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दोहरे आतंक का खतरा

महोदय
क्या ऐसे पाकिस्तान से कभी शांति के लिए कोई वार्ता संभव हो सकेगी, जहां की सरकार केवल सेना व आई एस आई के भरोसे हो और ये दोनों ही आतंकवादी संगठनो को पाल पोस कर खतरनाक घटनाओं को अंजाम देकर भारत में हजार वर्षो तक घाव करते रहने की शपथ से विवश होकर दारुल इस्लाम या निज़ामे मुस्तफा बनाना चाहते हो ।अब तो इस्लामिक स्टेट ने भी भारत को 2020 तक खिलाफत के लिए ‘खुरासान’ बनाने की चेतावनी दें दी है । जिससे मजहबी आतंकवाद का खतरा निःसंदेह दोहरा बढ़ गया है।

कुछ वर्षो पूर्व संयुक्त राष्ट्र ( 4.11.2008 ) की रिपोर्ट के आधार पर आये समाचारो से ज्ञात होता है क़ि 10 से 13 वर्ष के बच्चों को प्रशिक्षण देकर अलकायदा व तालिबान जैसे खूंखार जिहादी संगठन आत्मधाती दस्ते तैयार करते है और उनके माँ बापो को हज़ारो डॉलर देकर व जन्नत का वास्ता देकर खुश रखते है। पाकिस्तान के बाजौर एवं मोहम्मद तथा अफगानिस्तान के कुनार एवं नुरिस्तान आदि क्षेत्रो मे तो ऐसे बच्चों को (जो जिहाद के लिए तैयार हो जाते है) दूल्हे की तरह सजा कर घोडे पर बैठा कर पूरे गाँव में घुमाया जाता है और गाँव के लोग उनके माँ बाप को मुबारकबाद देते है।तालिबान ने ‘फिदायीन-ए-इस्लाम’ नाम से पाकिस्तान व अफगानिस्तान की सीमा पर वजीरिस्तान मे ऐसे कुछ प्रशिक्षण शिविर चला रखे है जहां हज़ारो कम उम्र के बच्चे आत्मघाती बनाये जा रहे है । इसीप्रकार वे एक ओर तो महिलाओ को नारकीय जीवन जीने के लिए मज़बूर करते है वही दूसरी ओर उन्ही महिलाओ को भी आत्मघाती बनाने के लिए प्रशिक्षण शिविर चलाते है।पहले से ही यह संकट समझ में आ रहा था कि अफगानिस्तान से नाटो सेनाओं के हटने के बाद ये सब अब जिहाद के लिए हमारे देश पर ही घात लगाएंगे ।

अब जब इन सबका केंद्र भारत होगा तो उस स्थिति में भी क्या कोई शान्ति की वार्ता आगे बढ़ सकेगी ? क्या यह निर्रथक , आत्मघाती व संकट से मुहँ मोड़ने की कायरता नहीं होगी ?

अतः हमारी सरकार को निकट भविष्य में आ रहे इस संकट से निपटने के लिए अब आतंकवादियो के प्रशिक्षण केन्द्रो व गुप्त अड्डो को जिनका जाल (नेटवर्क) पीओके व देश की सीमाओँ व विभिन्न नगरो में फ़ैल चुका है को लक्ष्य बना कर दृढ़ इच्छा शक्ति के साथ नष्ट करना होगा। पिछले 35 वर्षो के विभिन्न समाचारो से समय समय पर आती रही गुप्तचर विभाग की रिपोर्टों से बहुत कुछ जिहादी केन्द्रो का पता चलेगा और देश के पूर्व व वर्तमान गुप्तचर अधिकारी व कर्मचारी भी अवश्य सहायक हो सकेंगें। क्योकि यह आतंकवादी जिहाद बंग्ला देश (1971) के बनने के बाद से ही बदले की भावना के वशीभूत ज्यादा उग्र होता जा रहा है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि इस्लामिक स्टेट के क्लिक करते ही इन गुप्त अड्डो से हजारों जिहादी भीषण रक्तपात मचायें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी ?

सधन्यवाद

भवदीय

विनोद कुमार सर्वोदय

गाज़ियाबाद

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