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डॉ. अच्युत सामंताः एक ऐसा तीर्थ जहाँ शब्द मौन हो जाते हैं और भावनाएँ हिलोरें लेती है

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डॉ. अच्युुत सामंताः हजार हाथों वाला आधुनिक देवता

राष्ट्र और संस्थाओं का निर्माण एक दिन में नहीं …

हमारी भारतीय परंपरा में तीर्थों का बहुत महत्व है और देश भर में ऐसे तीर्थ स्थान हैं जहाँ जाने की इच्छा हर भारतीय की होती है। तीर्थ जाकर पुण्य कमाना कौन नहीं चाहेगा। लेकिन इस देश में जीता जागता हाड़ मांस का एक मनुष्य ऐसा तीर्थ बन गया है जिसने तीर्थों की परिभाषा को सार्थकता प्रदान कर उसे एक नया अर्थ भी दे दिया है। इस देश में धार्मिक तीर्थ तो जगह-जगह पर हैं, मगर डॉ. अच्युत सामंता ने अपने पुरुषार्थ, संकल्प, संघर्ष, ईमानदारी, लगन और जीजिविषा से मंदिरों की नगरी भुवनेश्वर में शिक्षा का एक ऐसा तीर्थ स्थापित कर दिया है जिसको देखने, जानने और समझने के लिए दुनिया भर के शिक्षाविद, राजनेता, समाजशास्त्री और समाज के विभिन्न क्षेत्रों में काम कर रहे लोग आते हैं। जो भी यहाँ आता है वह ये देखकर हैरान रह जाता है कि क्या ये सबकुछ एक आदमी ने किया है। वो भी एक ऐसे आदमी ने, जो भुवनेश्वर से 54 किलोमीटर दूर स्थित कलारबंक जैसे उपेक्षित, पिछड़े और गरीबी से जूझ रहे गाँव में जन्मा, जिसने मात्र 4 साल की उम्र में अपने पिता आनंदी चरण सामंता को खो दिया और जिसकी माँ श्रीमती निर्मला देवी पर सात भाई बहनों को पालने पोसने की महती जिम्मेदारी आ पड़ी हो और जिनके घर में खाने को एक दाना भी न हो। अच्युत सामंता की यह संघर्ष यात्रा किसी परीलोक की काल्पनिक कथा को भी मात कर देती है। डॉ. सामंता द्वारा भुवनेश्वर में स्थापित किट http://kiit.ac.in/ और किस https://kiss.ac.in/ शैक्षणिक संस्थान मात्र नहीं हैं बल्कि शिक्षा के ऐसे तीर्थ हैं जिसकी मिसाल दुनिया में शायद ही कहीं होगी। दुनिया की कोई ऐसी जानी मानी हस्ती नहीं होगी जो डॉ. सामंता के इस कल्पनालोक को देखने नहीं आई होगी। डॉ. सामंता र्जाय सभा सदस्य हैं और उनके पास अज भी किट या किस में न तो कोई चैंबर है न वे वहाँ ठहरते हैं। वे भुवनेश्वर में एक किराए के मकान में रहते हैं और आज भी प्रतिदिन 18 घंटे काम करते हैं।

इस देश में कितने ही राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त राजनेता, उद्योगपति, समाजसेवी से लेकर फिल्म और टीवी की दुनिया के कई सेलीब्रिटी हैं, किसी के परिवार में किसी सदस्य का निधन हो तो दुनिया भर से श्रध्दांजलि संदेश आते हैं। लेकिन यह बात इतिहास में दर्ज करने लायक है कि जब 2 अगस्त, 2016 को डॉ. अच्युत सामंता की पूज्य माताजी का निधन हुआ तो 22 देशों के राजदूतों के साथ ही देश और दुनिया की कई जानी मानी हस्तियाँ इस छोटे से गाँव में उनकी माताजी की अंतिम यात्रा में शामिल होने पहुँची थी।

