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धरती मां का थर्मामीटर : येलोस्टोन नेशनल पार्क

मेरा जन्म मुरादाबाद में हुआ था जो जिम कार्बेट नेशनल पार्क के बहुत करीब है, यह पार्क शेर , तेंदुए , हाथी , चीतल , हिरन आदि जानवरों और विभिन्न किस्म के पक्षियों के लिए मशहूर है। मुझे गर्व है कि मैं इस विशाल वन्य क्षेत्र की गोद में पला और बड़ा हुआ हूँ और वन्य जीवन को काफी करीब से देखने का अवसर मिला है । लेकिन हाल ही में अमरीका के येलोस्टोन नेशनल पार्क की यात्रा के बाद ऐसा लगा कि हमारा जिम कार्बेट उसके सामने बेहद छोटा है। येलोस्टोन कई मामलों में एक अनन्य स्थान है.

येलोस्टोन क्षेत्र समुद्रतल से औसतन ८००० फिट ऊंचा है, यहाँ की कई चोटियां तो १३,००० फ़ीट ऊंची हैं , ८९८३ वर्ग किमी के इलाके में बर्फ से ढकी पहाड़ी चोटियां , शुद्धतम जल से लबालब झीलें और नदियां , भरपूर वन्य जीवन, वनस्पतियाँ तो हैं ही साथ ही यह धरती मां की जीवंत प्रयोगशाला भी है, जिस में विकास और विनाश के रहस्य अध्ययन करने का पूरा पूरा अवसर है.

सिएटल से येलोस्टोन जाने के लिए सड़क मार्ग से स्पोकेन होकर १४ घंटे लगते हैं , फ्लाइट से जाना आसान है इसलिए हमने पार्क के करीबी एयरपोर्ट लिए अलास्का एयर की फ्लाइट ली , यह दूरी कोई १००० मील की है. पूरा रास्ता वाशिंगटन राज्य के बर्फीले पहाड़ों , हरे भरे मैदानों से हो कर गुजरता है, मीलों मीलों में फैले खेत आबादी का पता नहीं, पूरी खेती बड़ी यंत्रीकृत है। यह राज्य साल में इतना गेंहूं पैदा कर लेता है जो पूरे अमरीका के लिए काफी होता है. दरअसल बोजमैन येलोस्टोन जाने के लिए महत्वपूर्ण पड़ाव है, यहाँ से पार्क का प्रवेश द्वार केवल ९० मील रह जाता है.

बोजमैन उतरते ही एयरपोर्ट पर से ही कार एक सप्ताह के भाड़े पर ले ली , इस से पार्क में घूमना काफी सहज हो गया क्योंकि पार्क में सारे स्पॉट एक दूसरे से काफी दूर – दूर हैं और इसके अलावा कोई दूसरा सहज साधन भी उपलब्ध नहीं हैं।

येलोस्टोन इतना महत्वपूर्ण क्यों है

येलोस्टोन की प्राकृतिक प्रक्रिया पूरी तरह से संरक्षित तापीय इको प्रणाली में कार्यरत है और अभी तक इसमें मानवीय दखलंदाजी बहुत कम हुई है. इस लिए पृथ्वी के निर्माण और संचालन प्रक्रिया को समझने के लिए यह क्षेत्र आदर्श है , यही नहीं यहाँ ११,००० वर्षों से मानवीय गतिविधियां निर्बाध रूप से चल रही हैं इस लिए मानव जाती के इतिहास और वास्तुशिल्प का सिलसिलेवार लेखा जोखा मौजूद है.

यहाँ भूगोलविद और अन्य वैज्ञानिक लैंडस्केप स्तर पर बदलाव से इको -प्रणाली पर प्रभाव से लेकर सूक्ष्म जीव संरचनाओं के अध्ययन में जुटे हुए हैं जिनका प्रभाव केवल पार्क ही नहीं पूरी दुनिया पर पड़ने वाला है.

