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डॉ. स्वामी ने सही कहा, रघुराम राजन विदेश जाकर ही विदेशियों की सेवा करें

भारत एक खेती प्रधान देश है, लेकिन पिछले करीब 10 साल से इसे समाप्त करने के लिए राष्ट्रीय-अंतरराष्‍ट्रीय स्तर पर लगातार षड्यंत्र चल रहा है। विश्‍व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और अमेरिका की पूरी कोशिश भारत को पूरी तरह से सर्विस सेक्टर में बदल कर उसे केवल अपना बाजार बनाए रखने की है, जिसमें उसे यहां की कांग्रेस संचालित पूर्व यूपीए सरकार की लगातार मदद मिल रही थी। विदेशी फंडेड एनजीओ समूह के कहने पर लागू ‘मनरेगा‘ योजना से लेकर एक अमेरिकी नागरिक रघुराम राजन को भारतीय रिजर्व बैंक का गर्वनर नियुक्त किए जाने तक सारा कुछ भारतीय किसान और खेती को समाप्त करने के लिए किया गया लगता है! इसका असर हमें यूपीए सरकार के कार्यकाल में लाखों किसानों की आत्महत्या के रुप में देखने को मिल चुका है। वर्तमान मोदी सरकार अमेरिकी पासपोर्टधारी रघुराम राजन को रिजर्व बैंक से चलता न कर दे, इसलिए पूर्व वित मंत्री पी. चिदंबरम से लेकर अर्थशास्‍त्री जगदीश भगवती तक ने रघुराम राजन को बनाए रखने के लिए मोदी सरकार से सिफारिश की थी! नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनते ही रघुराम राजन उनसे मिलने पहुंच गए। परिणाम भी निकला, रघुराम राजन अभी तक अपने पद पर बने हुए हैं और उम्‍मीद यही है कि वह भारतीय रिजर्व बैंक के गर्वनर बने रहेंगे। वैसे हो सकता है, यूपीए सरकार की तरह उन्‍हें मोदी सरकार में खुल कर कृषि को समाप्‍त करने की योजनाओं को लागू करने का मौका नहीं मिले, लेकिन यह तो खैर भविष्‍य के गर्भ में छुपा है!
रघुराम राजन की नागरिकता पर उठते सवाल
दरअसल रघुराम राजन भले ही भारतीय रिजर्व बैंक के गर्वनर हों, लेकिन अभी भी उनके पास अमेरिकी नागरिकता और पासपोर्ट है। जनवरी 2014 में एक आरटीआई कार्यकर्ता सुभाष अग्रवाल ने रघुराम राजन के नागरिकता की जानकारी सूचना के अधिकार कानून के तहत मांगी थी। इसके जवाब में पूर्व की यूपीए सरकार ने भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन की राष्ट्रीयता पर सवालों का जवाब देने से इनकार कर दिया। यह स्‍पष्‍ट दर्शाता है कि सरकार रघुराम राजन की नागरिकता से जुड़ी सच्‍चाई को देश की जनता से छुपाना चाहती थी।
इससे पूर्व भी भारतीय जनता पार्टी के वरिष्‍ठ नेता मुरली मनोहर जोशी ने 15 वीं लोकसभा में कॉलिंग अटेंशन मोशन के तहत रघुराम राजन की नागरिकता पर सवाल उठाते हुए इसकी जानकारी देश के समक्ष साझा करने की मांग की थी। इसके बाद रघुराम राजन ने अपना पासपोर्ट लोकसभा अध्‍यक्ष के समक्ष जमा भी करा दिया था, लेकिन सरकार ने उनकी नागरिकता की जानकारी देश की जनता से छुपा लिया। हां यह अवश्‍य हुआ कि अंग्रेजी मीडिया को रघुराम राजन के पक्ष में सरकार ने उतार दिया था, जो उनके पक्ष में तरह-तरह का तर्क रखकर संदेह का बादल हटाने की कोशिश में जुटे थे!

