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डॉ. सुभाष चंद्रा का व्यक्तित्व संघर्ष, प्रेरणा और दूरदृष्टि का प्रतीक

ज़ी नेटवर्क व एस्सेल समूह के अध्यक्ष एवँ राज्य सभा सदस्य डॉ. सुभाष चंद्रा ने कहा कि मुंबई एक ऐसा शहर है जहाँ लोग सपने पूरे करने आते हैं, मैं भी अपने सपने पूरे करने आया था और मुझे खुशी है इस शहर ने मुझे वह सब-कुछ दिया जो मैने सोचा था।

डॉ. सुभाष चंद्रा की जीवनी पर आधारित अंग्रेजी पुस्तक ‘द ज़ेड फैक्टरः माय जर्नी एज़ द राँग मैन एट द राईट टाईम’ के मराठी संस्करण के विमोचन के अपसर पर आयोजित एक शानदार समारोह को संबोधित करते हुए डॉ. चंद्रा ने कहा कि तमाम खट्टे मीठे अनुभव के बाद भी मैने हार नहीं मानी और अपना काम करता रहा। उन्होंने कहा कि जब मुंबई में मैने देश का सबसे पहला एम्युजमेंट पार्क एस्सेल वर्ल्ड बनाया तो तत्कालीन शरद पवार सरकार ने इस पर 150 प्रतिशत मनोरंजन कर लगा दिया। डॉ. चंद्रा ने कहा कि मैने थाणे जिले में एस्सेल पैकेजिंग के माध्यम से महाराष्ट्र में अपना पहला उद्योग लगाया था और आज हम चारों भाई मिलकर जो उद्योग चला रहे हैं उसमें देश भर में 40 हजार लोगों को रोज़गार दिया है जिसमें 26 हजार महाराष्ट्र के हैं। हम आज भी इसी संकल्प के साथ काम करते हैं कि जो भी काम करें वो श्रेष्ठतम हो।
इस मौके पर डॉ. चंद्रा ने स्वालंबन की वकालत की। उन्होंने कहा कि अगर हमारा राजनीतिक तंत्र लोगों को सब्सिडी देकर सरकार के ऊपर निर्भर बनाने की जगह उन्हें स्वावलंबी बनाने का काम करे तो हम भारत का एक बेहतर भविष्य देख सकेंगे। डॉ. चंद्रा ने कहा कि 70 प्रतिशत मार्केट शेयर के साथ जी नेटवर्क महाराष्ट्र में नंबर वन है।

डॉ. चंद्रा ने समारोह में मौजूद मुख्य मंत्री श्री देवेंद्र फड़णवीस पर चुटकी लेते हुए कहा कि वो हमसे शराफत से पेश आ रहे हैं इसलिए हम भी उनके साथ शराफत का व्यवहार कर रहे हैं।

इसके साथ ही उन्होंने श्री शरद पवार द्वारा कुछ घटनाओँ का उल्लेख करने पर चुटकी लेते हुए कहा कि पवार साहब की बातों से लगता है कि मुझे ऐसी घटनाओँ को लेकर कई किताबें लिखनी पड़ेगी।

इस अवसर पर डॉ. चंद्रा ने महाराष्ट्र में 3700 लायब्रेरी चलाने वाले एक एनजीओ को अपनी पुस्तक की 3700 प्रतियाँ देने की घोषणा भी की।

डॉ. चंद्रा ने कहा कि जब मेरे पूज्य पिताजी ने कहा कि तुमने जो भी हासिल किया है उस अनुभव को देश के लोगों के साथ साझा करो तो मैने डीएससी शो के माध्यम से युवकों से संवाद शुरु किया ताकि उनकी जिज्ञासाओं, सपनों और मुश्किलों को लेकर उनसे सीधी बात कर सकूँ।

डॉ. चंद्रा ने कहा कि मैने अपनी पुस्तक में जिन लोगों के बारे में आलोचनात्मक टिप्पणियाँ की हैं वो उस समय की सच्चाई थी, और उसे बदला नहीं जा सकता, लेकिन मेरे मन में किसी के प्रति कोई कड़ुवाहट नहीं है।

इस अवसर पर उपस्थित केंद्रीय सड़क परिहन एवँ जहाज रानी मंत्री श्री नीतिन गड़करी ने कहा कि मैं सुभाषजी को 30 साल से जानता हूँ। एक बार जब मुझे लगा कि एक प्रोजेक्ट में इनको 250 करोड का घाटा हो सकता है तो मैने इन्हें सलाह दी कि वे इस प्रोजेक्ट में हाथ न लगाएं, लेकिन धुन के पक्के डॉ. चंद्रा ने मुझसे कहा, जो काम मैने हाथ में ले लिया उसे पूरा करुंगा इसमें अब घाटा हो या नफा॑; और इसी संकल्प का नतीजा है कि डॉ. चंद्रा ने देश में 20 हजार किलोमीटर सड़क का निर्माण किया है।
उन्होंने कहा कि जब सुभाषजी ने एस्सेल वर्ल्ड का काम शुरु किया तो इनको चारों तरफ से विरोध झेलना पड़ा मगर इन्होंने हार नहीं मानी और किसी के आगे नहीं झुके। महापालिका ने इनको पानी नहीं दिया, बिजली वालों ने इनको बिजली नहीं दी मगर इन्होंने एस्सेल वर्ल्ड बनाकर दिखाया। श्री गड़करी ने कहा कि जब सुभाष जी हरियाणा से राज्य सभा के लिए चुनाव लड़ रहे थे तो मैने इनसे कहा कि आप चुनाव हार जाओगे अपना नाम वापस ले लो। मुझे मोदीजी ने भी कहा कि सुभाष जी को ये चुनाव नहीं लड़ना चाहिए, वे हार जाएंगे, लेकिन सुभाष जी तो किसी बाजीगर की तरह हर चुनौती को परास्त कर आगे बढ़ जाते हैं। श्री गड़करी ने कहा कि सुभाष जी जैसी हिम्मत अगर देश का हर युवा करने लगे तो देश नई उँचाइयाँ छू सकता है।