ऐतिहासिक कालखंड

पार्क का क्षेत्र तीन अमरीकी राज्यों मोंटाना,व्योमिंग और आइडाहो में फैला हुआ है. इस इलाके को विभिन्न कबीलों और जनजातियों ने ११,००० वर्षों से अपना आवास बनाया था.ये लोग आखेट करते थे, झरनों, नदियों से मछलियां पकड़ते थे , विभिन्न जड़ी बूटियों को खाने और उपचार के काम में लेते थे , ये लोग तापीय झरनों का पानी उपचार और धार्मिक अनुष्ठानों में इस्तेमाल करते थे. अमरीका में आये यूरोपीय लोगों को अठाहरवीं शताब्दी की प्रारम्भ में इस विलक्षण इलाके का पता लगा.१८३० के आस पास ओस्बोर्न रसेल ने इस इलाके के बारे में काफी विस्तार से लिखा, उसके आलेख से प्रभावित होकर १८६९ में एक अध्ययन टीम डेविड ई कोलमेन के नेतृत्व में यहाँ आयी , टीम ने येलोस्टोन झील के अप्रतिम सौंदर्य, कैन्यन विस्तार, तापीय बेसीन और रॉक बनावट के बारे में अपनी विस्तृत रिपोर्ट तैयार की। इसके अगले वर्ष चार्ल्स कुक और फॉल्सम की खोजी टीम ने भी ऐसी ही रिपोर्ट प्रस्तुत की , इसके आधार पर १८७२ में राष्ट्रपति ग्रांट और अमरीकी सीनेट ने इस इलाके को संरक्षित क्षेत्र अर्थात नेशनल पार्क घोषित कर दिया। इस पार्क को दुनिया का पहला संरक्षित क्षेत्र होने का भी गौरव हासिल है। उस समय एक सीनेटर ने कहा था कि यह क्षेत्र अमरीका के फेफड़ों के लिए ताजा हवा का काम करेगा।प्रारम्भ में इसकी देखभाल अमरीकी सेना के पास रही बाद में १९१६ में नेशनल पार्क सर्विस की स्थापना के बाद से पार्क उसके अधीन कर दिया गया.

कहानी की शुरुआत

एक अनुमान के हिसाब से पृथ्वी अब से कोई ४६०० करोड़ वर्ष पहले बनी तब से लेकर ५४०० लाख वर्ष पूर्व तक के काल की चट्टानों से येलोस्टोन का इलाका बना है. ये सारी चट्टानें टीटान,बेरटूथ, विंड रिवर और ग्रॉस वेंट्रे इलाकों में हैं. ५४०० लाख से लेकर ६६० लाख वर्ष के काल में अमरीका का पश्चिमी इलाका समुद्र, रेतीले पहाड़ों , विस्तृत मैदानों से आछादित था, इसके बाद पहाड़ बनने की प्रक्रिया से रॉकी माउंटेन क्षेत्र विकसित हुआ. यहाँ पर्वत बनने और पृथ्वी की सतह ऊँची नीची होने के कारण हिलने डुलने,और बर्फ जमने से येलोस्टोन इलाका अस्तित्व में आया. ५०० लाख वर्ष पहले पार्क के उत्तरी और पूर्वी इलाके में अब्सरोका श्रंखला कई ज्वालामुखी फटने से अस्तित्व में आयी. लेकिन उस ज्वालामुखी प्रक्रिया का सम्बन्ध आजकी येलोस्टोन ज्वालामुखी गतिविधियों से नहीं है।

एक अनुमान के अनुसार ३०० लाख वर्ष पूर्व आज का पश्चिम पूर्व पश्चिम धुरी के साथ खिंचता गया। खिंचने की यह प्रक्रिया १७० लाख वर्ष पहले कुछ और बढ़ गयी और अभी तक जारी है जिसके कारण नए ,बेसिन बने है , उत्तर-दक्षिण पर्वत श्रंखला और उसकी लम्बी घाटी भी इसी प्रक्रिया से बनी है. इस तरह से पूरा दक्षिण का क्षेत्र जिसमें येलोस्टोन भी शामिल है निर्मित हुआ है. १६५ लाख वर्ष पहले आज के समूचे आइडहो, ओरेगॉन और नेवाडा इलाके में ज्वालामुखी विस्फोटों का सिलसिला निरंतर चलता रहा. वहां से पिघला हुआ लावा प्रवाहित हो कर दक्षिण आइडहो से येलोस्टोन की ओर आ गया। उत्तरी अमरीका की प्लेट इस पिघलते हुए लावा पर खिसक कर दक्षिण पश्चिम दिशा में आ गयी जिससे येलोस्टोन क्षेत्र भी पिघले लावा के समीप आ गयी , तबसे ज्वालामुखी इस क्षेत्र के अंदर लगातार सक्रिय है.