रघुराम राजन की थ्‍योरी में झलकता अमेरिकी सोच
4 सितंबर 2013 को आरबीआई के गवर्नर बनने वाले रघुराम राजन दरअसल इससे पूर्व वर्ल्‍ड बैंक, अमेरिका के फेडरल रिजर्व बैंक, स्वीडिश पार्लियामेंट्री कमीशन, अमेरिकन फिनांस एसोसिएशन, इंटरनेशनल मोनेटरी फंड आदि में कार्य कर चुके हैं। इतना ही नहीं, वह अर्थशास्त्रियों के समूह ‘ग्रुप ऑफ थर्टी‘ यानी ‘जी-30‘ के सदस्य रहे हैं, जिन्हें शोध करने के लिए अमेरिका के ‘रॉकफेलर फंड‘ से फंड मिलता है। उसी रॉकफेलर फंड से जो दक्षिण एशिया में फोर्ड फाउंडेशन के साथ मिलकर ‘रेमॉन मेग्सेसाय‘ अवार्ड देता है। ज्ञात हो कि यूपीए सरकार में नेशनल एडवाइजरी काउंसिल बनाकर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने उन्हीं रेमॉन मेग्सेसाय वाली अरुणा राय एवं अन्य एनजीओकर्मियों के कहने पर ‘मनरेगा‘ योजना को लागू किया था, जिसने भारतीय खेती की कमर ही तोड़ कर रख दी। मनरेगा पर आगे बात करेंगे, पहले रघुराम राजन पर बात कर लें!
उस रॉकफेलर फंड के पैसे से G-30 ने अर्थव्यवस्था पर एक शोध प्रकाशित किया था, जिसमें रघुराम राजन सहित इस समूह ने यह संस्तुति दी थी कि अर्थव्यवस्था को खेती से निकालकर सर्विस सेक्टर की ओर ले जाना चाहिए।
न्‍यूयॉक टाइम्स को दिए अपने एक साक्षात्कार में रघुराम राजने ने इसे साफ तौर पर स्वीकार करते हुए कहा था कि भारतीय लोगों को खेती से हटाकर सर्विस और औद्योगिक क्षेत्र में लगा देना चाहिए। इससे भारतीय अर्थव्यवस्था में सुधार होगा। रघुराम राजन ने गर्वनर बनते ही द हिंदू बिजनस लाइन को भी एक साक्षात्कार दिया था कि किसी भी देश के विकास के साथ उस देश की कृषि का गिरना लाजमी है। यही भारत में हो रहा है और यह उचित है। मतलब भारत की 70 फीसदी आबादी जिस खेती पर निर्भर है, उसे समाप्त करने का उपाय सुझाने वाले व्यक्ति को भारत की पूर्व सरकार ने आरबीबाई का गर्वनर बना दिया और वह आज तक बना हुआ है। उनकी पूरी कोशिश ऐसी योजनाओं को लागू करना है, जिसमें खेती समाप्त हो और भारत अमेरिका-यूरोप के लिए सर्विस सेक्टर मतलब बाजार बनकर रह जाए!
अमेरिका और यूरोप भारत में खेती समाप्‍त कर इसे दुनिया का सबसे बड़ा बाजार बनाना चाहते हैं.

जानकारी के लिए बता दूं कि विदेशी खासकर अमेरिका के कंप्‍यूटर से लेकर चिप्स उत्पाद तक के लिए भारत एक बड़ा बाजार है और इस बाजार को इससे भी अधिक बड़ा तभी बनाया जा सकता है जब देश की खेती को समाप्‍त कर इसे पूरी तरह से सर्विस सेक्‍टर में बदल दिया जाए। यही अमेरिकी नागरिकता रखने वाले इस देश के आरबीआई गर्वनर की सोच है। जिस तरह से पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदंबरम और नरेंद्र मोदी से सहानुभूति रखने वाले अर्थशास्‍त्री जगदीश भगवती ने रघुराम राजन के पक्ष में लॉबिंग की और मोदी सरकार ने उन्‍हें अभी तक बनाए रखा है, उससे तो यही लगता है कि रघुराम राजन के जरिए अमेरिका अपनी योजना में फिलहाल सफल होता दिख रहा है!

बाबा रामदेव का आदर्श ग्राम निर्माण योजना, एक उम्‍मीद की किरण
आधुनिक चाणक्‍य के रूप में ‘मोदी सरकार’ को सत्‍ता में लाने के लिए प्रमुख भूमिका निभाने वाले और देश में स्‍वदेशी आंदोलन की अलख जगाने वाले बाबा रामदेव वर्तमान में ‘आदर्श ग्राम निर्माण योजना‘ पर काम कर रहे हैं। इस ‘आदर्श ग्राम निर्माण योजना’ का प्रमुख आधार स्‍वदेशी व खेती है। इस खेती पर सबसे पहले यूपीए सरकार ने ‘मनरेगा‘ के जरिए चोट किया था। सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली एनजीओ गिरोह राष्‍ट्रीय सलाहकार परिषद की सलाह पर जिस ‘मनरेगा’ योजना को लागू किया गया था, उसने देश के गांवों की पूरी अर्थव्यवस्था को ही चैपट कर दिया है। गांव में जाइए, खेत में काम करने के लिए एक भी मजदूर तैयार नहीं है। उसे यहां-वहां मिटटी काटकर बैठे-बिठाए पैसे मिल रहे हैं और उसमें भी आधा हिस्सा उसका सरपंच, मुखिया और सुपरवाइजर ले रहा है। भ्रष्‍टाचार की भेंट चढ़ चुके ‘मनरेगा’ ने गांव के युवकों को बेकार बनाने के अलावा और कुछ नहीं किया है और यही विदेशी शक्तियां चाहती हैं।
पहले ही विदेशी बीज और कीटनाशक ने हमारे देश की खेती को बर्बाद कर दिया है, उस पर से ‘मनरेगा’ और अब खेती को समाप्त करने की सलाह देने वाले एक अमेरिकी नागरिकता रखने वाले आरबीआई गवर्नर के कारण हमारे देश की खेती पर लगातार संकट मंडरा रहा है। ऐसे में बाबा रामदेव के ‘आदर्श ग्राम योजना‘ की सफलता देश की अर्थव्यवस्था और खेती को बचाने के लिए किया जा रहा एक मात्र प्रयास प्रतीत हो रहा है!
साभार- http://aadhiabadi.in/ से

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