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वैदिक साहित्य और संस्कृति को जन जन तक पहुँचाने के लिए समर्पित डॉ. विवेक आर्य

आर्यसमाज से परिचय – मेरे परदादा जी श्री राम-किशन आर्य जी ने स्वामी दयानन्द जी के दर्शन दिसम्बर 1878 से जनवरी 1879 के मध्य रिवाड़ी आगमन के समय किये थे। वही से स्वामी दयानन्द जी के भाषणों को सुनकर एवं उनके प्रतापी तेज से प्रभावित होकर वैदिक धर्मी बन गए। आपने आर्यसमाज हांसी, जिला हिसार की स्थापना 1902 में की थी। आप ग्राम खांडा खेड़ी, जिला जींद में वैदिक विद्वान आर्य मुनि जी एवं पौराणिक पंडितों के मध्य शास्त्रार्थ एवं उत्सव करवाने वाले आर्यों में शामिल थे एवं लाला लाजपत राय के नजदीकी थे। मेरे दादा स्वर्गीय श्री ब्रहमराज आर्य जी आर्यसमाज के हैदराबाद आंदोलन एवं हिंदी आंदोलन के भाग रहे।

पारिवारिक संस्कारों का लाभ बचपन से मिला। मेरी स्वाध्याय में रुचि होने से वैदिक साहित्य को पढ़ने में अवसर मिला। पूर्वजन्म के संस्कार, गृह का माहौल, माता पिता और गुरुजनों की अनुकम्पा का लाभ मिला।

– 20 वर्ष की अल्पायु में जींद से प्रकाशित होने वाली शांतिधर्मी मासिक हिंदी पत्रिका में मेरा प्रथम लेख प्रकाशित हुआ था। उस समय में MBBS का विद्यार्थी था। उसके पश्चात से आज तकआर्य समाज की प्रायः हर पत्रिका में मेरे द्वारा लिखित लेख प्रकाशित हुए है।

-21 वर्षों से शांतिधर्मी पत्रिका के सह-संपादक के रूप में सहयोगी।

-21 वर्षों से इंटरनेट एवं सोशल मीडिया के माध्यम से देश और विदेश में yahoo, orkut, faceook, twitter, whatsapp आदि के माध्यम से प्रचार। मेरे द्वारा संचालित आर्यसमाज पेज के 3 लाख सदस्य है। पेज का लिंक है- Arya Samaj

-15 से अधिक आर्यसमाज की वैदिक पुस्तकों का संपादन और लेखन। मेरी लिखी पुस्तक वेदों का जानें का मलयालम, बंगला , पंजाबी, नेपाली और मराठी में अनुवाद और प्रकाशन हो चूका है।

– केरल जैसे प्रान्त में पालघाट में स्थापित प्रथम वैदिक गुरुकुल में सहयोगी।

-स्वामी जगदीश्वरानन्द जी की स्मृति में स्थापित वैदिक पुस्तकालय के संचालक जिसमें 3000 के लगभग दुर्लभ वैदिक साहित्य उपलब्ध है।

– गत 4 वर्षों से हितकारी प्रकाशन समिति, हिण्डौन से अनेक वैदिक साहित्य के प्रकाशन में सहयोगी।

-पावर पॉइंट प्रेजेंटेशन (Power Point Presentation) के माध्यम से अनेक विषयों पर कार्यशाला का आयोजन कर वैदिक सिद्धांतों का प्रचार।

-अनेक जन विशेष रूप से युवाओं का अनेक विषयों पर शंका समाधान और वैदिक धर्म में उन्हें दीक्षित करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।

– पिछले 8 वर्षों में पुरे देश में 100 से अधिक पुस्तक मेलों में वैदिक साहित्य का स्टाल लगवाकर साहित्य सेवा।

-अनेक दुर्लभ साहित्य को digitalized करके उसे सुलभ किया ताकि आने वाली पीढ़ियां उनसे लाभ उठा सके।

यह मेरे जीवन का अभी तक का लेखा जोखा है।

आगामी जीवन के लिए योजना।

मैंने जीवन के आरम्भिक 21 वर्ष बालकाल और शिक्षा ग्रहण करने में व्यतीत किये। आगामी 21 वर्ष मैंने आर्य समाज में स्वाध्याय, चिंतन, लेखन, सत्संग और सोशल मीडिया से प्रचार में लगाए।

42 वर्ष आयु पूर्ण होने पर अब आगामी 21 वर्ष मैं साहित्य प्रकाशन, लेखन और सम्पादन में लगाना चाहता हूँ। इसलिए अपने जन्म दिवस पर हितकारी प्रकाशन समिति के दिल्ली कार्यालय की स्थापना का निर्णय लिया है। श्री प्रभाकर देव जी के निधन के पश्चात प्रकाशन का कार्य यथोचित चलता रहे। यही ईश्वर से प्रार्थना है।

साथ में आत्मिक उन्नति , आर्ष ग्रंथों का स्वाध्याय एवं तदानुसार आचरण पर विशेष बल देने का संकल्प है।

ईश्वर आत्मबल, प्रेरणा, सदगुण एवं शक्ति दे।

नाम डॉ विवेक आर्य
आयु 42 वर्ष
योग्यता- शिशु रोग विशेषज्ञ, दिल्ली
जन्मस्थान-जींद, हरयाणा

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