आप यहाँ है :

भारतीय संस्कृति में प्रदक्षिणा का अपना महत्व हैः श्री वीरेंद्र याज्ञिक

मुंबई के श्री भागवत परिवार द्वारा गीतामृतम श्रृंखला के 11 वें सोपान का आयोजन पवई के धर्मनिष्ठ परिवार श्री कमलेश जी पारिख जी के परिवार में किया गया।

इस अवसर पर श्री वीरेंद्र याज्ञिक ने कहा कि हम पिछले दस माह से गीता की प्रदक्षिणा कर रहे हैं। हमारे भारतीय दर्शन में प्रदक्षिणा और परिक्रमा का अपना विशिष्ट महत्व है। हम मंदिर में भी भगवान की मूर्ति की प्रदक्षिणा करते हैं। हम संत-महापुरुषों और भागवत की पोथी की भी परिक्रमा करते हैं।

याज्ञिक जी ने कहा कि जब हम मंदिर में जाते हैं और भगवान के दर्शन करने जाते हैं तो हमारी आँखें बंद हो जाती है। देखने में ये बड़ी उल्टी बात लगती है, लेकिन इसका रहस्य यही है कि हम भगवान की उस मूर्ति को, उस विग्रह का दर्शन कर उसे अपने ह्रदय में स्थापित कर लेते हैं और हमारे हाथ स्वतः जुड़ जाते हैं। उन्होंने कहा कि मंदिर के गर्भ गृह ऊर्जा के केंद्र होते हैं और वहाँ प्रवेश करने के लिए आपका शारीरिक दृष्टि से शुध्द होना ज़रुरी है। मंदिर के गर्भ गृह में पूजन, मंत्र और जल से मूर्ति में ऊर्जा का संचार होता है। मंदिर में उस ऊर्जा का विक्रमण होता है इसलिए हम दाहिनी दिशा से मंदिर की परिक्रमा करते हैं। सदा भवानी दाहिनी, सन्मुख रहें गणेश, पाँच देव रक्षा करें , ब्रह्मा , विष्णु , महेश। इसका आशय यह है कि उस तत्त्व की ऊर्जा हमारे अंदर सही दिशा से प्रवेश करे।

उन्होंने कहा कि मंदिर में हमारी चेतना जागृत होती है। लेकिन धर्म का मतलब पूजा-पाठ या कर्मकाँड नहीं है। धर्म के माध्यम से हम अपने आपका अभ्युदय करें। इसी अभ्युदय की कामना से हम भगवद् गीता की परिक्रमा कर रहे हैं।

श्री याज्ञिक ने कहा कि भगवद् गीता ऐसा ग्रंथ है जो हमें विनिश्चितताओं से बाहर आने की प्रेरणा देता है। हमारा जीवन एक कुरुक्षेत्र है। हमारा शरीर पैदा होता है, फिर बालक, किशोर, युवक और वृध्दावस्था के बाद ये शरीर विदा हो जाता है। कुरुक्षेत्र का मतलब भी शरीर से है; कुरु यानी करना, क्षेत्र यानी शरीर। क्षेत्र शरीर को साधता है। हम शरीर में कर्म बोते हैं। कर्म से जीवन फल उगाते हैं।

फ्रांस के एक वैज्ञानिक द्वारा हाल ही में की गई एक शोध का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि हम जिस तरीके से जमीन का उपयोग कर रहे हैं उससे ऐसे हालात पैदा हो गए हैं कि आने वाले 60-70 सालों में ये धरती बंजर हो जाएगी।

उन्होंने कहा कि इस तथ्य का गीता से सीधा संबंध है। हमारा शरीर भी मात्र 70 साल या इससे कुछ साल ज्यादा जीवित रहता है। हम जब तक जीवित रहते हैं तब तक हमारे शरीर में एक युध्द निरंतर चलता रहता है। यही हमारे जीवन का कुरुक्षेत्र है। यानी शरीर में जो द्वंद, विषाद चल रहा है वही हमारा कुरुक्षेत्र है। कृष्ण ने अर्जुन को यही उपदेश दिया कि वह युध्द से भागे नहीं। हमें भी यह समझऩा चाहिए कि हम अपने जीवन की चुनौतियों से भागे नहीं, उनका सामना करें। गीता के 700 श्लोक हमें यही सिखाते हैं कि जीवन की हर चुनौती का सामना करते हुए जीवन कैसे जिया जाए।

उन्होंने कहा कि गीता बुज़ुर्गों का नहीं युवा पीढ़ी का ग्रंथ है। हर बालक और युवक को इसे पढ़ना चाहिए, क्योंकि जीवन में चुनौतियाँ युवावस्था में ही आती है।
उन्होंने कहा कि अंधे धृतराष्ट्र को संजय समझाते हैं

unnamed (1)

यत्र योगेश्वर: कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धर:।
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ।।