डॉ. अच्युत सामंता द्वारा स्थापित https://kiss.ac.in/ को दुनिया के सबसे पहले जनजातीय विश्वविद्यालय का दर्जा दिया गया है। क्या कोई कल्पना कर सकता है कि इस विश्वविद्यालय में उड़ीसा के सूदूर क्षेत्रों से लाकर उन आदिवासी बच्चों को केजी से लेकर पीजी तक की शिक्षा, भोजन और आवास निःशुल्क दी जाती है। इस संस्थान में आज 27 हजार आदिवासी बच्चे पढ़ रहे हैं। इस संस्थान में कैसे बच्चे आते हैं अगर आप ये जान लेगें तो आपको पता चलेगा कि शहरी जिंदगी में हर सुख-सुविधा से जीने वाले हम लोगों को अभी पता ही नहीं है कि अभाव और असुविधा क्या होती है। यहाँ जो बच्चे आते हैं, उनके गाँव मुख्य सड़क से इतनी दूर होते हैं कि उनको बस पकड़ने के लिए दो से तीन दिन तक पैदल चलकर आना पड़ता है। डॉ. सामंता की सोच और दरियादिली देखिये कि यहाँ 3 से 5 और 7-8 साल के बच्चों को लाकर उनको इतने सुकूनदायक और पारिवारिक माहौल में रखा जाता है कि उनको अपने घर और माँ-बाप की कमी महसूस नहीं होती। इन बच्चों को ये महसूस ही नहीं होने दिया जाता है कि ये गरीबी की वजह से यहाँ मुफ्त में पढ़ रहे हैं बल्कि उन्हें ये एहसास कराया जाता है कि उनकी वजह से इस संस्थान में रौनक आई है। आज ये बच्चे दुनिया भर में एशियाड, कॉमनवेल्थ, ओलंपिक से लेकर विभिन्न खेल प्रतियोगिताओं में पुरस्कार जीतकर भारत का गौरव भी बढ़ा रहे हैं।

14 साल से बड़े बच्चों को पढ़ाई के साथ साथ कई तरह के काम भी सिखाए जाते हैं और इससे होने वाली कमाई इन बच्चों को ही दे दी जाती है, और जब ये छुट्टियों में घर वापस जाते हैं तो ये पैसे अपने माँ-बाप को दे आते हैं। जिस देश में निजी और सरकारी शिक्षण संस्थान पढ़ाई के नाम पर माँ-बाप से लाखों रु. की ऎफीस वसूलते हैं, उस देश में एक ऐसा आदमी है जो घोर गरीबी में जी रहे एक दो नहीं 27 हजार बच्चों को पढ़ाने के साथ ही होस्टल, भोजन आदि की मुफ्त व्यवस्था करने के बाद उनको पैसे देकर घर भेजता है। पढ़ाने के साथ ही इन बच्चों को पेंटिंग से लेकर खेलकूद और इनकी पारंपरिक कला के क्षेत्र में भी प्रशिक्षित किया जाता है। डॉ. सामंता ने 1992 में मात्र 125 छात्रों से किस की शुरुआत की थी और अब वे चाहते हैं कि आने वाले दस सालों में ओड़िसा के 30 जिलों के साथ ही देश भर में इस संस्थान की शाखाओं के माध्यम से दो लाख और छात्र-छात्राओं को ये सुविधा उपलब्ध कराएंगे। आज हजारों कर्मचारियों, 1800 फैकल्टीज़, 100 शैक्षणिक गतिविधियों और 27 हजार छात्र-छात्राओं से चारों ओर हरियाली और तरह-तरह के फूलों के बगीचों से सुसज्जित, सजा ये शानदार शैक्षणिक परिसर, सुविधाओं, साधनों, अनुशासन और शिक्षा के स्तर में दुनिया के किसी भी शानदार से शानदार संस्थान को मात देता है।

दुनिया के कई प्रतिष्ठित पुरस्कार डॉ. सामंता को मिले हैं, उनको मिले पुरस्कार और ट्राफियाँ देखो तो ऐसा लगता है मानो ट्राफी के किसी शो रुम में दुनिया भर की ट्राफियाँ सजाकर रखी है।