प्रकृति की अपनी प्रयोगशाला

पृथ्वी की निचली सतह से पिघली हुई चट्टानें पिछले २० लाख वर्षों से येलोस्टोन में ऊपरी सतह के बेहद करीब हैं जिसके कारण ऊपरी सतह के बहुत करीब कहीं पिघली तो कहीं ठोस चट्टानों के कक्ष बन गए हैं, पिघली चट्टानों की गर्मी से धरती की ऊपरी सतह लगातार फैलती और ऊंची उठती रहती है, इसी कारण इस क्षेत्र में भूकंप भी निरंतर आते रहते हैं. जगह जगह आये क्रैक्स में से पिघली चट्टानों की गर्मी, राख और गैस वायुमंडल तक फव्वारे जहाँ तहँ से निकलती रहती है. जहाँ जहाँ पिघले हुए लावा के भूमिगत चैम्बर खाली हो गए हैं वहां जमीन धंस गयी है और काल्डेरा यानी ज्वालामुख-कुंड बन गए हैं. कुल मिला कर येलोस्टोन में तीन विशाल काल्डेरा हैं जो भूगर्भ शास्त्रियों को इतने समीप से प्रकृति के रहस्यों का अध्ययन करने का अवसर प्रदान करते हैं.

येलोस्टोन लेक

यह लेक १३६ वर्ग मील के क्षेत्र में फ़ैली है और इसका घेरा ११० मील का है , समुद्र तल से ७,७३२ फीट की ऊंचाई पर अवस्थित यह लेक इलाके का सबसे बड़ा जलभंडार है, लेक की गहराई कहीं कहीं ३९२ फ़ीट तक चली गयी है , जाड़ों में लेक पर ३ फ़ीट बर्फ की चादर जम जाती है. हाँ ,जहाँ जहाँ लेक में गर्म सोते हैं वहां बर्फ नहीं जमती है। लेक दिसंबर में जमती है और मई या फिर जून के प्रारम्भ में पिघल जाती है। लेक में कटथ्रोट ट्राउट, लोंगनोज डेस , रेडसीडे शाइनर, लांगनोज सकर्स मछलियां पाई जाती है. लेक का पानी इतना साफ़ है कि फिशिंग ब्रिज से कटथ्रोट ट्राउट, लोंगनोज डेस मछली आसानी से देखी जा सकती हैं. अन्य किस्म बहुत छोटे आकार की होती हैं अतः उन्हें स्पॉट करना ब्रिज से संभव नहीं है.

येलोस्टोन नदी पार्क की दक्षिण पूर्वी अब्सरोका पर्वत श्रंखला यौंत शिखर के ढलान से अपना सफर शुरू करके ६७१ मील चल कर मोंटाना और नार्थ डकोटा सीमा पर मिसौरी नदी में मिल जाती है, अंतत मिसोरी गल्फ आफ मेक्सिको में अटलांटिक सागर से विलीन हो जाती है.

लेक के किनारे विशेषकर फिशिंग ब्रिज के आस पास के कीचड वाले इलाके में सुबह शाम मूज देखने को मिल जाते हैं।

पार्क के अन्य आकर्षक स्थल

ओल्ड फैथफुल गाइजर

इस गाइजर को १८७० में वशबर्न और उनकी खोजी टीम ने ढूंढा था, इसका नामकरण इरप्शन की नियमितता को देखकर किया गया था. जब से यह खोजा गया है इसके १० लाख से भी अधिक इरप्शन हो चुके हैं ! इरप्शन का अनुमान इतना सटीक होता है कि इसमें १० से २० मिनट का अंतर रहता है.

