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कला की ‘दुलारी’ देवी

जर्मन कवि गेटे की एक पंक्ति है -“वह दुख महान होता है, जो एक महान सुख को जन्म देता है।” दुलारी देवी को पदमश्री सम्मान की घोषणा की जानकारी के बाद मुझे इस पंक्ति का बरबस स्मरण हो आया है। इस अवसर पर मै पूर्व में लिखी दुलारी देवी की जीवनी को यहां प्रस्तुत कर रहा हूं।

कुछ लोग ऐेसे भी होते हैं, जिनके लिए शस्य श्यामला धरती पालने का काम करती है, गाँव की पगडंडियां जिनको उंगली पकड़कर चलना सिखाती है, पेड़-पौधे, नदी-तालाब और पशु-पक्षी, जिन्हें निर्भय होकर आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं। अनुभव के विश्वविद्यालय में ऐसे लोग जो डिग्री हासिल करते हैं, उनके समक्ष विश्वविद्यालय की ऊँची से ऊँची डिग्री भी फीकी पड़ जाती है। ऐसे ही लोगों में दुलारी देवी भी एक हैं, जिन्होंने तमाम प्रतिकूलताओं के बावजूद लगन, परिश्रम और संकल्प शक्ति के बल पर मिथिला पेंटिंग के क्षेत्र में एक विशिष्ट मुकाम हासिल किया है। वे हमारे बीच मिथिला पेंटिंग के शीर्षस्थ कलाकारों की पंक्ति में श्रद्धा एवं आदर की पात्र हैं।

दुलारी देवी

श्रीमती दुलारी देवी का जन्म बिहार के मधुबनी जिलान्तर्गत रांटी ग्राम में एक मछुआरा परिवार में 27 दिसम्बर, 1967 को हुआ था। दुलारी के पिता मुसहर मुखिया और भाई परीक्षण मुखिया मछली पकड़ने का परम्परागत काम करते थे। जबकि माँ धनेश्वरी देवी दूसरों के घरों एवं खेत-खलिहानों में मजदूरी करती थी। होश संभालते ही दुलारी को दोहरी जिम्मेवारी निभानी पड़ी। कभी पिता और भाई के साथ मछलिया पकड़ने जाती, तो कभी माँ के साथ दूसरे के घरों और खेतों में मजदूरी करती। फिर भी शायद ही किसी दिन भरपेट भोजन नसीब हो पाता था। दूसरे दिन क्या खायेंगे, इसी चिन्ता में रात गुजरती थी। उन दिनों के बारे में दुलारी कहती हैं, ’’बचपन का दिन बड़ा ही मुश्किलों भरा था। फूस का घर था। सुबह और शाम में मां के साथ लोगों के घरों में झाडू-पोंछा और दिन में खेतों में मजदूरी किया करती थी। धान कटनी के दिनों में दूसरों के घर धान कुटने भी जाना पड़ता था। तब 20 किलों धान कूटने पर आधा किलो धान मजदूरी के रूप में मिलता था। लेकिन इतने कठिन परिश्रम के बावजूद भी कभी-कभार भूखे पेट ही सोना पड़ता था।’’

जैसा कि उन दिनों प्रचलन था, 12 वर्ष की उम्र में ही दुलारी की शादी मधुबनी जिले के बेनीपट्टी प्रखंड के बलाइन कुसमौल गाँव में हो गई। लेकिन दुलारी का दामपत्य जीवन सुखद नहीं रहा। पति से अनबन चलता रहा। उनकी 6 माह की पुत्री भी अचानक चल बसी। तब दुलारी मायके लौट आई और फिर वहीं की होकर रह गई। मायके में मिथिला पेंटिंग की सुप्रसिद्ध कलाकार महासुन्दरी देवी और कर्पूरी देवी के यहाँ दुलारी को 6 रू. महीना पर झाडू-पोछा का काम मिला। वह आँगन-बरामदा झाड़ू से रगड-रगड़ कर चमकाती। चूल्हे-चौका से लेकर उनके घर का हर छोटा-बड़ा काम दुलारी करती। काम के बाद जब समय मिलता, तब महासुन्दरी देवी और कर्पूरी देवी को पेंटिंग बनाते ध्यान से देखा करती। उन्हें देख दुलारी के मन में भी पेंटिंग बनाने की लालसा जगी। लेकिन उन दिनों पिछड़ी जातियों में मिथिला पेंटिंग बनाने का रिवाज नहीं था। इसलिए लोकलाज के डर से वह अपने मन की बात कह नहीं पाती थी। कागज और कूची खरीदने के लिए भी दुलारी के पास पैसे नहीं थे। पढ़ी-लिखी भी नहीं थी। कभी कलम एवं पेंसिल नहीं पकड़ा था। लेकिन उसमें मिथिला पेंटिंग को जानने-समझने की उद्दाम उत्सुकता थी। इसलिए तमाम प्रतिकूलताओं के बावजूद उन्होंने मिथिला पेंटिंग सीखने का निर्णय लिया।