मुंबई से श्री भागवत परिवार के 25 सदस्य डॉ. सामंता के आग्रह पर भुवनेश्वर उनके द्वारा स्थापित दो संस्थानों किट http://kiit.ac.in/ और किस https://kiss.ac.in/ को प्रत्यक्ष देखने के लिए पहुँचे थे। लेकिन वहाँ मुंबई से गए इन अतिथियों को पग-पग पर एक ऐसे अच्युत सामंता के दर्शन हुए कि तीन दिन की यात्रा के बाद हर सदस्य रोमांचित, अचंभित तो था ही जितने समय सभी लोग उनके संस्थानों से लेकर उनके सहयोगियों, कर्मचारियों और उनके कामकाज को देखते हैरान रह जाते। जिस अहोभाव, सहजता, सरलता और तत्परता से सभी लोग अपने काम में लगे थे कि एक मिनट भी व्यर्थ नहीं जाता था। और सबसे आश्चर्य की बात ये थी कि सेवा में लगे सभी लोग साधारण परिवेश के थे, वे किसी पाँच सितारा होटल के कर्मचारियों की तरह कृत्रिम मुस्कराहटों से नहीं बल्कि जीवंत आत्मीयता से हर मेहमान की ऐसे देखभाल कर रहे थे मानो हम उनके ही घर में मेहमान थे। उनके ड्रायवर से लेकर हर कर्मचारी की कर्तव्यवपरायणता और निष्ठा ने हमें अतिथि देवो भवः के भाव से ऐसा सराबोर किया कि हम हर जगह, हर क्षण चमत्कृत होते रहे।

किट http://kiit.ac.in/ और किस https://kiss.ac.in/ के विशाल साम्राज्य को देखने के बाद जब श्री भागवत परिवार के सभी सदस्यों का सम्मान किया गया तो श्री भावगवत परिवार के समन्वयक श्री वीरेन्द्र याज्ञिक ने कहा, यहाँ जो देखा और जो महसूस किया वह वह शब्दों में तो हा ही नहीं जा सकता। आँखें देख सकती है मगर बोल नहीं सकती, ह्रदय कृतज्ञता, अहोभाव और प्रेम से भरा है मगर वह बोल नहीं सकता। एक अकेला आदमी इतना कुछ करके दिखा सकता है, यह कल्पना से भी परे है। हमारा जीवन तभी सार्थक होगा जब हम लोग आपने जो किया है उसका एक छोटा सा अंश भी अपने जीवन में कर पाएँ। हम लोगों ने भगवान को तो नहीं देखा, अच्युत सामंता को देखकर लगता है कि भगवान तो इनके जैसा ही होता होगा। याज्ञिकजी ने कहा कि हम आपके आगे अपने आपको बौना महसूस कर रहे हैं, क्योंकि आपने घोर गरीबी से निकलकर लाखों बच्चों का जीवन सांवर दिया और हम साधन संपन्नता के बीच जीकर भी शायद समाज के लिए वो नहीं कर पाए जो हमें करना चाहिए। उन्होंने कहा कि किट http://kiit.ac.in/ और किस https://kiss.ac.in/ के ये 23 कैंपस यहाँ के ऐसे 23 तीर्थ हैं जिनका पूरी दुनिया में कोई सानी नहीं।

श्री भागवत परिवार के ही सदस्य सुनील सिंघल जो हर मौके पर मंच पर जाने से घबराते हैं, खुद माईक पर आए और कहा कि यहाँ आकर मुझे ऐसा लग रहा है कि हमें अपने जीवन जीने का तरीका बदलना पड़ेगा। असली जीवन तो डॉ. सामंता जी रहे हैं, और हम जीवन को जैसे तैसे ढो रहे हैं। हमें परिवार के साथ ही समाज के लिए भी जीना सीखना पड़ेगा। यही हालत श्री भागवत परिवार के सभी सदस्यों की थी, उन्हें समझ में ही नहीं आ रहा था कि वे किसी कल्पनालोक में हैं या अपनी आँखों से ये सब देख रहे हैं।

श्री भागवत परिवार के अध्यक्ष श्री एसपी गोयल ने कहा कि ये संस्थान शिक्षा के ही मंदिर नहीं हैं बल्कि कॉर्पोरेट जगत के लिए भी एक उदाहरण है कि समाज को बनाने और वंचितों को ऊपर लाने के लिए किसी व्यक्ति या उद्योगपति की सोच क्या होना चाहिए।

इस अवसर पर संस्थान की छात्राओ सुहानी महापात्र और पल्लवी ने ओड़िसी नृत्य प्रस्तुत कर सभी अतिथियों का स्वागत किया।

डॉ. सामंता ने अपने गाँव कलारबंक http://kalarabankamodelvillage.org/ को उस दौर में स्मार्ट विलेज में बदल दिया जब सरकारों में बैठे लोगों ने स्मार्ट विलेज का नाम भी नहीं सुना होगा।