हम जब ओल्ड फैथफुल पहुंचे तब गैसीय प्रवाह हो कर चुका था, टूरिस्ट सेंटर के रिसेप्शन पर अगले गैसीय प्रवाह की संभावना ५.३० अंकित की गई थी. सेंटर से निकल कर जब हम विशाल फैथफुल क्षेत्र में पहुंचे तो गोल घेरे में ५०० से भी अधिक दर्शक रोमांचक घटना के इंतजार में वैठे हुए थे ,ठीक 5.२९ पर मैदान के बीचों बीच से सफ़ेद धुआं निकलना शुरू होगया ५.३४ पर यह धुआं गैसीय प्रवाह में बदल गया और इसकी ऊंचाई १५० फ़ीट हो गयी, साथ ही तेजी से आवाज भी निकल रही थी, यह रोमांचक सिलसिला कोई ५ मिनट तक जारी रहा, लोग सांस रोक कर मंत्रमुग्ध इसे एक तक देख रहे थे , धीरे धीरे प्रवाह कम होता गया. विशेषज्ञों की माने तो एक बार के इरप्शन से ८,४०० गैलन तक प्रवाहन होता है और स्रोत से निकलने वाले पानी का तापक्रम २०४ डिग्री फारेनहाइट तक रहता है। गैस का तापमान ३५० डिग्री फारेनहाइट तक पहुँच जाता है.

मैमथ हाट स्प्रिंग्स टेरेस

ये स्प्रिंग्स पश्चिमी प्रवेश द्वार के बिलकुल समीप ही हैं. दुनिया में कहीं भी मैमथ हाट स्प्रिंग्स जैसे फाउंटेन न तो प्रकृतिक रूप में देखने को मिलते हैं न ही कहीं मनुष्य द्वारा बनाये जा सके हैं। टेरेस की धवल और कहीं कहीं रंगीन चट्टानों से धीरे धीरे पानी बहता रहता है। ये स्प्रिंग प्रारम्भ से उन लोगों को आकर्षित करते रहे हैं जो अपनी विभिन्न बीमारियों का हल खनिज जालों में तलाशते रहे हैं। मैमथ हाट स्प्रिंग येलोस्टोन के गहरे वाल्कनीक बालों की बाह्य अभिव्यक्ति कहे जा सकते हैं, हालाँकि ये स्प्रिंग काल्डेरा क्षेत्र से बाहर हैं लेकिन फिर भी विशेषज्ञों की मने तो इनमें गर्म हवाओं का प्रवाहन येलोस्टोन के उन्हीं मग्नामैटिक प्रणाली से हैं जो यहाँ के अन्य तापीय क्षेत्रों को सक्रिय रखे हुए हैं. नारिस गाइजर बेसिन और मैमथ के बीच में फाल्ट लाइन है जिसके कारण उसके बीच में तापीय पानी बहता है. इस क्षेत्र में अनेक बासाल्ट इरप्शन हो चुके हैं , मैमथ क्षेत्र में गर्मी का स्रोत शायद बासाल्ट ही हैं।

तापीय गतिविधि इस इलाके में कई हज़ार वर्षों से जारी है , टेरेस पहाड़ी पर ट्रेवरटाइन की मोटी चादर चढ़ी हुई है. मैमथ हाट स्प्रिंग टेरेस उस पहाड़ी से जहाँ आज हमने इसे देखा आगे परेड ग्राउंड तक चले गए हैं और आगे जा कर बॉयलिंग नदी में मिल जाते हैं। देखा जाय तो मैमथ हाट स्प्रिंग होटल और फोर्ट येलोस्टोन पुरानी टेरेस संरचना पर ही बने हुए हैं. जब १८९१ में जब फोर्ट की जमीन पर निर्माण कार्य प्रारम्भ हुआ था तो यह चिंता व्यक्त की गयी थी कि नीचे की खोखली हुई जमीन भवन का भर नहीं संभल पाएगी , आज भी परेड ग्राउंड में अनेक बड़े आकार के गहरे होल देखे जा सकते हैं।


ग्रैंड प्रिस्मैटिक

यह तो सही है कि ओल्ड फेथफुल ज्यादा प्रसिद्ध है लेकिन येल्लोस्टोने पार्क में सबसे ज्यादा फोटो ग्रैंड प्रिस्मैटिक हाट स्प्रिंग के लेते हैं , इसका कारण इसके चमचमाते इंद्रधनुषी रंग और इसका विशाल आकार है.पार्क अधिकारीयों ने इसके इर्द गिर्द विशाल आकार का बोर्ड-वाक बनाया है हम इस बोर्ड-वाक पर चलते चलते चमकीले नीले, पीले और अन्य रंगों के इस स्प्रिंग को केवल मन्त्र मुग्ध हो कर निहारते रहे. अब तक प्रकृति का ऐसा नजारा कहीं भी देखने को है. ये स्प्रिंग्स १० मंजली बिल्डिंग जितने गहरे हैं , अंदर दरकी हुई जमीन से पानी १२१ फ़ीट ऊपर उछाल मार कर आता है ग्रैंड प्रिस्मैटिक का आकार फुटबॉल के मैदान जितना बड़ा है , ग्रैंड प्रिस्मैटिक के विभिन्न किस्म के रंग अतिशय गर्म वातावरण में जीवित रहने वाले बैक्टीरिया के कारण है, बीच का नीला रंग सब रंगों में ज्यादा प्रधान है क्योंकि क्योंकि पानी नीली वेब-लेंथ को सबसे ज्यादा बिखराता है. जिसके कारण आँख को नीला रंग दीखता है.

