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हिंदी के अनोखे शोध शिल्पी डॉ. कामिल बुल्के

भारत का गौरवपूर्ण इतिहास जिन ग्रंथों में आज भी सुरक्षित है, उनमें रामायण और महाभारत मुख्य हैं। जितना प्राचीन यह देश है उतना ही प्राचीन और विस्तृत इस देश का साहित्य और यहाँ का सांस्कृतिक वैभव है। सहज भाव से समझा जा सकता है कि जिन दो महापुरुषों के जीवन ने भारत के इतिहास, संस्कृति, साहित्य और उसकी परम्पराओं को सबसे अधिक प्रभावित किया है, वे थे मर्यादा पुरुषोत्तम राम और योगेश्वर कृष्ण।

राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त जी ने तो जैसे घोषित ही कर दिया –

राम तुम्हारा वृत्त स्वयं ही काव्य है
कोई कवि बन जाए सहज सम्भाव्य है

विदेशों में भी रामकथा के लेखक और अध्येता रहे हैं और अब भी हैं, किन्तु उनमें जिस राममय जीवन के धनी विद्वान का नाम अत्यंत सम्मानपूर्वक लिया जाता है, वे हैं फादर कामिल बुल्के, जिनके लिए राम के प्रभाव से ही, रामकथा का लेखक होना भी जैसे सहज सम्भाव्य था। उन्होंने उससे भी आगे असंभव को भी संभव कर दिखाया। क्योंकि पुराने समय में भारत यात्रा पर आये विश्व के अनेक विद्वानों में फादर कामिल बुल्के ही ऐसे थे जो भारत आए तो यहीं के हो गए और हिन्दी के लिए वह काम कर गए, जो शायद तब कोई भारतीय भी नहीं कर सकता था। डॉ कामिल बुल्के बेल्जियम से आये और भारत में कार्य करना उन्हें इतना प्रेरणादायक लगा कि वे भारत में ही बस गए। स्मरणीय है कि आरंभिक जीवन में उन्होंने दार्जिलिंग के एक स्कूल में गणित पढ़ाते हुए खड़ी बोली, ब्रज और अवधी सीखी। सन् 1938 में सीतागढ़, हजारीबाग में पंडित बदरीदत्त शास्त्री से हिंदी और संस्कृत सीखी। सन् 1940 में प्रयाग से विशारद की परीक्षा पास की और फिर सन् 1942-44 में उन्होंने कोलकाता विश्वविद्यालय से संस्कृत में एम.ए किया।

डॉ. बुल्के ने लिखा है,”मैं जब 1935 में भारत आया तो अचंभित और दुखी हुआ। मैंने महसूस किया कि यहाँ पर बहुत से पढ़े-लिखे लोग भी अपनी सांस्कृतिक परंपराओं के प्रति जागरूक नहीं हैं। यह भी देखा कि लोग अँगरेजी बोलकर गर्व का अनुभव करते हैं। तब मैंने निश्चय किया कि आम लोगों की इस भाषा में महारत हासिल करूँगा।” उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय से संस्कृत में मास्टर्स डिग्री हासिल की।भारतीय संस्कृति एवं साहित्य के अध्ययन की गहनता को और अधिक गहनतम करने के लिए उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से सन् 1949 में ‘रामकथा’ पर डी.फिल. किया। बाद में तुलसी दास के रामचरित मानस का गहन अध्ययन कर, सन् 1950 में उन्होंने ‘राम कथा की उत्पत्ति और विकास’ पर पी.एचडी. की।

डॉ. कामिल बुल्के कभी-कभी धार्मिक ग्रंथों का गहराई से अध्ययन के लिए दार्जीलिंग में रुकते थे। उनके पास दर्शन का गहरा ज्ञान तो था, लेकिन वे भारतीय दर्शन और साहित्य का व्यवस्थित अध्ययन करना चाहते थे। इसी दौरान उनका साक्षात्कार तुलसीदास की रामचरित मानस से हुआ। रामचरित मानस ने उन्हें बहुत अधिक प्रभावित किया। उन्होंने इसका गहराई से अध्ययन किया। इस ग्रंथ की अनिर्वचनीय काव्यात्मक उत्कृष्टता के कारण वे इस ग्रंथ की पूजा करने लगे। उन्हें इसमें नैतिक और व्यावहारिक बातों का चित्ताकर्षक समन्वय देखने को मिला। उनकी यह थीसिस भारत सहित पूरे विश्व में प्रकाशित हुई जिसके बाद सारी दुनिया बुल्के को जानने लगी।

