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राजस्थानी मायड़ भाषा को मान्यता के लिए समर्पित शख्शियत डॉ. गजेसिंह राजपुरोहित .

राजस्थान में जोधपुर निवासी डॉ. गजेसिंह राजपुरोहित राजस्थान के साहित्य जगत में ख्यातनाम कवि और आलोचक के रूप में अपनी विशिष्ठ पहचान बनाते हैं। आपके साहित्यिक विचारों को सुनने और समझने का अवसर पिछले दिनों उस समय मिला जब आपको कोटा में ज्ञान भारती संस्थान द्वारा राज्य स्तरीय प्रतिष्ठित ” गौरीशंकर कमलेश स्मृति भाषा-साहित्य पुरस्कार 2022″ से सम्मानित किया गया। यह पुरस्कार आपको आपकी “राजस्थानी साहित्य री सौरम , आलोचना – 2020 ” कृति के लिए प्रदान किया गया।

आप राजस्थानी भाषा की मान्यता के लिए पिछले 25 वर्षों से सदैव चिंतित और प्रयास रत हैं। इसके अंतर्गत आपके नेतृत्व में युवाओं का जुड़ाव बहुत सराहनीय एवं सकारात्मक रहा है। मान्यता के लिए किए जा रहे प्रयासों की चर्चा कर बताया कि सब कुछ ठीक चलता रहा तो अच्छी खबर निकट भविष्य में सुनने को मिलेगी। आपका आभा मंडल काफी विस्तृत है। अनेक पुस्तकों के लेखक और संपादक डाॅ. राजपुरोहित ने आज तक 10 अंतरराष्ट्रीय तथा 35 से अधिक राष्ट्रीय संगोष्ठियों में अलग अलग साहित्यिक विषयों पर शोध-पत्र प्रस्तुत कर चुके हैं । ये शोध-पत्र राजस्थानी भाषा-साहित्य की पत्र- पत्रिकाओं में निरंतर प्रकाशित भी होते रहे हैं । कोराना काल के दरम्यान राजस्थानी भाषा साहित्य से संबंधित अनेक राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय वेबिनारों में अपने आलोचनात्मक शोध पत्रों का ऑनलाइन वाचन कर साहित्य जगत में नये आयाम स्थापित किये। राजस्थानी विभाग में कई शोधार्थियों ने इनके निर्देशन में महत्वपूर्ण शोध कार्य कर डाॅक्टरेट ( पीएच-डी ) की उपाधि प्राप्त की तथा अनेक शोधार्थी वर्तमान मे शोध कार्य कर रहे हैं।

कृतियां : प्रतिष्ठित कवि-आलोचक
राजपुरोहित की अब तक सात कृतियां प्रकाशित हो चुकी हैं और इतनी कृतियों का ही आप संपादन कर चुके हैं। प्रकाशित कृतियां में
जस रा आखर ( राजस्थानी काव्य – 2006 ), 
राजहंस ( साहित्य शोध ग्रंथ – 2008 ),  
आत्मदर्शन ( स्मृति ग्रंथ – 2010 ), 
राजपुरोहित: आदिकाल से आज लग ( शोध ग्रंथ – 2018 ), पळकती प्रीत ( राजस्थानी काव्य – 2020 ), राजस्थानी साहित्य री सौरम ( आलोचना – 2020 ) और ऊमरदान लाळस ( राजस्थानी विनिबंध 2021 – साहित्य अकादेमी नई दिल्ली ) उल्लेखनीय हैं। संपादित कृतियों में सुजा शतक ( वीरांगना सुजा – 2007 ), अंजस ( राजस्थानी शोध – 2015 ), साहित्य-सुजस ( 12वीं मा.शि. बोर्ड राजस्थान – 2017 ), अंजस रा आखर ( 10वीं राज.स्टेट ओ. स्कूल – 2017 ), वीर दुर्गादास राठौड़ ( ओळखाण – 2018 ), परिसर ( ज.ना.वि.वि. समाचार पत्र – 2018 ) और राजस्थानी लोक देवी देवता : परम्परा अर साहित्यिक दीठ, ( शोध ग्रंथ 2022 ) , राजस्थानी ग्रंथागार जोधपुर शामिल हैं। हाॅल ही में ‘ राजस्थानी लोक देवी- देवता : परम्परा अर साहित्यिक दीठ ‘ नाम से एक महत्वपूर्ण शोध पुस्तक का संपादन किया जिसमें चालीस से अधिक राजस्थानी विद्वानों एवं शोधार्थियों के शोध पत्र सम्मिलित हैं।

