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क्या आप जानते हैं हिंदुत्व क्या है…?

अगर किसी से हिंदुत्व के बारे में पूछेंगे तो अधिकांश लोग बता नहीं पाएंगे और कुछ इससे राम मंदिर का निर्माण से जोड़ेंगे|

इस आलेख के दो भाग हैं, पहला सावरकर के अनुसार हिंदुत्व का अर्थ जो उन्होंने ने १९२३ में दिया था और दूसरा आज के सन्दर्भ में आठ बिंदुओं में इसका अर्थ|

आखिर हिंदुत्व क्या है?
‘वीर सावरकर’ में धनञ्जय कीर लिखते हैं, “इस विचारधारा के केंद्र में हिन्दू शब्द और हिंदुस्तान इसके भौगोलिक केंद्र हैं| सावरकर के अनुसार हर वो व्यक्ति जो भारत भूमि – सिंधु से समुद्रपर्यन्त- को अपनी पितृभूमि और पुण्य भूमि (अपने धर्म और विश्वास की जन्मभूमि) मानता हो वो हिन्दू है|”

साधारण शब्दों में कहें तो हिंदुत्व ऐसे व्यक्तियों पर आधारित है जिनकी राष्ट्रीयता की पहचान भारत का उनके पितृभूमि और पुण्यभूमि होने से बनती है| सावरकर खिलाफत आंदोलन के विरोधी थे जो एक प्रकार का विश्व व्यापी इस्लामिक आंदोलन था| चुकी भारत उस समय क्रिस्चियन के द्वारा शाषित था और विश्व व्यापी क्रिस्चियन वाद कोई समस्या नहीं थी| इसका भान अभी हाल में हुआ जब बलात्कार के आरोपी बिशप फ्रांको मुकाल को वैटिकन ने कुछ समय के लिए अपने पद से विमुक्त किया और फिर पुनःस्थापित किया|

कीर लिखते हैं की हिदुत्व के अनुयायी वैदिक, बौद्ध, जैन, सिख और समस्त आदिवासी समूह हिन्दू हैं | इसी जीवन केंद्रे के चारो ओर हिंदुत्व घूमता है जिसकी व्याख्या सावरकर ने लोगों के सिर्फ आध्यात्मिक या धार्मिक इतिहास के तौर पे नहीं की बल्कि इतिहास को उसकी पूर्णता में की है| हिन्दू धर्म हिंदुत्व का एक अंश मात्र है| हिंदुत्व हिन्दू समाज के संपूर्ण वांग्मय और सामाजिक – धार्मिक रीतियों को अपनाता है| आज जो इसका स्वरुप हैं वो चार हज़ार वर्षों में गढ़ा गया है | इससे बनाने में नियम निर्माताओं, कवियों, मनीषियों, इतिहासकारों, नायकों के विचारो एवं संघर्षों से बना है|

ये कोई आश्चर्य की बात नहीं की जब शशि थरूर ने लिखा,”सावरकर के लिए हिन्दू होना भारतीय होना है| सावरकर के हिंदुत्व का विचार इतना बृहत् है की इसमें हर वो चीज़ आती है जिसे आज अकादमिक ‘इंडिक’ कहते है|

कीर के अनुसार राष्ट्रीयता ऐसे लोगों का समूह है जो अपने साझा इतिहास, परंपरा, साहित्य और स्वीकार्य एवं अस्वीकार्य का बोध से जुड़े होते है| वो आगे लिखते हैं की इनसब में जो मूल तत्त्व है वो है साझा इतिहास, परंपरा और साथ रहना|

सही और गलत का साझा बोध ही अयोध्या आंदोलन की आत्मा है| भारतीय धर्म को मानाने वाले ऐतिहासिक अत्याचार को मंदिर बनाकर ख़त्म करना चाहते हैं परन्तु भारतीय मुस्लमान इसका विरोध कर रहे हैं|

अतः १९२० से आजतक कुछ नहीं बदला है| बँटवारे के पहले भी हिंदुत्व भारतीय धर्मावलम्बियों को जोड़ने के लिए था और आज भी|

क्या सावरकर अकेले ऐसा सोचने वाले थे?
बिलकुल नहीं| कीर लिखते हैं, “राष्ट्रवाद, मानवतावाद, वैशवादके दृष्टि से सावरकर ने राम, कृष्णा, बुद्धा, महावीर, विक्रमादित्य, प्रताप, गुरुगोविंद सिंह, बाँदा, दयानद और तिलक की धरती को एक अनश्वर सन्देश दिया: हे हिन्दुओं, संगठित हो और हिन्दू राष्ट्रवाद को शक्तिशाली करो, किसी गैर हिन्दू को डराओ मत, किसी को भी संसार में परन्तु तत्काल अपनी धरती और जाति के रक्षा के लिए जुट जाओ, ताकि बाहर से आने वाले वैश्विक विचार धाराओं के आक्रमण से रक्षा हो सके|

सावरकर ये कहना चाहते थे कि हिन्दुओं को अपनी धरती की रक्षा करनी है वैसे लोगों से जो भारत के विपरीत काम कर रहे है| ऐसा करने के लिए वो वैश्विक आंदोलन के भी पक्षधर थे (आज के सन्दर्भ में ये जिहाद हो सकता था उस समय ये वैश्विक-इस्लाम था)| सावरकर कभी भी गैर हिन्दुओं के विरुद्ध नहीं थे|