जिस समय फादर बुल्के इलाहाबाद में शोध कर रहे थे, उस समय यह नियम था कि सभी विषयों में शोध प्रबंध केवल अँगरेजी में ही प्रस्तुत किए जा सकते हैं। फादर बुल्के के लिए अँगरेजी में यह कार्य अधिक आसान होता पर यह उनके हिन्दी स्वाभिमान के खिलाफ था। उन्होंने आग्रह किया कि उन्हें हिन्दी में शोध प्रबंध प्रस्तुत करने की अनुमति दी जाए। इसके लिए शोध संबंधी नियमावली में परिवर्तन किया गया। वे ‘यामिनी’ और ‘दीप शिखा’ की रचयिता कवयित्री ‘महादेवी वर्मा’ का इसीलिए विशेष आदर करते थे क्योंकि वे अंग्रेजी में प्रवीण होते हुए भी, उनसे सदा अपनी मातृ भाषा में संवाद करती थीं। महादेवी वर्मा पर एक संस्मरण लिखते हुए डा. कामिल बुल्के एक जगह कहते हैं, ‘‘अंग्रेजी भाषा के कारण ही राजनीतिक परतंत्रता के साथ भारतीयों में मानसिक दासता भी आ गई है।’’

प्राचीन भारत के समान ही आधुनिक यूरोप ज्ञान सम्बन्धी खोज के क्षेत्र में अग्रसर रहा है। यूरोपीय विद्वान ज्ञान तथा विज्ञान के रहस्यों के उद्घाटन में निरंतर यत्नशील रहे हैं। उनकी इस खोज क्षेत्र यूरोप तक ही सीमित नहीं रहा बल्कि संसार के समस्त भागों पर उनकी दृष्टि पड़ी। इस महत्त्वपूर्ण ग्रंथ के लेखक फादर बुल्के को हम इन्हीं विद्याव्यसनी यूरोपीय अन्वेषकों की श्रेणी में रख सकते हैं। भारतीय विचारधारा समझने के लिए इन्होंने संस्कृत तथा हिन्दी भाषा और साहित्य का पूर्ण परिश्रम के साथ अध्ययन किया। उनकी रामकथा की बड़ी विशिष्ट यह है कि उन्होंने रामकथा से सम्बन्ध रखने वाली किसी भी सामग्री को छोड़ा नहीं है।

डा. कामिल बुल्के लैटिन, ग्रीक, फ्रेंच , फ्लेमिश , अंग्रेजी, हिंदी, संस्कृत जैसी विश्व की कई भाषाओं के ज्ञाता थे। गहन खोज, शोध, अध्ययन और मीमांसा आदि उनकी विशेषताएं थीं। डा. कामिल बुल्के एक लंबे समय तक रांची के सेंट जेवियर्स कालेज में संस्कृत तथा हिंदी के विभागाध्यक्ष रहे। डा.बुल्के का अपने समय के हिंदी भाषा के सभी चोटी के विद्वानों से संपर्क था। डा. धर्मवीर भारती, डा. जगदीश गुप्त, डा. रामस्वरूप, डा. रघुवंश, महादेवी वर्मा आदि से उनका विचार-विमर्श और संवाद होता रहता था। महादेवी वर्मा को वे बहन मानते थे। बुल्के जी अपने समय के प्रति सजग एवं सचेत थे। गोस्वामी तुलसीदास की राम भक्ति के सात्विक और आध्यात्मिक आयाम के प्रति उनके मन में बहुत आदर था। उनका कहना था, ‘‘जब मैं अपने जीवन पर विचार करता हूं, तो मुझे लगता है ईसा, हिंदी और तुलसीदास- ये वास्तव में मेरी साधना के तीन प्रमुख घटक हैं और मेरे लिए इन तीन तत्वों में कोई विरोध नहीं है, बल्कि गहरा संबंध है। जहां तक विद्या तथा आस्था के पारस्परिक संबंध का प्रश्न है, तो मैं उन तीनों में कोई विरोध नहीं पाता। मैं तो समझता हूं कि भौतिकतावाद, मानव जीवन की समस्या का हल करने में असमर्थ है। मैं यह भी मानता हूं कि ‘धार्मिक विश्वास’ तर्क-वितर्क का विषय नहीं है।’