इसका अर्थ यही है कि जहाँ योगेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण और गाण्डीव-धनुषधारी अर्जुन होंगे वहीं पर श्री, विजय, और संपदा होगी। इसका सीधा मतलब ये है कि साहस और विवेक से हम कुछ भी हासिल कर सकते हैं। कष्ण विवेक के और अर्जुन साहस के प्रतीक हैं।

याज्ञिकजी ने कृष्ण के चरित्र का विश्लेषण करते हुए कहा कि कृष्ण ने 13 साल की आयु तक मुरली बजाई। इसके बाद उन्होंने सुदर्शन चक्र धारण कर लिया था। कृष्ण और गोप गोपिकाओं और राधा को लेकर कृष्ण के चरित्र की सभी घटनाएँ मात्र 13 साल की आयु तक की है। मथुरा से द्वारिका जाने के बाद कृष्ण योगेश्वर कृष्ण कहलाए। उन्होंने कहा कि आज अमरीका जैसे देश में जो भारतीय शीर्ष पदों पर पहुँचे हैं वे अपनी इस सफलता का श्रेय गीता को देते हैं।

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन – की व्याख्या करते हुए याज्ञिक जी ने कहा कि इस श्लोक का बहुत गलत अर्थ लगाया जाता है। इसका अर्थ है कर्म करना हमारा दायित्व है, उसका फल तो मिलना ही है ये प्रकृति का नियम है। इसका आशय है कि फल में आसक्ति रखकर कर्म मत करो।

आचार्य विनोबा भावे का उल्लेख करते हुए याज्ञिक जी ने कहा कि यज्ञ मात्र हवन नहीं बल्कि देने की, समर्पण की भावना का प्रतीक है। विनोबा भावे ने प्रतिपादित किया कि दान देने से चित्त शुध्द होता है। कोई भी समाज तभी जीवित रह पाता है जब समाज में दान की, बाँटने की भावना हो। दान का मतलब मात्र धन या पैसा दान करना नहीं बल्कि जो अपने पास है उसे बाँटने की भावना। पाँडवों द्वारा किए गए यज्ञ में कृष्ण ने अतिथियों के जूते चप्पल साफ करने का दायित्व लिया। यज्ञ का मतलब है दूसके के लिए समर्पित होना। पूरी प्रकृति यज्ञ कर रही है तभी धरती पर जीवन है। सूर्य, पेड़-पौधे चंद्रमा सभी अपनी ऊर्जा बाँट रहे हैं। उन्होंने कहा कि गीता का मर्म यही है कि हम प्रकृति और समाज से जो भी कुछ ग्रहण कर रहे हैं उसका दुरुपयोग न करें और जो अपने पास है उसे बाँटना सीखें।

उन्होंने कहा कि जो परमात्मा को प्राप्त करना चाहते हैं उन्हें किसी चीज की जरुरत नहीं होती। वे अभावों में भी मस्ती के साथ जीते हैं। विवेकानंद का परिवार संपन्न था, लेकिन उनके पिता की मृत्यु के बाद उनकी आर्थिक स्थिति इतनी खराब हो गई कि दाने दाने के मोहताज हो गए। इस पर विवेकानंद ने रामकृष्ण परमहंस से कहा कि वे काली माँ से उनकी गरीबी दूर करने के लिए कुछ माँगे तो स्वामी रामकृष्ण परमहंस ने उनसे कहा कि वे खुद काली के पास जाकर उनसे धन मांग ले। लेकिन विवेकानंद काली की मूर्ति के पास तीन बार गए और तीनों बार रोते हुए लौटे, वे काली से कुछ माँग ही नहीं पाए। तब रामकृष्ण परमहंस ने उन्हें समझाया कि परमात्मा जब सामने हो तो हम क्षुद्र चीजें नहीं माँग सकते। परमात्मा तो ज्ञान दे सकता है।

इस गीतामृतम का आकाशवाणी के पूर्व निदेशक श्री रवीश कुमार जी, टीवी चैनलों पर होने वाली बहसों में भारतीय जीवन मूल्यों पर अपनी बात रखने वाले लोकप्रिय टीवी पैनलिस्ट श्री रतन शारदा, मुंबई के हीरानंदानी अस्पताल के डॉ. नीरज दुलार, फिल्म निर्माता निर्देशक शशांक उदापुरकर के साथ ही पवई क्षेत्र के कई सुधी श्रोताओँ ने रसपान किया। श्री सुरेंद्र विकल ने श्री भागवत परिवार का परिचय देते हुए बताया कि किस तरह श्री भागवत परिवार मुंबई शहर में भारतीय जीवन मूल्यों की स्थापना के साथ ही सांस्कृतिक जागरण की दिशा में कार्य कर रहा है।

याज्ञिक जी को सुनिए इस लिंक पर

Print Friendly, PDF & Email


सम्बंधित लेख
 

ईमेल सबस्क्रिप्शन

PHOTOS

VIDEOS

Back to Top