सम्मान : आपको को राजस्थानी भाषा – साहित्य की उल्लेखनीय सेवाओं के लिए वीर दुर्गादास राठौड़ स्मृति समिति जोधपुर द्वारा वीरवर दुर्गादास राठौड़ अवार्ड 2004, राजमाता साहिबा श्रीमती कृष्णा कुमारीजी मारवाड़-जोधपुर द्वारा सिरोपाव सम्मान 2008, श्रीआत्मधाम ट्रस्ट, बाड़वा, पाली द्वारा स्वामी आत्मानन्द सरस्वती साहित्य पुरस्कार 2008, महाराजा मानसिंह पुस्तक प्रकाश मेहरानगढ, जोधपुर द्वारा राजस्थानी भाषा – साहित्य सेवा सम्मान 2019, ( महाराजा श्री गजसिंह जी साहब मारवाड़ – जोधपुर एवं राजस्थान के मुख्यमंत्री श्री अशोक जी गहलोत द्वारा ) तथा राजस्थानी प्रेमाख्यानों पर सृजित प्रबंध काव्य ‘पळकती प्रीत’ पर सिटिजन्स सोसायटी फाॅर एज्यूकेशन, जोधपुर द्वारा डाॅ.नृसिंह राजपुरोहित राजस्थानी साहित्य पुरस्कार 2020 तथा ज्ञान भारती संस्थान कोटा द्वारा प्रदत्त राज्य स्तरीय प्रतिष्ठित ‘ गौरीशंकर कमलेश स्मृति भाषा-साहित्य पुरस्कार 2022 से सम्मानित किया जाना आपके साहित्य सृजन की गहराई और लोकप्रियता का प्रमाण है।

परिचय : प्रतिष्ठित कवि और आलोचक
डॉ. गजेसिंह राजपुरोहित का जन्म 14 जून 1974 को राजस्थान प्रदेश के पाली जिला अंतर्गत निम्बोल गांव में हुआ । गांव में ही प्राथमिक शिक्षा के पश्चात सनातन धर्म राजकीय महाविद्यालय ब्यावर से स्नातक तथा जेएनवीयू जोधपुर से राजस्थानी साहित्य में एम.ए. तथा राजस्थानी भाषा में उपन्यास साहित्य पर डाॅक्टरेट ( पीएच- डी.) की उपाधि प्राप्त की । राजस्थान दूरदर्शन जयपुर एवं आकाशवाणी केन्द्र, जोधपुर से पिछले कई वर्षों से इनका राजस्थानी काव्यपाठ, परिचर्चा और विशिष्ठ आलेखों का प्रसारण होता रहा है । साथ ही राजस्थानी पत्र पत्रिकाओं में आपके महत्वपूर्ण आलेख तथा साहित्यिक शोध पत्र निरंतर प्रकाशित होते रहे हैं । आप कई सामाजिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक एवं शैक्षणिक संस्थाओं से सक्रिय रूप से जुड़े हुए हैं । ज.ना.वि.वि. की कई अकादमिक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक समितियों में सक्रिय भागीदारी निभा रहे हैं । इसके अंतर्गत राजस्थानी संस्कृति प्रकोष्ठ में संयोजक तथा एनएसएस कार्यक्रम अधिकारी के रूप में दी गई सेवाएं अपने आप में बहुत ही महत्वपूर्ण और सराहनीय है। जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय के राजस्थानी विभाग में प्रोफेसर (डॉ.) अर्जुनदेव चारण के सेवानिवृत्त होने पर डाॅ. गजेसिंह राजपुरोहित को विभागाध्यक्ष की जिम्मेदारी मिली थी, तब अपने कार्यकाल के दौरान डाॅ. राजपुरोहित ने राजस्थानी विभाग में अपनी महत्वपूर्ण सेवाएं दी ।वर्तमान में आप जय नारायण व्यास विश्वविद्यालय के राजस्थानी विभाग में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर एवं बाबा रामदेव शोधपीठ में निदेशक के रूप में सेवारत हैं ।
संपर्क सूत्र मो.9460924400
प्रस्तुति : डॉ.प्रभात कुमार सिंघल
लेखक एवं पत्रकार, कोटा

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