डा. कामिल बुल्के का कहना था कि कला और साहित्य मानव जाति की गहन उपलब्धियां हैं, मनुष्य की उच्च कल्पनाएं तथा गहरी अनुभूतियां उनमें अभिव्यक्त होती हैं। सन् 1950 में उन्होंने खुद को और अधिक परिमार्जित एवं परिष्कृत करने के लिए इलाहाबाद विश्वविद्यालय से ‘राम कथा उत्पत्ति और विकास’ पर शोध किया। 600 पृष्ठों में लिखा गया यह शोधग्रंथ चार भागों में विभक्त है। हिंदी भाषा-साहित्य पर काम करते-करते हिंदी भाषा की शब्द-संपदा से डा. कामिल बुल्के कुछ इस तरह प्रभावित हुए कि उन्होंने एक शब्दकोश ही बना डाला। इस शब्दकोश का इतना स्वागत हुआ कि बाद में उन्होंने अथक परिश्रम कर एक ‘संपूर्ण अंग्रेजी-हिंदी’ कोश बनाया जो आज भी हिंदी भाषा का प्रामाणिक शब्दकोश माना जाता है।

यू.के. की हिंदी लेखिका उषा राजे सक्सेना के अनुसार “डा. कामिल बुल्के का कहना था कि कला और साहित्य मानव जाति की गहन उपलब्धियां हैं, मनुष्य की उच्च कल्पनाएं तथा गहरी अनुभूतियां उनमें अभिव्यक्त होती हैं- इसलिए आस्तिक भी उन्हें मानव जीवन के उद्देश्य से अलग नहीं कर सकता। डा. कामिल बुल्के मानते हैं कि सृष्टि, कला और साहित्य का लक्ष्य सौंदर्य है, किंतु यह सीमित नहीं बल्कि अनंत है।”

‘तमेव भान्तमनुभाति सर्वम्
तस्य भाषा सर्वमिदमं विभाति’

उन्होंने कठोपनिषद से उपरोक्त संदर्भ लेते हुए अपनी जीवनी में एक स्थान पर लिखा है, ‘‘मनुष्य के हृदय में उस अनंत सौंदर्य की अभिलाषा बनी रहती है और इस कारण वह उसके प्रतिबिम्ब के प्रति, सीमित सौंदर्य के प्रति अनिवार्य रूप से आकर्षित हो जाता है। कलाकार तथा साहित्यकार को मनुष्य की इस स्वाभाविक सौंदर्य-पिपासा को बनाए रखना तथा इसका उदारीकरण करना चाहिए, उसी में उसकी कला की सार्थकता है।’’ इस कसौटी पर तुलसीदास का साहित्य खरा उतरता है। तुलसीदास मानस को ‘स्वांतः सुखाय’ रघुनाथ गाथा मानते हैं किंतु ‘कला, कला के लिए’ आदि कला की उद्देश्यहीनता विषयक सिद्धांत उनके
मानस से कोसों दूर हैं। उनकी धारणा है –

‘‘कीरति भनति भूति भलि सोई
सुरसरि सम सब कर हित होई’’

वस्तुतः देखा जाए तो डा. कामिल बुल्के में भी तुलसी जैसा ही भक्ति-भाव है, प्रेम है, विनती है, समर्पण है। दोनों एक ही भक्ति-भाव और एक ही भातृ-भाव से जुड़े हए हैं। डा. कामिल बुल्के का कहना है कि मनुष्य ईश्वर का प्रतिरूप है। यदि हम मनुष्य को प्यार नहीं कर सकते तो हम ईश्वर को भी प्यार नहीं कर सकते हैं। हिंदी भाषा और साहित्य सदा डा. बुल्के का आभारी रहेगा।
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डॉ. चन्द्रकुमार जैन संपर्क
Mo.9301054300

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