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ज्यादा परेड मत कराओ……..

मुख्यमंत्री स्व.भैरो सिंह शेखावत का जयपुर स्थित सरकारी आवास और मेरे शोध प्रबन्ध की प्रकाशित पुस्तक का लोकार्पण मुझे हमेशा स्मृतियों में रहता है। मुख्यमंत्री जी ने एक बड़े से कक्ष में मेरी पुस्तक ” राजस्थान में पुलिस प्रशासन” पुस्तक का 13 अगस्त 1996 को विधिवत लोकार्पण किया। सभी ने पुष्पहार से मुख्यमंत्री जी का स्वागत और अभिनन्दन किया। पुस्तक के बारे में परिचय देने के साथ मैंने लोकार्पण के लिए खूबसूरत कवर में सजी पुस्तक उनके सम्मुख प्रस्तुत की। उन्होंने कवर हटा कर अपने करकमलों से पुस्तक का लोकार्पण किया और विचार व्यक्त कर अपना आशीर्वाद देते हुए प्रेरित किया। उन्होंने पुलिस महानिदेशक को कहा इस उपयोगी किताब को प्रोत्साहित करें। लोकार्पण के सिलसिले में उन्हें चार – पांच बार उठ कर खड़े होना पड़ा तो उन्होंने हंसते हुए कहा ज्यादा परेड मत कराओं। निदेशक महोदय ने मुख्यमंत्री जी का आभार व्यक्त किया।

मेरे पूज्य पिता जी सेवा निवृति पुलिस उप अधीक्षक स्व. चमन लाल, उनके अभिन्न मित्र स्व. विनोद चतुर्वेदी, मेरे शोध प्रबन्ध के मार्ग दर्शक गुरुदेव डॉ.बृज किशोर शर्मा, कनिष्ठ भ्राता श्री प्रमोद कुमार सिंघल, बहन श्रीमती प्रभा गुप्ता, मंत्री श्री रघुवीर सिंह कौशल, श्री मदन दिलावर, निदेशक जनसंपर्क, पुलिस महानिदेशक, मेरे सहयोगी सहायक जन सम्पर्क अधिकारी श्री घनश्याम वर्मा ,प्रकाशक अजय बाकलीवाल सहित जन सम्पर्क विभाग के अन्य अधिकारी लोकार्पण कार्यक्रम के सहभागी और साक्षी बने। उपस्थिति सभी श्रद्धेय जनों ने मुझे इस उपलब्धि पर अपने आशीर्वाद और बधाइयों से आप्लावित कर दिया। कार्यक्रम के पश्चात मुख्यमंत्री की और से दूसरे कक्ष में जलपान का प्रबन्ध किया गया था सो हम सब ने जलपान किया और मुख्यमंत्री जी का आभार व्यक्त कर आवास से बाहर आ गए।

यूं तो कहने में यह साधारण एक पुस्तक का लोकार्पण कार्यक्रम था पर मेरे लिए मुख्यमंत्री जी द्वारा लोकार्पण किए जाने से यह प्रसंग
महत्वपूर्ण था। लोकार्पण के पीछे की कहानी रोचक भी है और मेरे लिए किसी आश्चर्य से कम भी नहीं हैं। मेरा शोध प्रबन्ध पुस्तक के रूप में प्रकाशित होने की मुझे अपार प्रसन्नता थी। साथियों ने कहा कि संभागीय आयुक्त महोदय से लोकार्पण करा लेते हैं। हम इसी जुगत में लग गए और उनसे संपर्क करने से पूर्व मेरे श्वसुर साहब श्रद्धेय बाउजी जो पूर्व विधायक थे उनसे फोन पर बात हो रही थी तब मैंने उनसे इसका जिक्र कर दिया। वह कहने लगे तुमने इतने परिश्रम से पीएच. डी. कर किताब छपाई है ,इसका लोकार्पण मुख्यमंत्री जी से करालो। मै तो उनसे केसे करवा सकता हूं? वह कहने लगे कुछ रुको मै व्यवस्था करता हूं।

