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प्रभु का शानदार प्रदर्शन लेकिन तारीफ उम्मीद से बहुत कम

सुरेश प्रभु को भारतीय जनता पार्टी में शामिल हुए बहुत अधिक वक्त नहीं हुआ है और उन्हें नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली राष्टï्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार में बतौर रेल मंत्री अभी एक साल भी पूरा नहीं हुआ है। परंतु रेल भवन में अपने अब तक के कार्यकाल में उन्होंने खूब सुर्खियां बटोरी हैं। ज्यादातर मौकों पर वह अच्छी वजहों से सुर्खियों में रहे। उन्होंने जो इकलौता रेलवे बजट पेश किया है वह विश्वसनीय पहल से भरा रहा। भारतीय रेल बजट के इतिहास में शायद वह पहले रेल मंत्री होंगे जिसने बजट में एक भी नई ट्रेन अथवा नई रेल लाइन की घोषणा नहीं की। इसके लिए बहुत साहस की जरूरत पड़ी होगी। उन्हें यह मंजूर नहीं था कि इसे अपने अथवा अपनी पार्टी के लिए वोट बैंक जुटाने का माध्यम बनाया जाए। वह अपने संसदीय क्षेत्र के लिए एक नई ट्रेन की घोषणा करके या अपने बॉस के संसदीय क्षेत्र के लिए नई रेल लाइन की घोषणा कर सकते थे।

इसके बजाय उन्होंने जो कुछ किया वह रेलवे के दीर्घावधि के स्वास्थ्य और व्यवहार्यता को ध्यान में रखकर किया। कई वर्षों से भारतीय रेल निवेश की कमी से जूझ रही है। इस वजह से देश की सबसे बड़ी जन एवं माल परिवहन सेवा की क्षमता में विस्तार नहीं हो पा रहा। उन्होंने एक झटके में भारतीय रेल के पूंजीगत खर्च की योजना में 71 फीसदी का इजाफा कर दिया और इसे एक लाख करोड़ रुपये के पार पहुंचा दिया। उन्होंने पांच साल के दौरान पूंजीगत निवेश योजना को 8.6 लाख करोड़ रुपये करने की बात कही। किसी रेल मंत्री की यह ऐसी पहली घोषणा थी।

