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मरते बिस्मिल,अशफाक़, रौशन, लाहिड़ी अत्याचार से, होंगे पैदा सैकड़ों उनके रुधिर की धार से

रामप्रसाद बिस्मिल का जन्म 11 जून, 1897 ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी (निर्जला एकादशी) विक्रमी संवत् १९५४, शुक्रवार को उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर में हुआ था. राम प्रसाद एक कवि, शायर, अनुवादक, बहुभाषाभाषी, इतिहासकार व साहित्यकार भी थे। बिस्मिल उनका उर्दू तखल्लुस (उपनाम) था जिसका हिन्दी में अर्थ होता है आत्मिक रूप से आहत। बिस्मिल के अतिरिक्त वे राम और अज्ञात के नाम से भी लेख व कविताएँ लिखते थे। उन्होंने सन् १९१६ में १९ वर्ष की आयु में क्रान्तिकारी मार्ग में कदम रखा था। ११ वर्ष के क्रान्तिकारी जीवन में उन्होंने कई पुस्तकें लिखीं और स्वयं ही उन्हें प्रकाशित किया। उन पुस्तकों को बेचकर जो पैसा मिला उससे उन्होंने हथियार खरीदे और उन हथियारों का उपयोग ब्रिटिश राज का विरोध करने के लिये किया। जिनमें से अधिकतर सरकार द्वारा ज़ब्त कर ली गई थी। बिस्मिल बेहद धार्मिक प्रवृत्ति के थे। नियमित पूजा-पाठ उनके जीवन का हिस्सा था। उनका जन्म एकादशी के दिन हुआ था और एकादशी के ही दिन वे बलिदान हुए। यह महज संयोग नहीं था बल्कि उनकी धार्मिक प्रवृत्ति की बड़ी वजह भी थी। उन्होंने ‘हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन’ की स्थापना की, जिसमें आगे चलकर चंद्रशेखर आजाद, अशफाकउल्लाह खान और भगत सिंह जैसे लोकप्रिय क्रांतिकारी सदस्य बने । भगत सिंह के आग्रह पर 1928 में इस संगठन का नाम बदलकर ‘हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन’ कर दिया गया ।

क्रांतिकारी रामप्रसाद बिस्मिल को काकोरी ट्रेन डकैती के मामले में उनके साथियों अशफाक़ उल्लाह खान, रोशन सिंह और राजेंद्र लाहिड़ी के साथ अंग्रेज सरकार ने मुकदमे के बाद फांसी की सजा सुनाई थी। बिस्मिल को 19 दिसंबर 1927 को फांसी दे दी जाएगी। 17 दिसंबर को उनके साथी राजेंद्र लाहिड़ी को तय समय से पहले ही उत्तरप्रदेश की गोंडा जेल में अचानक फांसी दे दी गई। खबर गोरखपुर जेल में कैद बिस्मिल तक पहुंची, तो उन्होंने अपनी जीवनी लिखने का फैसला कर लिया। क्रांतिकारियों से सहानुभूति रखने वाले कुछ अफसरों ने खुफिया तौर पर उन्हे सामग्री मुहैया करा दी। बिस्मिल ने दो दिन में 18 दिसंबर को अपनी 200 पन्नों की जीवनी पूरी लिख डाली 19 दिसंबर को फाँसी के ठीक पहले उनकी माँ अंतिम मुलाकात के लिए जेल पहुंचीं। उनके साथ क्रांतिकारी शिवचरण वर्मा भी उनके बेटे बनकर जेल पहुंच गए। मुलाकात से वापसी के साथ ही खाने के डिब्बे में रख कर शिवचरण वर्मा बिस्मिल की आंत्मकथा को अपने साथ ले आए। किताब पूरी करने और उसे बाहर भेज देने के बाद निश्चिंत भाव से 19 दिसंबर 1927 दिसम्बर की प्रात: बिस्मिल नित्य की तरह चार बजे उठे. नित्यकर्म, स्नान आदि के बाद संध्या उपासना की. वैदिक मंत्रों के जाप और जेल में बंद अन्य कैदियों से ‘ब्रिटिश साम्राज्यवाद का नाश हो’ भारत माता की जय के नारे लगवा कर बिस्मिल ने खुद ही फाँसी का फंदा अपने गले में डाल लिया।

इसके पहले उन्होंने साथी कैदियों के साथ ये गीत गाया

मालिक तेरी रजा रहे और तू ही तू रहे.
बाकी न मैं रहूँ न मेरी आरजू रहे..
जब तक कि तन में जान रगों में लहू रहे.
तेरा ही ज़िक्र या तेरी ही जुस्तजू रहे..
अंत में बिस्मिल के शब्दों में ही-