राजस्थान के मुख्यमंत्री जी से मेरी पुस्तक का विमोचन, अकल्पनीय था मेरे लिए। सपनों और ख्यालों की दुनिया में गोते लगाने लगा। ईश्वर से प्रार्थना करने लगा काश यह सच हो जाए ! किस्मत को शायद मंजूर था सो कोई दो घंटे बाद बाऊजी का फोन आया और सूचना दी कि मुख्यमंत्री जी ने सहमति प्रदान करदी है। तुम एक किताब ले जा कर उनके सचिव श्री विनोद जुत्सी से मिल कर तारीख और समय तय कर लो। बात करते समय उनकी खुशी का अहसास मुझे हो रहा था कि वे कितने खुश हैं। उन्होंने मुझे सफलता के लिए अग्रिम बधाई दी और मैंने उनका आशीर्वाद प्राप्त किया।

घर में मेरे परिजन एवं मेरा स्टाफ भी खुश और उत्साहित थे। जयपुर जा कर प्रातः की बेला में सचिव जी से उनके आवास पर भेंट की। उनका पहला प्रश्न था किसने कहा मुझसे मिलने के लिए ? जब मैंने मुख्यमंत्री जी का हवाला दिया तो कहा किताब मुझे दे जाओ और 11 बजे मुझ से फोन पर बात कर लेना। मैंने उनका फोन नंबर लिया और साधुवाद ज्ञापित कर जयपुर स्थित अपनी बहन के आवास पर लौट आया। सचिव जी से बात की तो उन्होंने 13 अगस्त को प्रातः 11 बजे मुख्यमंत्री आवास पर पहुंचने को कहा। वहीं लोकार्पण होगा, अपने साथ पांच – सात से अधिक को नहीं लाएं। यह खुशखबरी मैने फोन से अपने पिताजी और श्वसुर साहब को दी। लोकार्पण में एक सप्ताह रह गया था, समय कम था, कार्ड छपा कर निमंत्रण देना था सो उसी दिन बस में बैठ कर कोटा लोट आया।

पुस्तक लोकार्पण की तैयारियों में पूरे उत्साह से जुट गया। कार्यक्रम की स्मृति स्वरूप 30 कार्ड छपवाए। कोटा में अधिकारियों और खास परिचित को निमंत्त्रित किया।। मेरे अभिन्न सहयोगी सहायक जन सम्पर्क अधिकारी श्री घनश्याम वर्मा के साथ एक दिन पूर्व जयपुर पहुंच गया। मेरी बहन के यहां तो उत्सव का माहौल बन गया। हमने जयपुर में कोटा के तीनों मंत्रियों, सचिव और निदेशक महोदय के साथ – साथ मुख्यमंत्री के सलाहकार स्व.के.एल. कोचर साहब और उनके कक्ष में बैठे सभी पत्रकारों को आदर पूर्वक आमंत्रित किया। प्रकाशक महोदय ने कहा खुशी के इस मौके पर मिठाई , पुष्पहार और अथितियो को पुस्तक भेंट करने की व्यवस्था वह अपनी तरफ से करेंगे। लोकार्पण के लिए पुस्तक सज्जा मेरी बहन ने की।

आंखों – आंखों में रात गुजर गई। सुबह कोटा से आने वाले श्रद्धेय जनों के लिए नाश्ते की व्यवस्था की। करीब सुबह के 8 बजे एक टैक्सी से पिताजी सबको लेकर पहुंच गए। पुस्तक की चर्चा के बीच सभी ने नाश्ता किया और घर से रवाना हो कर सभी 10.30 बजे मुख्यमंत्री आवास जा पहुंचे। वहां हमें सम्मान पूर्वक लोकार्पण कक्ष में लेजा कर बैठाया गया। कुछ ही पलों में अन्य अथिति भी पधार गए। खुशनुमा माहौल के बीच मुख्यमंत्री जी ने पुस्तक का लोकार्पण किया। इस कार्यक्रम को जयपुर आकाशवाणी केंद्र से प्रमुखता से प्रसारित किया गया और सभी समाचार पत्रों की सुर्खियां बना। कोटा लौटने पर कई दिनों तक बधाई और शुभकामनाओं का सिलसिला मेरा होंसला बढ़ता रहा। मेरे जीवन का यह चिरस्मरणीय कार्यक्रम बन गया जो रह – रह कर मुझे याद आता है।

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