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एक सैनिक की व्यथा

(कश्मीर में लागू आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पावर एक्ट AFSPA को हटाने की चल रही मुहिम पर एक सैनिक की प्रतिक्रिया)

सुना है,
चाहते हो छीनना वो सारे हक़ मुझसे
कभी मुझको दिये थे तुमने
जो ये (छद्म) जंग लड़ने को
बहुत मुश्किल था जिसको जीतना है

चलो राज़ी हूँ मैं तुम छीन लो,
छीन ही लो सारे हक़ मेरे

सहे जाते नहीं मुझसे भी
रोती, चीखती झेलम के आंसू
सहा जाता नहीं मुझसे चिनारों का सहमना
बुरी लगती है मुझको भी
सजीली वादियों में
कसैली गंध जो बारूद देता है
बुरा लगता है मुझको भी
ख़मोशी तोड़ते हैं जब पहाड़ों की गरजती तोप के गोले
बुरे लगते हैं मुझको भी जनाज़े
छिले हैं मेरे कांधे भी उठाने में इन्हें साहब

मेरी आंखें भी मुझसे मांगती हैं चैन की नींदें,
मचलते, दौड़ते, ऊधम मचाते बच्चे मेरी भी तमन्ना हैं
सुकूं के पल मुझे भी चाहिये
मुझे भी चाहिये बीबी के हाथों की पकी रोटी
मुझे भी बूढ़ी माँ की झुर्रियां आवाज़ देती हैं
मुझे भी बाप जिसके हाथ अब हिलने लगे हैं याद आता है
ज़ुरूरत है उसे मेरी मगर मैं जा नहीं सकता …..

मैं इस वादी में कोई अपनी मर्ज़ी से नहीं आया
बुलाया था मुझे तुमने
कि बच्चों का मचलना, खेलना, ऊधम मचाना रुक गया था
चिनारों का हरापन ढँक गया था तीरगी से
पहाड़ों की सफ़ेदी हो गयी थी किस क़दर काली
गुलाबी सेब के बाग़ात झुलसे जा रहे थे
शिकारे सहमे-सहमे झील के कोनों में सिमटे थे
ज़री के शाल, जामावार, क़हवा, रेशमी क़ालीन
सब डर से पड़े थे सांस रोके
फिरन, केसर की क्यारी, कांगड़ी, अखरोट
किस-किस की कहूं क्या हाल था सबका

मैं इस वादी में साहब अपनी मर्ज़ी से नहीं आया
बुलाया था मुझे तुमने
यहां मैंने भी खोये हैं बहुत साथी
यहां क़ुर्बानियाँ दी हैं बहुत मैंने
फ़क़त इस वास्ते बच्चे यहां भी खेलें, शोरो-ग़ुल मचायें
जैसा दुनिया भर में करते हैं
महक बांटें यहां भी फूल, मचलें भौंरे
जैसा दुनिया भर में करते हैं
यहां भी बीबियां शौहर से जूझें,
बतायें उनको तुमको कुछ नहीं आता है
जैसा दुनिया भर में करती है

चलो हक़ छोड़ देता हूं, चलो वापस चला जाता हूं घर अपने
मगर फिर मुझको वापस आने को मत बोलना
पीठ से आवाज़ मत देना
बंधे हाथों से कोई जंग तो होती नहीं है, हो नहीं सकती

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