शाम में घर लौटने के बाद अपनी जमीन को पानी से गीला कर लकड़ी के टुकड़े से पेंटिंग बनाती। यह क्रम कई महीनों तक चलता रहा। संयोगवश, उन्हीं दिनों भारत सरकार के वस्त्र मंत्रालय द्वारा महासुन्दरी के आवास पर मिथिला पेंटिंग में 6 माह का प्रशिक्षण शुरू किया गया। महासुन्दरी देवी की पहल सेे दुलारी को भी प्रशिक्षण में शामिल कर लिया गया। उन्होंने अपने सान्निध्य में दुलारी को सिखाना शुरू कर दिया। फिर तो दुलारी की कल्पनाएं कुलाचें भरने लगी। वह सोते-जागते मिथिला पेंटिंग की स्वप्निल दुनिया में गोते लगाने लगी। उसके कौशल को राह और मंजिल मिलती चली गयी।

इस प्रशिक्षण के दौरान उसे मिथिला पेंटिंग की बारीकियों को जानने-समझने का पर्याप्त अवसर मिला। दरअसल दुलारी के मन में कहीं न कहीं यह डर समाया हुआ था कि कहीं कोई यह न कहे कि छोटे एवं गरीब घरों से आए लोग मिथिला पेंटिंग में काबिल नहीं होते। इसलिए अपने आप को साबित करने की चाहत में वह प्रशिक्षण के बाद भी घंटों पेंटिंग बनाती। घर में बिजली नहीं थी। फिर भी अंघेरे कमरे में तेल की कुप्पी की रोशनी में वह आर्थिक कठिनाइयों और तमाम परेशानियों के बीच चित्रण करती रही। दुलारी का मेहनत रंग लाया ओर वह मिथिला पेंटिंग की तत्कालीन दुनिया से भली-भाँति परिचित हो गई। फिर दुलारी ने पीछे मुड़कर नहीं देखा।

उस समय तक उच्च जाति की महिलाएॅ ज्यादातर पौराणिक आख्यानों यथा रामायण और महाभारत तथा दलित महिलाएं राजा सहलेस से जुडे़ प्रसंगों को ही अपने चित्रों में उकेरती थी। लेकिन दुलारी ने परम्परा से चले आ रहे उन चित्रों को नहीं अपनाया। उन्होने अपने चित्रों में नए भावों के साथ विषयों के चुनाव में नवीनता लाई। वह बचपन से ही प्रकृति के संग जीने की आदी थी। इसलिए ग्राम्य झांकियाँ और वे मधुर स्वपन, जो उनके भीतर बचपन से संचित होते गये थे, वे उनके रंगों और रेखाओं में बिखर गये। सबसे पहले उन्होंने मछुआरों के जीवन पर पेंटिंग बनाई। मल्लाह जाति के लोग, उनके संस्कार और उनके उत्सवों को अपना विषय बनाया। फिर खेतों में काम करते किसानों और मजदूरों का चित्रण किया। बाढ़-सुखाड़ के दौरान गरीबों की तकलीफों और दुखड़ों को चित्रभाषा दी। इस तरह घरेलू दुख-दर्द की अबूझ समझ और प्रकृति से आत्मीय लगाव के चलते तालाब, गवंई-गाँव और सम-सामयिक विषयों को मिथिला चित्रों में जगह देकर दुलारी ने एक नया आकर्षण पैदा कर दिया। मिथिला चित्रकला के कलाकारों में दुलारी देवी की एक अलग ही पहचान बनती गई।

दुलारी देवी को मिथिला पेंटिंग की कचनी शैली (रेखा चित्र) में महारथ हासिल है। उनकी कचनी शैली के चित्रों की अपनी कुछ विशेष खूबियाँ है। उनके चित्रों की रेखाएँ अपने ढंग की होती है और रंग संयोजन बहुत ही उच्च कोटि का होता है। पतली लकीरों से चित्रों को आकार देकर रंगों का जिस कुशलता से वह सम्मिश्रण करती है, वह सर्वथा मौलिक है। उनके चित्रों में नए भावों के साथ विषयों के चुनाव में भी नवीनता है। उन्होंने ऐसे विषय चुने, जो रंग और ब्रश के योग से एकदम सजीव हो उठे हैं। इसलिए उनके चित्र भाव और सौंदर्य की दृष्टि से सभी के मन को भाते हैं।