प्रकृति का थर्मामीटर

येलोस्टोन में किये जा रहे अध्ययन से पता चला है कि प्रकृति में प्रतिकूल ताप पर भी जीवन संभव है, इससे लगता है कि अन्य ग्रहों पर भी किसी न किसी रूप में जीवन होने की संभावनाएं हैं. १९६८ में शोधकर्ता थामस ब्रॉक ने पहली बार येलोस्टोन के उच्च तापीय स्प्रिंग में माइक्रोब खोज कर चिकित्सा और विज्ञान केक्षेत्र में धमाका किया था, इस शोध से जीवन सम्बन्धी अन्य रहस्यों को भी धीरे धीरे अनावृत करने का काम काफी आगे बढ़ा है.

मिडवे गाइजर बेसिन के अन्य गाइजर और पूल

येलोस्टोन के मध्य गाइजर बेसिन भले ही आकार में छोटे हैं लेकिंग उनमें काफी विविधता है , इनमें से हम एक्सेलसियर गाइजर, विशाल गाइजर क्रेटर, फिरोजी पूल और ओपल पूल देख पाए। फायर होल नदी के पास में घूमते हुए विविध किस्म के गैसीय पार्टिकल की गंध का अनुभव भी हुआ बताते हैं कि सन १८०० के आस पास एक्सेलसियर गाइजर से ३०० फिट की ऊंचाई तक गैसीय पदार्थ निकला करते थे , इस पूरे क्षेत्र में इसी लिए घूमते समय पूरी सावधानी की सलाह दी जाती है क्या पता कब गैसीय पदार्थ फव्वारे की तरह निकल पड़ें ऐसा इसलिए भी कि १९८५ में यहीं पर अचानक दो दिन तक लगातार इरप्शन हुआ जिसकी ऊंचाई ८० फिट तक नापी गयी।

मिडवे गाइजर बेसिन कहाँ हैं ?

ये गाइजर ओल्ड फेथफूल से करीब ही उत्तर में हैं, यहाँ जाने के लिए हमने तो पश्चिम प्रवेश द्वार से ग्रैंड लूप रोड पर २५ मील ड्राइव किया, यहाँ दोपहर में जबरदस्त भीड़ रहती है , हमारे कुछ मित्रों ने सलाह दी थी कि सुबह सवेरे पहुंचना आसान है, उनकी सलाह मान कर हम इन्हे आराम से देख पाए.

येलोस्टोन का ग्रैंड कैनियन

यहाँ का ग्रैंड कैनियन सच में देखने वाली जगह है , यह पार्क के उत्तरी पूर्वी किनारे पर है, समीप में छोटा सी आबादी कैनियन विलेज है. लगातार जंगल, पहाड़ देखते देखते यहाँ कुछ दुकानें, रेस्टॉरेंट , ठहरने के लिए कई लाज और पर्यटक केंद्र होने के कारण लगता है जैसे शहरी आबादी में पहुँच गए हों। ग्रैंड कैनियन हजारों वर्ष तक हवा, पानी और अन्य प्रकृतिक हलचलों का नतीजा है .कैनियन २० मील से भी अधिक लम्बा है और चौड़ाई कोई डेढ़ मील है, कैनियन की दीवारें १००० फिट ऊंची हैं जिन्हे देख कर लगता है कि जैसे लाखों संगतराशों ने मिल कर इस अगढ़ रचना को मिल कर सैकड़ों हजारों साल में तराशा हो.इस कैनियन मार्ग से येलोस्टोन रिवर बहती है, यह व्योमिंग, मोनटाना, नार्थ डकोटा राज्यों से गुजर कर ६०० मील का सफर तय करती है , यह पूरी तरह से स्वछंद है कहीं भी इस पर कोई डैम नहीं बनाया गया है। कैनियन विलेज के पास दो आब्सर्वेषां पाइंट हैं जहाँ से येलोस्टोन फॉल की विशालता और भव्यता को महसूस किया जा सकता है, फाल तक पहुँचने के लिए ट्रेल भी हैं, रास्ता जरा संकरा है, बहुत से सैलानी वहां जा रहे थे लेकिन हम हिम्मत नहीं जुटा पाए.

