आप यहाँ है :

भारतीय साहित्य के अंतरराष्ट्रीय महामंथन में डॉ. चन्द्रकुमार जैन की प्रभावी भागीदारी

राजनांदगाँव । नागपुर विश्वविद्यालय में स्नातकोत्तर हिंदी विभाग द्वारा आयोजित बहुभाषी अंतरराष्ट्रीय शोध संगोष्ठी में दिग्विजय कालेज के हिंदी विभाग के राष्ट्रपति सम्मानित प्राध्यापक डॉ. चन्द्रकुमार जैन ने प्रमुख अतिथि वक्ता के रूप में सहभागिता की। भारतीय साहित्य के चिंतन व चुनौतियों पर एकाग्र इस महामंथन में तीन दिनों तक पांच भाषाओं के चिंतकों और वक्ताओं ने अपने उदगार व्यक्त किए ।सांस्कृतिक संध्या में हुए बहुभाषी कवि सम्मेलन की बागडोर भी पूरी कुशलता से सँभालते हुए डॉ. जैन ने आयोजन को स्मरणीय बनाने में अहम भूमिका अदा की।

जाने-माने साहित्यकार प्रो. रमेशचंद्र शाह, प्रख्यात आलोचक-चिंतक और अज्ञेय जी की तार सप्तक श्रृंखला के हस्ताक्षर प्रो.नंदकिशोर आचार्य, अमेरिका के प्रो. बलराम सिंह, चीन के प्रो. कैलाशनारायण तिवारी, अफगानिस्तान के प्रो. ए.के.रशीद, लन्दन की श्रीमती जय वर्मा, इग्नू नयी दिल्ली के प्रो. जितेंद्र श्रीवास्तव, चिंतक प्रो. सूरज पालीवाल, हिंदी साहित्य सम्मेलन प्रयाग के सभापति प्रो. सूर्यप्रसाद दीक्षित, तुलनात्मक भारतीय साहित्य के प्रख्यात विचारक प्रो. इन्द्रनाथ चौधरी, केंद्रीय हिंदी संस्थान के निदेशक और भारतीय हिंदी परिषद् के सभापति प्रो. नंदकिशोर पांडेय, उत्तरप्रदेश हिंदी संस्थान के अध्यक्ष प्रो. राजनारायण शुक्ल, पंजाब विश्वविद्यालय के प्रो. अशोक सब्बरवाल, वर्धा विश्वविद्यालय के प्रो. अवधेश शुक्ला, जबलपुर के प्रो. त्रिभुवननाथ शुक्ल, मुम्बई विश्वविद्यालय के प्रो. रतनकुमार पांडेय, जेएनयू नयी दिल्ली के प्रो. सुधीर सिंह, सामजिक विज्ञान संस्थान नागपुर के प्रो. कपिल सिंघल, नागपुर विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग अध्यक्ष प्रो. प्रमोद शर्मा, आयोजन संयोजक प्रो.मनोज पांडेय, छत्तीसगढ़ के जयप्रकाश मानस, डॉ. सुधीर शर्मा जैसी अनेक जानी-मानी हस्तियों की भागीदारी वाले इस ऐतिहासिक आयोजन में डॉ. चंद्रकुमार जैन ने अपनी शब्द सम्पदा और प्रस्तुति शैली की अमिट छाप छोड़ी। उल्लेखनीय है कि डॉ. जैन अब तक नागपुर यूनिवर्सिटी में ही तीन अंतरराष्ट्रीय शोध संगोष्ठियों में भागीदारी कर चुके हैं ।

अतिथि वक्तव्य में डॉ.जैन ने समकालीन भारतीय महाकाव्यों की चर्चा करते हुए भारतीय साहित्य के गौरव ग्रंथ राष्ट्रसंत आचार्य विद्यासागर जी द्वारा रचित मूकमाटी महाकाव्य के योगदान पर विशेष रूप से प्रकाश डाला । डॉ. जैन के वक्तव्य को केरल के श्री शंकराचार्य संस्कृत विश्वविद्याल की प्रोफेसर और प्रतिष्ठित विदुषी प्रो.के.श्रीलता और जाने-माने अंग्रेजी लेखक और चिंतक तथा गोवा विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभागाध्यक्ष प्रो. आनंद पाटिल ने मील का पत्थर निरूपित किया और कहा कि ऐसे विषयों और ग्रंथों पर निरंतर चिंतन और शोध होना चाहिए।

गौरतलब है कि डॉ. जैन की सहभागिता के दौरान राजनांदगाँव और दिग्विजय कालेज की साहित्यिक विरासत के स्वर लगातार गूंजते रहे । मुक्तिबोध जी ने नागपुर विश्वविद्यालय से ही हिंदी में एम.ए. किया था और शहर के दिग्विजय कॉलेज में प्राध्यापक रहे । लिहाज़ा, राजनांदगाँव से नागपुर के बीच अतीत के संवाद को डॉ. जैन ने अपने अंदाज में वाणी देकर आयोजन में संस्कारधानी के गौरव को बड़ी कुशलता से रेखांकित कर दिया । लोगों ने उनके वक्तव्य और कवि सम्मेलन में उनकी शैली और प्रवाह का भरपूर लुत्फ़ उठाया और सभी ने उनकी मुक्त कंठ से सराहना कर खुशी ज़ाहिर की । ऐतिहासिक आयोजन के संयोजक डॉ. मनोज पांडेय ने खास तौर पर डॉ. चन्द्रकुमार जैन का आत्मीय परिचय देते हुए अपनी शुभ कामना व्यक्त की और सभी सहयोगियों का आभार माना।



सम्बंधित लेख
 

Back to Top