अपनी माँ के व्यक्तित्व का रामप्रसाद बिस्मिल पर गहरा प्रभाव पड़ा. अपने जीवन की सभी सफलताओं का श्रेय उन्होंने अपनी माँ को ही दिया है. माँ के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हुए उन्होंने लिखा है- “यदि मुझे ऐसी माता न मिलती तो मैं भी अतिसाधारण मनुष्यों की भांति संसार चक्र में फंसकर जीवन निर्वाह करता. शिक्षादि के अतिरिक्त क्रांतिकारी जीवन में भी उन्होंने मेरी वैसी ही सहायता की, जैसी मेजिनी की उनकी माता ने की थी. माताजी का मेरे लिए सबसे बड़ा उपदेश यही था कि किसी की प्राण न लो. उनका कहना था कि अपने शत्रु को भी कभी प्राण दण्ड न देना. उनके इस आदेश की पूर्ति करने के लिए मुझे मजबूरन एक-दो बार अपनी प्रतिज्ञा भंग करनी पड़ी.”

क्रांतिकारी शिवचरण वर्मा के बड़े भाई भगवतीचरण वर्मा की कोशिश से बिस्मिल की आत्मकथा का प्रकाशन हुआ, लेकिन कुछ प्रतियां ही बंट सकी थीं कि अंग्रेज सरकार ने सभी उपलब्ध प्रतियों को जप्त कर लिया। दूसरी बार क्रांतिकारी पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी ने बिस्मिल की आत्मकथा प्रकाशित कराई, लेकिन इसे भी ब्रिटिश सरकार ने जप्त कर रोक लगा दी। इसके बाद इसका प्रकाशन 1988 में बनारसी दास चतुर्वेदी ने कराया।

शहीद रामप्रसाद बिस्मिल की करीब 200 पन्नों की आत्मकथा में अपने साथियों को संबोधित करते हुए उन्होंने ब्रिटिश साम्राज्यवाद के असल मंसूबों की उदाहरण दे कर पोल खोली थी। उन्होंने स्पष्ट चेतावनी दी थी कि अंग्रेज धर्म के नाम पर देश के टुकड़े करने की साजिश रच रहे हैं। इसी वजह से पुस्तक का प्रसार अंग्रेजों ने बैन कर दिया। यही वजह है कि अंग्रेजों ने इसे प्रसारित होने से रोका, यहां तक कि आजादी के भी 41 साल बाद तक यह पुस्तक देश में प्रकाशित नहीं हो सकी। बिस्मिल की किताब में साफ किया गया है कि धर्म के नाम पर किस तरह ब्रिटिश हुक्मरानों ने उन्हें व उनके साथियों को सजा माफी के लालच में बरगलाने की कोशिश की थी।

काकोरी कांड
चौरीचौरा कांड के बाद अचानक असहयोग आंदोलन वापस ले लिया गया। इसके कारण देश में फैली निराशा को देखकर उनका कांग्रेस के आजादी के अहिंसक प्रयत्नों से मोहभंग हो गया। फिर तो नवयुवकों की क्रांतिकारी पार्टी का अपना सपना साकार करने के क्रम में बिस्मिल ने चंद्रशेखर ‘आजाद’ के नेतृत्व वाले हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के साथ गोरों के सशस्त्र प्रतिरोध का नया दौर आरंभ किया लेकिन सवाल था कि इस प्रतिरोध के लिए शस्त्र खरीदने को धन कहां से आये? इसी का जवाब देते हुए उन्होंने नौ अगस्त, 1925 को अपने साथियों के साथ एक ऑपरेशन में काकोरी में ट्रेन से ले जाया जा रहा सरकारी खजाना लूटा। उन्होंने ट्रेन के गार्ड को बंदूक की नोक पर काबू कर लिया. गार्ड के डिब्बे में लोहे की तिज़ोरी को तोड़कर आक्रमणकारी दल चार हज़ार रुपये लेकर फरार हो गए. इस डकैती में अशफाकउल्ला, चन्द्रशेखर आज़ाद, राजेन्द्र लाहिड़ी, सचीन्द्र सान्याल, मन्मथनाथ गुप्त, रामप्रसाद बिस्मिल आदि शामिल थे. थोड़े ही दिनों बाद 26 सितंबर, 1925 को पकड़ लिए गए और लखनऊ की सेंट्रल जेल की 11 नंबर की बैरक में रखे गए। मुकदमे के नाटक के बाद अशफाक उल्लाह खान, राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी और रौशन सिंह के साथ उन्हें फांसी की सजा सुना दी गई।

अपनी आत्मकथा में रामप्रसाद बिस्मिल ने सबसे अधिक अशफाक के बारे में ही लिखा है. बिस्मिल अपनी आत्मकथा में एक बहुत ही मजेदार घटना का जिक्र करते हैं. उस वक्त दोनों की दोस्ती की वजह से यह अफवाह थी कि अशफाक बिस्मिल के प्रभाव में आकर हिंदू बन सकते हैं.