लामार वैली

अपने जीवन में अभी तक बहुत सारी घाटियां देखी हैं लेकिन जितना विस्तृत आकार इस घाटी का है मानिने और कहीं नहीं देखा है, जहाँ तक नजर दौड़ाओ हरी घास, वृक्ष और पीछे बर्फ से ढके पहाड़ , देखो तो देखते ही रह जाओ , इसे हम बायसन घाटी भी कह सकते हैं, यहाँ पूरा बायसन का बसेरा है, बायसन देखने में काली भैंसे लगते हैं और प्रकृति ने इनके ऊपर भूरे रंग का दोशाला उढ़ा दिया है , स्वभाव से यह खासे आक्रामक होते हैं और ज्यादातर झुण्ड में रहते हैं, इनके झुण्ड के सामने अन्य जानवर नहीं ठहरते हैं. हमारी आज की जिंदगी फ़ोन, मोबाइल, ई मेल, सोशल मीडिया संदेशों के बीच उलझ कर रह गयी है, लामार वैली में यह सब कुछ नहीं है , ऐसा लगता है जैसे समय ठहर गया हो, और प्रकृति ने हमारे जीवन को चार्जिंग पर लगा दिया हो , सच मानिये लामार से लौट कर हमने अपने जीवन को पूरी तरह से रिचार्ज महसूस किया.! यहाँ पल पल बदलते मौसम को देखना अपने आप में अविस्मरणीय अनुभव रहा.

नारिस थर्मल गाइजर

नारिस गाइजर बेसिन येलोस्टोन पार्क के व्योमिंग क्षेत्र में हैं , ये पार्क का सबसे गर्म तापीय भाग है , इसमें तीन मुख्य बेसिन हैं :

पोर्सलीन – इसमें दूधिया रंग के भाप भरे परिदृश्य हैं जो ०.७५ मील की धूल भरी ट्रेल और बोर्डवॉक कैस्केड के जरिये देखे जा सकते हैं , यहाँ तापीय गतिविधियों के कारण पेड़ एक दम सूख गए हैं।

बैक बेसिन – यह घने पेड़ों वाला क्षेत्र है जिसमें कई गाइजर और तापीय स्प्रिंग हैं , इसके चारों ओर १.५ मील का धूल भरा ट्रेल और बोर्ड वाक है.

सौ स्प्रिंग वाला मैदान – यह नारिस गाइजर बेसिन का ट्रेल के बाहर का इलाका है, यहाँ की हवा में जबरदस्त अम्लीय उपस्थिति है, जमीन पोली और खतरनाक है इस लिए पार्क अधिकारी सैलानियों को यहाँ आने के लिए हतोत्साहित करते हैं.

नारिस बेसिन में सतह से १००० फ़ीट जबरदस्त भूगर्भीय तापीय गतिविधि चल रही है , नारिस तापीय प्रणाली में पार्क का सबसे अधिक तापक्रम ४५९ डिग्री फारेनहाइट रेकॉर्ड किया गया है.आश्चर्य की बात यह है कि इतने अधिक तापक्रम के वावजूद यहाँ सेजब्रश छिपकली आराम से रह लेती है. यहाँ अम्लीय ताल और उच्च तापक्रम वाले पानी के सतही किनारों पर हरे, गुलाबी और नारंगी रंग के अति सूक्ष्म जीव मजे से पनपते हैं, इन तालों से वहने वाले आयरन डाई आक्साइड, आर्सेनिक कम्पाउंड , सल्फर के कारन रंगों की छठा कुछ और निखार आती है, इन्ही के कारण पूरा क्षेत्र रंग बिरंगा नजर आता है.