परिवर्तित परिस्थितियों में समन्वय और सामंजस्य स्थापित कर वास्तविकता को प्रकट करना दुलारी देवी के चित्रण की विशेषता है। इनके चित्रण के खूबी सर्वसामान्य और रोजमर्रा की जिन्दगी में नित्य नजरों के सामने से गुजरने वाले नजारे हैं। सामान्यता ही दुलारी देवी के चित्रण की असामान्यता है। उनके चित्रों में गरीबी, प्रेम और समानता की सुन्दर अभिव्यक्ति देखने को मिलती है। बाजार की मांग पर उन्होंने जहाँ एक ओर परम्परा से चले आ रहे रामायण और महाभारत से जुड़े प्रसंगों के चित्र बनाये है, वही दूसरी ओर नदी, तालाब, खेत-बधार और दूर-दूर तक फैले गाँवों जैसे ग्राम्य वातावरण के चित्रों को भी प्रस्तुत किया है। क्रिकेट, जन-प्रतिनिधियों के भ्रष्टाचार, पोलियो और नशाखोरी जैसे सम-सामयिक विषयों पर बनाई गई उनकी पेंटिंग ने खूब बाहवाही बटोरी है। यह उनकी कला के सर्वोत्कृष्ट रूप कहे जाते हैं।

ललित कला अकादमी से वर्ष 1999 में मिले सम्मान और उद्योग विभाग से वर्ष 2012-13 में बिहार सरकार का प्रतिष्ठित राज्य पुरस्कार मिलने के बाद दुलारी देवी का उत्साह और बढ़ा। देश के दूसरे राज्यों से भी उन्हें बुलावा आने लगा। कला माध्यम नामक संस्था के माध्यम से बंगलोर के विभिन्न शिक्षण संस्थानों, सरकारी और गैर-सरकारी भवनों की दीवारों पर 5 साल तक चित्रण किया। फिर मद्रास, केरल, हरियाणा, चेन्नई और कलकत्ता में मिथिला पेंटिंग पर आयोजित कार्यशालाओं में शामिल हुई। बोध गया के नौलखा मंदिर की दीवारों पर दुलारी देवी द्वारा बनायी गयी मिथिला पेंटिंग आज भी लोगों का ध्यान आकर्षित करती है।

देश-विदेश की पत्रा-पत्रकाओं ने भी दुलारी देवी की पेंटिंग का प्रकाशन किया है। विदेशी कला प्रेमी गीता वुल्फ ने दुलारी देवी के जीवन प्रसंग पर आधारित एक सचित्र पुस्तक ‘‘फालोईंग माई पेंट ब्रश’’ का प्रकाशन किया है। इस पुस्तक में दुलारी देवी की मिथिला पेंटिंग का विस्तृत ज्ञान उदधाटित हुआ है। मार्टिल ली काज की फ्रेंच भाषा में लिखी गई पुस्तक ‘‘मिथिला’’, हिन्दी की कला पत्रिका सतरंगी एवं ’मार्ग’ मे भी दुलारी की जीवन-गाथा और उनकी पेंटिंग का सुंदर वर्णन है। बिहार की राजधानी पटना में नवनिर्मित बिहार संग्रहालय मे भी कमलेश्वरी (कमला नदी) पूजा पर दुलारी देवी द्वारा बनाई गई पेंटिंग को प्रमुखता से प्रदर्शित किया गया है।

दुलारी में वात्सल्य की अतृप्त भावना प्रबल मात्रा में विद्यमान है। जिस औरत का बच्चा मात्र छः माह में ही चल बसा हो, उसके मन में यह भावना आना सर्वथा स्वभाविक है। शायद यही कारण है कि बच्चों को मिथिला पेंटिंग पढाने में दुलारी देवी को असीम आनंद का अनुभव होता है। मिथिला आर्ट इंस्टीच्यूट और सेवा मिथिला जैसे संस्थाओं के माध्यम से वे बच्चों को मिथिला पेंटिंग सिखाती रही है। इस क्रम में अब तक वे हजारों बच्चों को प्रशिक्षित कर चुकी है। प्रशिक्षण कार्य से जो भी समय बचता है, उसका सदुपयोग वे अपने भाई के बच्चों को पढाने में करती है।

बहरहाल, दुलारी देवी अब तक विविध विषयों पर लगभग 10 हजार पेंटिंग बना चुकी है। दुलारी देवी के कलाकार जीवन की मुख्य सार्थकता यह है कि वे अपने चित्र के बल पर आत्मनिर्भर रहने वाले कलाकारों में से है। आज वह हर महीने करीब 30-35 हजार रुपये कमाती है और उनके मुताबिक यह रकम उनकी जरूरतें पूरी करने के लिए पर्याप्त है। उनके चित्र को देश-विदेश में पर्याप्त लोकप्रियता और ख्याति प्राप्त हो चुकी है। फिर भी वे अपनी पेंटिंग में शैलीगत नवीनताएँ लाकर नित्य नया आकर्षण पैदा कर रही हैं। वे कहती भी हैं कि अभी थोड़ा ही हासिल किया है, अभी बहुत कुछ हासिल करना बाकी है। आज एक मुकाम है, पर मंजिल अभी शेष है। आज वह मुकाम भी उन्हें हासिल हो गया है। दुलारी देवी को ढेर सारी बधाई एवं शुभकामनाएं।

 

 

 

 

 

लेखक कला व संस्कृति से जुड़े विषयों पर लिखते हैं

साभार https://aalekhan.in/ से

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