महाराष्ट्र के मुख्य मंत्री श्री देवेंद्र फड़णवीस ने कहा कि एक सामान्य आदमी असामान्य कैसे कर सकता है सुभाष जी की ये किताब एक शानदार उदाहरण है। मात्र 17 रु. लेकर ये हिसार से दिल्ली गए थे और आज इतने बड़े साम्राज्य के मालिक हैं। उन्होंने कहा कि सुभाषजी की जिद का ही नतीजा था कि सरकार को भी अपने नियम बदलने पड़े। सुभाष जी ने हर क्षेत्र में एक नया रास्ता बनाया और उसमें सफल भी हुए। पाकिस्तान में फौजी हुकुमत के साये में चुनाव हुए और नवाज शरीफ चुनाव लड़ रहे थे तो ज़ी टीवी की वजह से ही वहाँ एक लोकतांत्रिक सरकार बन पाई। श्री फड़णवीस ने कहा कि सुभाषजी ने अपनी पुस्तक में अपनी सफलता के साथ ही अपनी असफलताओं की भी विस्तार से चर्चा कर इस पुस्तक की विश्वसनीयता बढ़ा दी है।
इस अवसर पर महाराष्ट्र के पूर्व मुख्य मंत्री व एनसीपी नेता श्री शरद पवार ने कहा कि जब मैं महाराष्ट्र का मुख्य मंत्री था तो दिल्ली के कुछ मित्रों की वजह से सुभाष जी से मेरा परिचय हुआ था। तब किसी ने मुझे ये भी कहा था कि इनसे दूर रहो, ये धीरेंद्र ब्रह्मचारी के दोस्त हैं। लेकिन जब इनकी पुस्तक पढ़ी तो इनके व्यक्तित्व की खूबियों की ज्यादा जानकारी मिली। श्री पवार ने कहा कि जब मैं बीसीसीआई का अध्यक्ष था तो ये मेरे सामने आईपीएल का प्रस्ताव लेकर आए थे लेकिन ललित मोदी ने इनके आईडिये को पर आईपीएल शुरु कर दी। इसके बाद इन्होंने हार नहीं मानी और आईसीएल शुरु की। जो व्यक्ति दुनिया के मीडिया के दिग्गज रुपर्ट मर्डोक के सामने खड़े होकर अपने चैनल को दुनिया भर में पहुँचा सकता है उसकी क्षमताओं को किसी को कम करके नहीं आँकना चाहिए। श्री पवार ने कहा कि वे राज्य सभा में भी अपने दम पर ही पहुँचे।

महाराष्ट्र के पूर्व मुख्य मंत्री श्री पृथ्वीराज चव्हाण ने कहा कि सुभाष जी का जीवन सबके लिए एक प्रेरणास्त्रोत है। मराठी युवकों को ये पुसल्तक जरुर पढ़ना चाहिए ताकि वो उनके संघर्ष और हौसले से प्रेरणा ले सकें। एक आदमी इतनी समस्याओँ से जूझते हुए भी सफलता के ऐसे कीर्तिमान स्थापित कर सकता है यह जानना अपने आप में बहुत रोमांचक है।

पुस्तक के कुछ अंशः

यह 14 दिसंबर 1991 की बात है, जब मैं एंबिएंस विज्ञापन एजेंसी के अशोक कुरियन के साथ हाँगकाँग में स्टार टीवी के ऑफिस में गया। वहाँ 10 से 12 वरिष्ठ और जूनियर अधिकारी व कर्मचारी बैठे थे। स्टार टीवी के प्रमुख रिचर्ड ली वहाँ नहीं थे, तो हम उनका इंतजार करने लगे। ऐसा लग रहा था मानो हम यहाँ किसी ऐसे राजा का इंतजार कर रहे थे जो आएगा और हमें आशीर्वाद देगा।

तभी अचानक रिचर्ड का आना हुआ और वो मेरे सामने बैठ गए, और कहा, ओके इंडियन चैनल…हिन्दी चैनल…लेकिन भारत में इसके लिए पैसा कहाँ है?रिचर्ड का रवैया बेहद उखड़ा हुआ था। उन्होंने कहा, किसी संयुक्त उपक्रम में मेरी कोई इच्छा नहीं है। मुझे ऐसा लगा कि रिचर्ड ने पहले से ही इसके लिए अपना दिमाग बना लिया था कि ये प्रोजेक्ट किसी काम का नहीं है।

तो फिर मैने सीधे उनसे कहा, मिस्टर रिचर्ड ली अगर आप संयुक्त उपक्रम में रुचि नहीं रखते हैं तो क्या आप हमें सैटेलाईट (ट्रांसपोंडर) लीज पर दे सकते हैं?

इस पर ली ने कहा, कोई भी ट्रांसपोंडर 5 मिलियन प्रतिवर्ष से कम पर उपलब्ध नहीं है। मुझे इससे दूर रखने के लिए ये उनकी गर्वोक्ति थी।

मैने भी देर नहीं की और कहा, कोई बात नहीं, मैं आपको हर साल 5 मिलियन डॉलर दूंगा। यह फैसला मैने तत्क्षण किया था, मुझे इसके संभावित परिणामों के बारे में कुछ पता नहीं था।



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