अयोध्या आंदोलन के समय हिंदुत्व शब्द बहुत प्रचारित होगया था| इसका अर्थ हिन्दुओं का अपने अधिकारों के प्रति जोर देना और अयोध्या में एक भव्य मंदिर निर्माण था|

यह बात समझने की है कि हिन्दू धर्म समय के साथ बदलता रहता है और यह मानवीय विवेक से निर्धारित होता है न की एक व्यक्ति, एक किताब या समय के एक काल खंड से| इस तरह से ये अन्य धर्मो से अलग है|

इस लिए यह अपेक्षित है की इसकी समयायिक व्याख्या की जाय| हिन्दू धर्म एक तार्किक-मानवीय सोच है|

हिंदुत्व=हिन्दुओं के लिए समानाधिकार इससे नीचे समझाया गया है |

एक,
हिन्दू मंदिरों से सरकारी नियंत्रण ख़तम हो और उनका नियंत्रण हिन्दू स्वयं करे| चढ़ावा सरकारी खजाने में जाने के बनिस्पत हिन्दू समाज के कार्यों में लगे वो भी बिना किसी प्रकार के कानूनी रोक के|

दो, चढ़ावा हिन्दुओं के पारम्परिक, शास्त्रीय, धार्मिक ज्ञान के संरक्षण, शिक्षा, गुरुकुलों की स्थापना, मंदिरों के रख रखाव, एवं संगीत, नृत्य इत्यादि को बढ़ावा देने में लगाया जाये|

चढ़ावे के राशि को राष्ट्रीय आपदा के समय भी उपयोग में लाया जा सकता है परतु ऐसे सिर्फ स्वेच्छा से हैं होना चाहिए|

तीन,
हिन्दुओं को अपने शैक्षणिक संस्थानों को चलने की स्वतंत्रता होनी चाहिए, जैसा अन्य धर्मों के साथ है| शिक्षा के अधिकार कानून का सभी शैक्षणिक संस्थानों पे सामान रूप से लागु किया जाए|

चार, विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम में संशोधन कर सिर्फ अप्रवासी भारतीयों और भारतीय मूल के लोगों को ही भारतीय गैर सरकारी संगठनो में दान की अनुमति दी जाये| विदेशी संस्था भारत सरकार से माध्यम से निवेश करसकते हैं|

ऐसा इस लिए क्यों की मुस्लमान और ईसाई पश्चिम एशिया और चर्च से पैसे माँगा सकते हैं और हिन्दू बहुत कमजोर स्थिति मैं हैं|

पांच,
ऐसा कानून बनाया जाये जिससे, विश्व में कहीं भी अगर हिन्दू, बौद्ध, सिख, जैन धर्मावलम्बियों को अगर प्रताड़ित किया जाये तो उन्हें भारत की नागरिकता दी जाये | ऐसा इसलिए क्यों की विश्व में कई देश हैं जहाँ मुस्लमान और ईसाई शरण पासकते हैं|

साथ हैं यह कानून साफ़ शब्दों में ये निर्धारित करे की ऐसा कोई भी मुस्लमान जिसके पूर्वज जिन्होंने १९४७ के समय पाकिस्तान को चुना था या अफ़ग़ानिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, श्रीलंका, म्यांमार, पाकिस्तान में रह रहे हो उन्हें भारत में शरण नहीं दिया जायेगा|

ऐसा इस लिए क्यों की इन देशों के लोगों को अपने देशों की अव्यवस्था से बचने के लिए भारत एक अच्छा विकल्प लगता है| पाकिस्तान एक बेहतरीन उदहारण है|

छह, सरकारी अनुदान के लिए आर्थिक आधार होना चाहिए न की धार्मिक|

सात, चूँकि कश्मीर घाटी के लोगों ने धरा ३७० और ३५ क के हटाने का विरोध किया है इसलिए राज्य को तीन हिस्सों में बाटदेना चाहिए| इन धाराओं को कश्मीर घाटी में लागू रखा जाये परन्तु जम्मू और लदाख से हटा लिया जाये| इससे जम्मू और लदाख के लोगों के आरोप की जनसँख्या की गणना मैं कश्मीर के लोग दोहन करते हैं का भी उत्तर मिल जायेगा|
(मोदी सरकार ने इस मामले में ऐतिहासिक निर्णय ले लिया है)

आठ, बांग्लादेश और पाकिस्तान को होने वाली पशु-तस्करी पे अंकुश लगाने के लिए सख्त कानून लाया जाये और उसपर भारी आर्थिक ढांड भी लगाया जाये|

मंदिर जाना और राम मंदिर हिंदुत्व नहीं है|

अगर कोई राजनेता हिन्दुओं का वोट चाहता है तो एक स्पश्ट निर्धारित कार्य योजना लाये अन्यथा वो लोगों को मूर्ख बना रहा है|

यह आलेख लेखक के अंग्रेजी आलेख का हिंदी अनुवाद है |

साभारः https://www.esamskriti.com/ से

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