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नाटक और नुक्कड़ नाटक आज भी लोकप्रिय हैंः देवमाईत मिंज


राजनांदगांव।
शासकीय दिग्विजय महाविद्यालय के हिंदी विभाग के तत्वावधान में अतिथि व्याख्यान का आयोजन किया गया। इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय खैरागढ़ की हिंदी विभाग की रीडर डॉ. देवमाईत मिंज अतिथि वक्ता थीं।

अतिथि वक्ता डॉ. मिंज ने कहा कि हिंदी में नाटकों का समृद्ध इतिहास हिंदी जगत की सतत जागरूकता का प्रमाण है। भारतेन्दु हरिश्चंद्र इसके पुरोधा हैं। उन्होंने संस्कृत नाटकों की परम्परा से प्रेरणा ग्रहण की। लोक चेतना और समाज सुधार की मूल भावना ने हिंदी नाटकों को धीरे-धीरे राष्ट्रीय और वैश्विक ख्याति का अधिकारी बना दिया। रंगमंच के निर्माण और नाटकों के खेले जाने के दौर ने साहित्य की इस विधा को लोकप्रिय बना दिया। आरम्भ के नाटक नींव की ईंटों के समान हैं किन्तु आधुनिक युग में समाज का व्यापक चित्र एक भव्य महल के रूप में उभरा है। बीसवीं शताब्दी में सिनेमा के आगमन ने पारसी रंगमंच को सर्वथा समाप्त कर दिया। बावजूद इसके अव्यावसायिक रंगमंच विविध रूपों में जीवित रहा। थियेटर की दस्तक बराबर बनी रही। आज भी नाटक और नुक्कड़ नाटक तक खेले जाते हैं।

डॉ. मिंज ने भारतेन्दु के साथ-साथ हिन्दी रंगमंच के उदय, हिंदी नाटक लेखन में राष्ट्रीय भावधारा, प्रसाद युग और विभिन्न माध्यमों में उसके बाद के दौर के नाटक साहित्य के बदलते तेवर पर प्रकाश डाला। भारतेन्दु ने रंगमंच पर अभिनय के साथ-साथ प्रचुर नाटक लेखन कर इस विधा को आगे बढ़ाया। उनके प्रयास से रंग संस्थाओं का गठन भी हुआ। समय के साथ नाटक और प्रहसन साहित्य की धारा के रूप में स्थापित हो गए। उन्होंने कहा कि नाटकों में पात्रों के माध्यम से जीवन के सभी रंग सामने आते रहे हैं। यही इस विधा की सबसे बड़ी देन है।

प्रस्ताविक सम्बोधन और उदबोधन का समाहार डॉ. चन्द्रकुमार जैन ने किया। डॉ. मिंज का परिचय के साथ व्याख्यान के विषय की जानकारी डॉ. बी.एन.जागृत ने दी । संचालन डॉ. नीलम तिवारी ने किया। प्रारम्भ में विभाग के प्राध्यापकों द्वारा अतिथि वक्ता का आत्मीय स्वागत किया गया। विभागीय प्राध्यापक डॉ. गायत्री साहू, डॉ. स्वाति दुबे, डॉ. भवानी प्रधान सहित स्नातकोत्तर हिंदी के विद्यार्थी बड़ी उपस्थित रहे ।

हिंदी विभाग में आयोजन में छत्तीसगढ़ के राजगीत अरपा पैरी के धार की प्रस्तुति से कार्यक्रम का शुभारम्भ हुआ। एक उदाहरण प्रस्तुत करते हुए विभाग के प्राध्यापक डॉ. चन्द्रकुमार जैन ने स्वयं छत्तीसगढ़ महतारी की इस वंदना को सुमधुर स्वर दिया, जिसमें पूरी सभा ने भावपूर्ण भागीदारी की। कार्यक्रम में जय हो जय छत्तीसगढ़ मईया की स्वर लहरियां अंत तक माटी की महिमा और राजगीत की गरिमा की मिठास घोलती रही। युवाओं को राजगीत की महत्ता से भी अवगत करवाया गया।

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