कलारबंक देश का पहला स्मार्ट विलेज है और यहाँ हाई स्कूल, बैंक, एटीएम, डाकघर, डॉ. सामंता द्वारा शुरु किया गया कलिंगा अंग्रेजी माध्यम स्कूल जिसमें छात्रावास की सुविधा भी है। स्कूल जब से शुरु हुआ है तब से ही यहाँ का 10वीं और 12वीं का सेंट्र्ल बोर्ड का परिणाम शत प्रतिशत आ रहा है। एक सर्वसुविधायुक्त अस्पताल, जिसमें 2 हजार मरीजों का स्वास्थ्य परीक्षण किया जाता है। टेली मेडिसिन की सुविधा यानी मरीज की बीमारी को लेकर दुनिया के बेहतरीन डॉक्टरों से तत्काल संपर्क, लायब्रेरी, उद्यान, बच्चों के लिए अलग से उद्यान, पेयजल परियोजना, आम लोगों के लिए सरकारों ने क्या सुविधाएँ उपलब्ध कराई है उनकी जानकारी देना वाला सुविधा केंद्र, कम्युनिटी हाल, कैंटीन, महिलाओं के लिए समिति, ग्राम समिति, मंदिर परिसर जिसमें माँ दुर्गा, माँ लक्ष्मी, माँ काली माँ चण्डी, श्री कार्तिकेश्वर, श्री रघुनाथजी और संकटमोचक हनुमानजी के मंदिर हैं। हनुमानजी के मंदिर में सामंता जी के गुरू पूज्य बाबा रामनारायणदासजी बच्चों के साथ बैठकर हनुमान चालीसा का पाठ करते हैं। गाँव में दशहरा, काली पूजा, रामनवमी, हनुमान जयंती जैसे त्यौहार विशेष रूप से मनाए जाते हैं। बच्चों के लिए खेलकूद प्रतियोगिताओं का भी आयोजन किया जाता है। श्री भागवत परिवार के गाँव में पहुँचने पर सामंता जी के बड़े भाई अंतरयामी सामंता, उनकी बहन इति सामंता सहित परिवार के सभी लोगों ने जिस अहोभाव से स्वागत सत्कार कर भोजन करवाया उसे भूल पाना मुश्किल है। परिवार के लोग गाँव के लोगों से इतने घुले मिले हैं कि वे उनको ये एहसास ही नहीं होने देते हैं कि इस गाँव में जो भी कुछ हुआ है डॉ. सामंता की वजह से हुआ है।

वाकई इस देश को अगर बुनियादी रूप से बदलना है तो इसे भ्रष्ट नेताओं, अफसरों, मंत्रियों और सत्ता के दलालों की नहीं डॉ. अच्युत सामंता जैसे कर्मयोगी और दूरदृष्टा लोगों की ज़रुरत है जिनका संकल्प और ध्येय तो पवित्र है और वह लोगों के जीवन को बदलता ही नहीं है बल्कि पूरे समाज को आंदोलित करता है।

डॉ. सामंता के बारे में यही कहा जा सकता है कि जहाँ हमारी सोच खत्म होती है उसके बहुत आगे से उनका काम शुरु हो जाता है।



2 टिप्पणियाँ
 

  • Deepak Mahaan

    जुलाई 11, 2018 - 10:53 pm Reply

    Aise adbhut vyakti ko mera naman!

  • लवकेश जैन

    जुलाई 12, 2018 - 12:35 am Reply

    दरअसल सरल होना जितना कठिन है उतना ही कठिन है सहज होना, जीवन के टेढ़े मेढे और उतार चढ़ाव रास्तों में अपनी ऋजुता को बनाये रखने हेतु लकीर से बिंदु होना पड़ता है और इसी बिंदु होने की प्रक्रिया में जिसने स्वयं को पूर्णतः समर्पित कर दिया उनका नाम है डॉ अच्युत सामंता।
    “अप्रितम भारत ” के विमोचन समारोह में मुम्बई में डॉ सामंता को प्रत्यक्ष मिलने और सुनने का सौभाग्य मुझे मिला , स्वयं को धन्य मानता हूं।
    लवकेश जैन
    नविमुम्बई

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