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कंचन पाठक का कविता संग्रहः इक थी कली

कंचन पाठक हिंदी कविता की दुनिया की एक सुपरिचित युवा चेहरा हैं I पिछले दिनों हिन्द युग्म से प्रकाशित “इक कली थी” उनका पहला एकल काव्य -संग्रह है I

“इक कली थी” मानवीय संवेदन के बदलाव और अभिव्यक्ति के नयेपन का काव्य है। कवयित्री की चेतना में किसान , प्रकृति , नदी , परिश्रम , धर्म , ईश्वर , राजनीति , नारी , समाज तथा अपने समय की ढेरो -सारी चुनौतियाँ है I जन्म तुम्हे देकर लाडो / तुम ही शक्ति , तुम ही मुक्ति / दीपशिखा टिम – टिम अभिलाषा / इन्द्रधनुष है मन पर छाया / नारी नदी और धरती / बाजारवाद का समां अजब / तन पर श्वेद कणो का गहना / धूप हवन की पुण्य अग्नि से / ऊँची चारदीवारियों से घिरी / यह प्रश्न जितना कवयित्री का है उतना ही भारत के आम -आदमी का भी I

कंचन पाठक उन साहित्यकारों में से एक़ हैं जिन्होंने समाज के भीतर हाहाकार , रुदन को देखा , परखा और करुण होकर इसे अपने काव्य में रचा I मन मेरा पारा सा / एक़ दीपक तुम भी बालो / तू स्त्रीविहीन हो जा / सपने चम्पाफूल हुये / मैं यशोधरा / नयनदव्य दृग्मोती छलकते / इन सभी कविताओ में कवयित्री ने मन की पीड़ा को इतने स्नेह और श्रृंगार से सजाया कि वह जन – जन की पीड़ा के रूप में स्थापित हुई और उसने केवल पाठको को ही नहीं समीक्षकों , आलोचकों को भी गहराई तक प्रभावित किया है I

“इक कली थी” में कविताओं के अंतिम चरण तक पहुँचते-पहुँचते शैली में ताल और गति के कुछ प्रयोग किये गये हैं I ताल को साधारण बोलचाल की ताल के जैसा बनाने में बड़ी ही निपुणता से कार्य किया गया हैं I हालाँकि उस प्रयास में कहीं कहीं उर्दू की गति की बँधी हुई शैली का सहारा लेना पड़ा है जैसे – ज़ज्ब- ए-इश्क का इम्तेहान / सितारा – ए – शज़र / अंदाज़ रंग -ए – गुल आदि I

विचारवस्तु का कविता में खून की तरह दौड़ते रहना कविता को जीवन और शक्ति देता हैं और यह तभी संभव है जब कविता की जड़ें यथार्थ में हों , और “इक कली थी” काव्य संग्रह इसका जीता – जागता प्रमाण हैं I इस भरे -पूरे 120 पृष्ठों के काव्य – संग्रह की साज -सज्जा सुन्दर है -प्रकाशन संस्थान की प्रतिष्ठा के अनुरूप I विजेंद्र एस विज का कला – निर्देशन सार्थक , आकर्षक और प्रभावशाली है I आवरण चित्र विलक्षण ढंग से औरत के मन के सुषुप्त -जाग्रत संसार की कितनी ही परतों को एक़ साथ खोल पाने में सक्षम है I कुल मिलाकर संग्रह स्वागत योग्य और पठनीय है I

लेखिका का परिचय

नाम – कंचन पाठक
शिक्षा – प्राणी विज्ञान से स्नातकोत्तर (M.Sc. in Zoology)
प्रयाग संगीत समिति से हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत में प्रभाकर (M.A.)
कवयित्री, लेखिका
सहसंपादिका ‘आगमन’
प्रकाशित कृतियाँ :- इक कली थी (काव्य-संग्रह), सिर्फ़ तुम (संयुक्त काव्य-संग्रह), काव्यशाला (संयुक्त काव्य-संग्रह), सिर्फ़ तुम (कहानी संग्रह), तीन अन्य प्रकाशनाधीन l
सम्पादन :- सिर्फ़ तुम (कहानी संग्रह)
आगमन साहित्य सम्मान २०१३ ।
लेखन विधा – कविताएँ (छंदबद्ध, छंदमुक्त), आलेख, कहानियाँ, लघुकथाएँ, व्यंग्य ।

कादम्बिनी, अट्टहास, गर्भनाल पत्रिका, राजभाषा भारती (गृहमंत्रालय की पत्रिका), समाज कल्याण (महिला एवं बाल विकास मंत्रालय), रुपायन (अमर उजाला की पत्रिका) समेत देश के विभिन्न राज्यों के प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रचनाएँ प्रकाशित ।
इन्टरनेट पर विभिन्न वेब पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित ।
हमारा मेट्रो (दिल्ली) एवं कृषिगोल्डलाइन में हर सप्ताह कॉलम प्रकाशित ।

फ़ोन नंबर – +918969809870
मेल आईडी[email protected]
ब्लॉगwww.kanchanpathak.blogspot.in

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