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आदि मानव की धरोहर ः बूंदी में होसालपुरा के शैलचित्र

आदि मानव नदियों किनारे निवास करता था। उसने अपने अवकाश के क्षणों में अपने जीवन के अनवरत संघर्ष में अर्जित सफलता से आल्हादित हो अपने मनोरंजन एवं स्मृति स्वरूप अनेकानेक शैलचित्रों के माध्यम से अपनी कलात्मक अभिव्यक्ति को मूर्तरूप प्रदान किया। शैलचित्र अचल है, हजारों वर्ष पूर्व जहॉ बनाये गये थे, आज भी वहीं पर स्थित हैं। अतः जहाँ शैलचित्र उपलब्ध हैं, उस स्थान पर प्रागैतिहासिक काल में मानव अवश्य रहा होगा।

बून्दी में वर्ष 1977 में शैलचित्रों की खोज प्रारंभ हुई तथा रामेश्वरम् एवं गरड़दा नामक स्थानों पर महत्वपूर्ण शैलाश्रयों में बने शैलचित्र प्रकाश में आये। तदुपरांत गोलपुर, नलदेह, केवड़िया, पालकां, कंवरपुरा, माताजी का नाला, खमलोई, हाथीडूब, कुकरझार, पराना, कुण्डिका, भड़क्या, मोहनपुरिया का पठार तथा परासिया के शैलचित्र प्रकाश में आये।

बून्दी जिले में शैलाश्रयों की एक विस्तृत श्रृखंला है, जिनमें हजारों की सख्या में शैलचित्र बने हुए हैं। बूंदी के ये शैलचित्र विश्व मानचित्र में कहीं ना कहीं अपना महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। बून्दी के पुरास्थल हौलासपुरा में स्थित हाथीडूब, नचला, छापरिया, उड़ीमाया, खुर्द का नाला, धारवा, केवड़िया तथा नलदेह के शैलाश्रयों में बने शैलचित्रों के पुरामहत्व के दृष्टिगत रखते हुए पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग, राजस्थान सरकार द्वारा इन्हे संरक्षित स्मारक घोषित किया है। ये शैलचित्र शैलाश्रयों की छतों एवं भित्तियो पर चित्रित हैं।

प्रागैतिहासिक काल का प्रतिनिधित्व करने वाले ये शैलचित्र अत्यंत प्राचीन है। आदिमानव ने विभिन्न काल खण्डों में अनेकानेक वन्य जीवों, माण्डनों एवं मानवाकृतियों को भित्तियो पर चित्रित किया था। इन चित्रों में मुख्य रूप से गैरू, कत्थई तथा लाल रंग प्रयुक्त हुआ है। ये चित्र आसपास के परिवेश का दिग्दर्शन कराने में समर्थ हैं, जिनसे कला के जन जीवन पक्ष को सशक्त अभिव्यक्ति मिलती है।

बूंदी के मांगली, घोड़ा पछाड़ के चट्टानी कगारों पर सबसे लंबी करीब 35 किमी. लंबी शैल चित्र श्रृंखला बूंदी और भीलवाड़ा जिलों के मध्य पाई गई है , जिसे 10 हजार वर्ष प्राचीन माना जाता है।

इनकी खोज करने का श्रेय बूंदी के पुराअन्वेषक ओमप्रकाश शर्मा कुक्की को है। वे बताते हैं कि 9 अक्टूबर 1997 में पहली बार उन्हें शैल चित्र रामेश्वर महादेव के झरने के ऊपर चट्‌टानी भाग की गुफा में दिखाई दिए। उसके बाद 12 जून 1998 में गरड़दा के शैल चित्रों की खोज की। तभी से यह क्रम लगातार जारी है। शृंखलाओं की खोज करते हुए कुक्की हाड़ौती के चप्पे-चप्पे को देख चुके हैं। शैल चित्र भीलवाड़ा जिले के साथ-साथ टोंक जिले में भी मिले। ये शैल चित्र 10 हजार साल पुराने माने जा रहे हैं। यदि इनका कार्बन डेटिंग हो जाए तो इनका काल उससे भी पुराना मिलेगा।

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