पार्क का वन्य जीवन

पार्क में वन्य जीवन भी काफी विविधता से भरा है काले और ग्रिज़ली भालू, यल्क, बायसन तो हैं ही साथ ही स्तनपायी जीवों की ६० से भी अधिक किस्में मौजूद हैं। हम पार्क में रहे लेकिन बायसन के अलावा कुछ भी नहीं देख पाए. आख़िरी दिन जब हम बोजमैन लौटते समय गैलाटिन कैनियन से निकल रहे तभी हमें सड़क के बाएं हाथ को ग्रिज़ली भालू दिखाई दिया, हमने और हमारे आगे वालों ने अपनी अपनी कर रोकीं, यह भालू आराम से सड़क पार करके बहते झरने के करीब पहुँच गया वहां रूक कर बनस्पती खाई और फिर झरने में उतर कर आगे बढ़ गया.

पार्क में पक्षी जीवन भी काफी विविधता भरा है , यहाँ बाल्ड ईगल,ब्लैक बिलड मैगपाई , ग्रे जे , कव्वे का बड़ा भाई रैवेन , ऑस्प्रे , कनाडियन गीस , मैलर्ड डक,ट्रम्पेटेर हंस , सफ़ेद पेलिकन, पहाड़ी ब्लू बर्ड बहुतायत से पाए जाते हैं.

ओल्ड फेथफुल इन

पार्क और उसके बाहर ठहरने के बहुत सारे विकल्प उपलब्ध हैं। हम पार्क के गेट से कोई १० मील पहले रेनबो कैम्पिंग साइट पर एक आठ कमरे वाले बड़े घर में रुके थे जो काफी आरामदेह और किफायती रहा. लेकिन येलोस्टोन में ठहरने के लिए सबसे बेहतरीन जगह ओल्ड फेथफुल इन है जो ओल्ड फेथफुल गाइजर के ठीक सामने है। इसे राबर्ट सी रीमार ने १९०४ में डिजाइन किया था , उस ज़माने में यह १,४०,००० डालर की लागत में तैयार हुआ था. यह दुनिया भर में विशालतम लॉग स्टाइल संरचना है, इसकी लॉबी ७४ फ़ीट ऊंची है.इसमें लकड़ी के अलावा ज्वालामुखी से निकले हुए पदार्थों का भी इस्तेमाल किया गया है। यहाँ आने वाले सैलानियों में होटल में ठहरने से लेकर भोजन करने के लिए जबरदस्त क्रेज है. रात के भोजन के लिए अतिथि डाइनिंग हॉल के सामने शाम चार बजे से ही लाइन लगाकर खड़े हो जाते हैं.

होटल पिछले सौ वर्षों से अतिथि सेवा और अच्छे भोजन के लिए सैलानियों में क्रेज से कम नहीं है.पूरी लकड़ी की संरचना होने के वावजूद इस होटल में ठहरने के लिए १४० कमरे मुख्य संरचना में हैं.१९१४ और १९२७ में भवन विस्तार किये जाने परयहाँ कुल मिला कर ३०० कमरे हो चुके हैं. होटल मई में खुलता है और अक्टूबर के प्रारम्भ तक खुला रहता है.

पार्क में कब आएं

यहाँ ग्रीष्म ऋतू की शुरुआत जून में होती है लेकिन मौसम जून अंत से खुशनुमा होता है। मेरे विचार से यहाँ जून के तीसरे सप्ताह में आना चाहिये तब तक पार्क के सारे स्पॉट सैलानियों के लिए खुल जाते हैं , हालांकि इन दिनों भी सुबह सवेरे हल्की सी बर्फ रहती है. वर्ष के इस भाग में वन्य जीवन भी पूरी तरह देखा जा सकता है.
सर्दी में लेक के ऊपर तो दो फिट मोटी बर्फ की चादर जमी होती है. ज्यादातर स्पॉट तक जाना संभव नहीं हो पाता है। इन दिनों पारा शून्य से डिग्री नीचे तक पहुँच जाता है. जहाँ तक निगाह जाएगी बर्फ ही बढ़ देखने को मिलेगा. आवागमन का एकमात्र साधन स्नो कोच या फिर स्नो मोबाइल रहता है. इस सबका अलग ही आनंद है, लेकिन फिर भी बेहतर होगा कि पहली बार गर्मी के मौसम में आया जाय.
लेख व छाया प्रदीप गुप्ता
कॉपीराइट प्रदीप गुप्ता २०१७

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