घटना यह है कि एक बार अशफाक बीमार हुए और वे बेहोश थे और उनके मुंह से राम-राम निकल रहा था. बिस्मिल इस घटना का जिक्र करते हुए लिखते हैं, ‘पास खड़े भाई-बंधुओं को आश्‍चर्य था कि ‘राम’, ‘राम’ कहता है. कहते कि ‘अल्लाह, अल्लाह’ करो, पर तुम्हारी ‘राम’, ‘राम’ की रट थी! उस समय किसी मित्र का आगमन हुआ, जो ‘राम’ के भेद को जानते थे. तुरंत मैं बुलाया गया. मुझसे मिलने पर तुम्हें शांति हुई, तब सब लोग ‘राम-राम’ के भेद को समझे!’

पंडित राम प्रसाद बिस्मिल की माता मूलरानी ऐसी वीरमाता थीं जिनसे वे हमेशा प्रेरणा लेते थे। शहादत से पहले ‘बिस्मिल’ से मिलने गोरखपुर वे जेल पहुंचीं तो पंडित बिस्मिल की डबडबाई आंखें देखकर भी उन्होंने धैर्य नहीं खोया। कलेजे पर पत्थर रख लिया और उलाहना देती हुई बोलीं, ‘अरे, मैं तो समझती थी कि मेरा बेटा बहुत बहादुर है और उसके नाम से अंग्रेज सरकार भी थरथराती है। मुझे पता नहीं था कि वह मौत से इतना डरता है। उनसे पूछने लगीं, ‘तुझे ऐसे रोकर ही फांसी पर चढ़ना था तो तूने क्रांति की राह चुनी ही क्यों? तब तो तुझे तो इस रास्ते पर कदम ही नहीं रखना चाहिए था।’ इतिहासकार बताते हैं कि इसके बाद ‘बिस्मिल’ ने बरबस अपनी आंखें पोंछ डालीं और कहा था कि उनके आंसू मौत के डर से नहीं, उन जैसी बहादुर माँ से बिछड़ने के शोक में बरबस निकल आए थे।

बिस्मिल पर अन्य व्यक्तियों के विचार
भगतसिंह
जनवरी १९२८ के किरती में भगत सिंह ने काकोरी के शहीदों के बारे में एक लेख लिखा था। काकोरी के शहीदों की फाँसी के हालात शीर्षक लेख में भगतसिंह बिस्मिल के बारे में लिखते हैं:
“श्री रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ बड़े होनहार नौजवान थे। गज़ब के शायर थे। देखने में भी बहुत सुन्दर थे। योग्य बहुत थे। जानने वाले कहते हैं कि यदि किसी और जगह या किसी और देश या किसी और समय पैदा हुए होते तो सेनाध्यक्ष बनते। आपको पूरे षड्यन्त्र का नेता माना गया। चाहे बहुत ज्यादा पढ़े हुए नहीं थे लेकिन फिर भी पण्डित जगतनारायण जैसे सरकारी वकील की सुध-बुध भुला देते थे। चीफ कोर्ट में अपनी अपील खुद ही लिखी थी, जिससे कि जजों को कहना पड़ा कि इसे लिखने में जरूर ही किसी बुद्धिमान व योग्य व्यक्ति का हाथ है।”

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के चतुर्थ सरसंघचालक रज्जू भैया ने बिस्मिल के बारे में लिखा है:

“मेरे पिताजी सन् १९२१-२२ के लगभग शाहजहाँपुर में इंजीनियर थे। उनके समीप ही इंजीनियरों की उस कालोनी में काकोरी काण्ड के एक प्रमुख सहयोगी श्री प्रेमकृष्ण खन्ना के पिता श्री रायबहादुर रामकृष्ण खन्ना भी रहते थे। श्री राम प्रसाद ‘बिस्मिल’ प्रेमकृष्ण खन्ना के साथ बहुधा इस कालोनी के लोगों से मिलने आते थे। मेरे पिताजी मुझे बताया करते थे कि ‘बिस्मिल’ जी के प्रति सभी के मन में अपार श्रद्धा थी। उनका जीवन बड़ा शुद्ध और सरल, प्रतिदिन नियमित योग और व्यायाम के कारण शरीर बड़ा पुष्ट और बलशाली तथा मुखमण्डल ओज और तेज से व्याप्त था। उनके तेज और पुरुषार्थ की छाप उन पर जीवन भर बनी रही। मुझे भी एक सामाजिक कार्यकर्ता मानकर वे प्राय: ‘बिस्मिल’ जी के बारे में बहुत-सी बातें बताया करते थे।”

