापस जायेगा, सेक्रेटरी उस पर विचार करेगा, ज्वाइंट सेक्रेटरी की बैठक बुलाएगा, हो सकता है कि वो बैठक तीन महीने तक चलता रहे, नोटिफिकेशन जारी करेगा और तब कौमा बदलेगा या कोई त्रुटि होगी उसे ठीक किया जायेगा, उसके बाद ये बिल वापस सदन में आएगा । कितना समय लगा ? तीन महीना और वो भी एक कौमा बदलने में।

अगर सांसदों को ये अधिकार होता तो वो क्या करते ? वो कलम निकालते और तुरत उस कौमा को खुद डाल देते या xyz point गलत है उसे बदल देते । लेकिन वो ऐसा नहीं कर सकते क्योंकि उन्हें ये अधिकार ही नहीं है, क्योंकि नियम नहीं है और ये नियम अंग्रेजों ने बनाया था । जब हमारा प्रतिनिधि हमारे लिए ड्राफ्ट नहीं बना सकता, जिनका प्रतिनिधित्व वो कर रहा है उनके हित का ख्याल कर के वो ड्राफ्ट नहीं बना सकता तो फिर वो हमारा प्रतिनिधि हुआ कैसे ? सिर्फ वो बहस कर सकता है, कोई लाउडस्पीकर थोड़े ही भेजा है हमने ?

ये तो था संसद और हमारे प्रतिनिधियों का हाल अब उसके नीचे का हाल भी देख लीजिये । हमारे यहाँ गाँव में सबसे छोटा अधिकारी होता है “पटवारी” (अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग नाम से ये जाने जाते हैं) तो आप देखिये कि ये सिस्टम क्या है ? हमारे यहाँ के पटवारी का जवाबदेही/ accountability किसके प्रति है तो वो अपने से ऊपर के अधिकारी के प्रति जवाबदेह है, वो ऊपर का अधिकारी BDO हो सकता है, SDO हो सकता है या SDM हो सकता है (अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग नाम हैं इनका) और इन अधिकारियों की जवाबदेही जिलाधिकारी के प्रति होती है, जिलाधिकारी की जवाबदेही कमिश्नर के प्रति होती है, कमिश्नर की जवाबदेही राज्य के चीफ सेक्रेटरी के प्रति होती है, चीफ सेक्रेटरी की जवाबदेही कैबिनेट सेक्रेटरी के प्रति और कैबिनेट सेक्रेटरी की जवाबदेही किसी के प्रति नहीं, बस किस्सा ख़त्म ।

क्या आप जानते हैं कि भारत का कैबिनेट सेक्रेटरी किसी के प्रति जवाबदेह नहीं होता, क्योंकि अंग्रेज जो कानून बना के गए हैं उसमे यही कहा गया है । अब आप देखिये कि मेरा जो पटवारी है वो BDO /SDO /SDM को खुश करने में लगा रहता है , BDO /SDO /SDM जो हैं वो जिलाधिकारी को खुश करने में लगा रहता है, जिलाधिकारी जो है वो कमिश्नर को खुश करने में लगा रहता है, कमिश्नर चीफ सेक्रेटरी को खुश करने में लगा रहता है, चीफ सेक्रेटरी जो है वो कैबिनेट सेक्रेटरी को खुश करने में लगा रहता है । इन सब को अपने से ऊपर के अधिकारी को खुश करने की चिंता है क्योंकि वो उनकी CR ख़राब कर सकता है, Promotion रुक जायेगा, तबादला हो जायेगा ।
उसको गाँव के लोगों की कोई चिंता नहीं है, गाँव के लोगों के ऊपर अत्याचार करेगा, घूस लेगा, रिश्वत लेगा, क्योंकि वो जानता है कि गाँव वालों के हाथ में कुछ नहीं है, ना वो मेरा CR लिख सकते हैं, ना promotion दे सकते हैं, ना मेरा तबादला कर सकते हैं । सब एक दुसरे को खुश करने में लगे रहते हैं और ये सब मेरे और आपके पैसे से पगार (salary) पा रहे हैं, हमको खुश नहीं रखेंगे, हम और आप उनके पगार के लिए पैसा दे रहे हैं टैक्स के रूप में

(महान राष्ट्रवादी और स्वदेशी आंदोलन के प्रणेता स्व. राजीव दीक्षित द्वारा समय समय पर दिए गए व्याख्यानों के अंश )

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