प्रभु ने परियोजनाओं में एक लाख करोड़ रुपये का निवेश कर विभिन्न क्षेत्रों में रेलवे की क्षमता बढ़ाने के लिए नवोन्वेषी वित्तीय व्यवस्था का अनुसरण किया। इसमें उच्च बजटीय समर्थन, आंतरिक संसाधन जुटाने, सरकारी क्षेत्र की इकाइयों की बैलेंस शीट को आसान बनाने, राज्य सरकारों और बड़े उपभोक्ताओं के साथ संयुक्त उद्यम स्थापित करने और वित्तीय संस्थानों की मदद से संसाधन जुटाने जैसे उपाय शामिल हैं। देश का उद्यमी जगत तक घरेलू फंड की बढ़ी हुई लागत को लेकर परेशान था लेकिन प्रभु इन सब चिंताओं से विचलित नहीं हुए। उन्होंने भारतीय जीवन बीमा निगम से समझौता किया ताकि 1.5 लाख करोड़ रुपये में कम लागत का संस्थागत वित्त मिल सके। यह काम करने वाले भी प्रभु पहले व्यक्ति थे। यात्री एवं माल ढुलाई के लिहाज से अहम फ्रेट कॉरिडोर परियोजना भी धीमी गति से विकसित हो रही थी। प्रभु के पद संभालने के बाद इस अहम परियोजना को गति मिली है। नवंबर 2014 से अब तक 17,500 करोड़ रुपये के अनुबंधों को अंतिम रूप दिया जा चुका है। जबकि वर्ष 2006 में इस परियोजना की परिकल्पना से लेकर नवंबर 2014 तक महज 12,500 करोड़ रुपये के अनुबंध ही हो सके थे। इतना ही नहीं करीब 17,000 करोड़ रुपये के और अनुबंधों को मार्च 2016 तक अंतिम रूप दिया जाना है। परियोजना की चरणबद्घ शुरुआत वर्ष 2018 से होगी।
इन सबके बावजूद संकेत कुछ ऐसे हैं मानो प्रभु परियोजना क्रियान्वयन के अपने तिमाही लक्ष्य को हासिल नहीं कर सके हैं। हालांकि उनकी उपलब्धियां गत वर्ष की समान अवधि की तुलना में ज्यादा अवश्य हैं। जमीनी हकीकत देखें तो वर्ष 2015-16 की पहली दो तिमाहियों की पूंजीगत खर्च योजना के अनुसार भारतीय रेल को 28,000 करोड़ रुपये से कुछ अधिक की राशि खर्च करनी थी। अगस्त के आखिर तक वह 27,000 करोड़ रुपये से अधिक की राशि खर्च कर चुका है। पहली तिमाही का पूंजीगत खर्च लक्ष्य 13,231 करोड़ रुपये था जो जाहिर है पार कर गया। आम तौर पर यह माना जाता है कि पूंजीगत खर्च योजनाओं का खर्च लंबित रहता है क्योंकि साल की बाद वाली छमाही में ज्यादा धन की आवश्यकता होती है क्योंकि पहली दो तिमाहियों में सरकारी खरीद के ऑर्डर और परियोजनाओं की शुरुआत अवस्थित होती है। आश्चर्य नहीं कि 71,846 करोड़ रुपये की राशि इस वित्त वर्ष की अंतिम दो तिमाहियों में खर्च की जानी है।
संकेत यही हैं कि भारतीय रेल पूंजीगत खर्च के मौजूदा वित्त वर्ष के आरंभ में तय लक्ष्य को हासिल कर लेगी। रेलवे की माल ढुलाई क्षमता बढ़ाने के लिए आधुनिक और किफायती रोलिंग स्टॉक की मदद से कई पहल की गई हैं। 68 फीसदी उच्च उत्पादन के लिए नए वैगन बनाए गए हैं। इसके अलावा कोयला ढुलाई के लिए स्वदेशी डिजाइन वाले वैगन तैयार किए गए हैं जिनकी क्षमता मौजूदा 20.3 टन के बजाय 25 टन है। इसकी वजह से माल ढुलाई का राजस्व और बढ़ सकता है। वर्ष 2015-16 की पहली छमाही में यह वृद्घि 11 फीसदी रही।
लोकोमोटिव निर्माण की दो परियोजनाएं जो सात साल से लंबित थीं उन पर नए सिरे से काम शुरू हुआ है। बिहार में दो फैक्टरियों की सफल बोली से 3,500 करोड़ रुपये का पूंजी निवेश आएगा। इसका ज्यादा हिस्सा शेयर के रूप में विदेशी निवेश से आएगा। पहले ही बंदरगाहों से रेलवे संपर्क वाली 9 परियोजनाएं क्रियान्वियित हो चुकी हैं जबकि नौ अन्य परियोजनाएं निर्माणाधीन हैं। इन 18 परियोजनाओं में कुल 12,600 करोड़ रुपये का निवेश अनुमानित है। भोपाल में हबीबगंज और दिल्ली में आनंद विहार और बिजवासन स्टेशनों को निजी निवेशकों को विकसित करने के लिए दिया जा रहा है। अगले साल चार अन्य स्टेशनों को विकसित किया जाएगा। देश के 400 प्रमुख स्टेशनों को नया रूप देने की नीति को अंतिम रूप दिया जा चुका है। हां, हाल की कुछ रेल दुर्घटनाओं ने जरूर उनकी छवि को धक्का पहुंचाया है। लेकिन यह प्रश्न बरकरार है कि इन तमाम उपलब्धियों के बाद भी सुरेश प्रभु नजर में क्यों हैं और यह क्यों कहा जा रहा है कि वह लक्ष्यों से पीछे हैं या उनको और तेज गति से काम करना चाहिए? क्या उनका मूलतया भाजपा से न होना इसकी वजह है? या फिर भारतीय रेल को गति प्रदान करने की उनकी अपारंपरिक शैली इसकी वजह है?

साभार- http://hindi.business-standard.com/ से

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