आलोचक रामविलास शर्मा ने अपनी पुस्तक ‘स्वाधीनता संग्राम: बदलते परिप्रेक्ष्य में’ में बिस्मिल को लेकर लिखा हैः

“ऐसा कम होता है कि एक क्रान्तिकारी दूसरे क्रान्तिकारी की छवि का वर्णन करे और दोनों ही शहीद हो जायें। रामप्रसाद बिस्मिल १९ दिसम्बर १९२७ को शहीद हुए, उससे पहले मई १९२७ में भगतसिंह ने किरती में ‘काकोरी के वीरों से परिचय’ लेख लिखा। उन्होंने बिस्मिल के बारे में लिखा – ‘ऐसे नौजवान कहाँ से मिल सकते हैं? आप युद्ध विद्या में बड़े कुशल हैं और आज उन्हें फाँसी का दण्ड मिलने का कारण भी बहुत हद तक यही है। इस वीर को फाँसी का दण्ड मिला और आप हँस दिये। ऐसा निर्भीक वीर, ऐसा सुन्दर जवान, ऐसा योग्य व उच्चकोटि का लेखक और निर्भय योद्धा मिलना कठिन है।’ सन् १९२२ से १९२७ तक रामप्रसाद बिस्मिल ने एक लम्बी वैचारिक यात्रा पूरी की। उनके आगे की कड़ी थे भगतसिंह।”

बिस्मिल का अमर गीत : सरफ़रोशी की तमन्ना

सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
देखना है ज़ोर कितना बाज़ु-ए-कातिल में है

करता नहीं क्यूँ दूसरा कुछ बातचीत,
देखता हूँ मैं जिसे वो चुप तेरी महफ़िल में है

ए शहीद-ए-मुल्क-ओ-मिल्लत मैं तेरे ऊपर निसार,
अब तेरी हिम्मत का चरचा गैर की महफ़िल में है

सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
वक्त आने दे बता देंगे तुझे ऐ आसमान,

हम अभी से क्या बतायें क्या हमारे दिल में है
खैंच कर लायी है सब को कत्ल होने की उम्मीद,

आशिकों का आज जमघट कूच-ए-कातिल में है
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

है लिये हथियार दुशमन ताक में बैठा उधर,
और हम तैय्यार हैं सीना लिये अपना इधर

खून से खेलेंगे होली गर वतन मुश्किल में है,
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

हाथ जिन में हो जुनूँ कटते नही तलवार से,
सर जो उठ जाते हैं वो झुकते नहीं ललकार से

और भड़केगा जो शोला-सा हमारे दिल में है,
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

हम तो घर से निकले ही थे बाँधकर सर पे कफ़न,
जान हथेली पर लिये लो बढ चले हैं ये कदम

जिन्दगी तो अपनी मेहमान मौत की महफ़िल में है,
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

यूँ खड़ा मक़तल में क़ातिल कह रहा है बार-बार,
क्या तमन्ना-ए-शहादत भी किसी के दिल में है

दिल में तूफ़ानों की टोली और नसों में इन्कलाब,
होश दुश्मन के उड़ा देंगे हमें रोको ना आज

दूर रह पाये जो हमसे दम कहाँ मंज़िल में है,
वो जिस्म भी क्या जिस्म है जिसमें ना हो खून-ए-जुनून

तूफ़ानों से क्या लड़े जो कश्ती-ए-साहिल में है,
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

हमारी ख़्वाहिश

सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है,
देखना है ज़ोर कितना बाजू-ए-क़ातिल में है.

रहबरे राहे मुहब्बत, रह न जाना राह में,
लज़्ज़ते सहरा नवर्दी दूरी-ए-मंज़िल में है.

वक़्त आने दे, बता देंगे तुझे, ऐ आसमां!
हम अभी-से क्या बताएं, क्या हमारे दिल में है.

अब न अगले वलवले हैं और न अरमानों की भीड़,
एक मिट जाने की हरसरत अब दिले ‘बिस्मिल’ में है.

आज मक़तल में ये क़ातिल कह रहा है बार-बार,
क्या तमन्ना-ए-शहादत भी किसी के दिल में है!

ऐ शहीदे-मुल्को-मिल्लत, तेरे जज़्बों के निसार,
तेरी कुर्बानी का चर्चा गै़र की महफ़िल में है.

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